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Opinion Poll और Exit Poll पर उठी थी प्रतिबंध की मांग, जानिए दोनों में क्या अंतर है?

भारत में चुनावी सर्वे का जनक एरिक डी कोस्टा को माना जाता है, जबकि एग्जिट पोल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय चार्टर्ड अकाउंटेंट से पत्रकार बने प्रणय रॉय को जाता है।

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देश में जब भी कोई चुनाव होता है, चाहे वह विधानसभा का हो अथवा लोकसभा का। उसके बाद एग्जिट पोल और चुनाव पूर्व ओपिनियन पोल मीडिया और सर्वे करने वाली एजेंसियों द्वारा जारी किए जाते हैं। इस फीचर में हम यह जानेंगे कि एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल में क्या अंतर होता है? साथ ही यह भी बताएंगे कि दोनों कितने विश्वसनीय होते हैं?

अमेरिका में चुनावी सर्वे (ओपिनियन पोल) की शुरुआत

चुनावी सर्वे को ही सामान्यतः ओपिनियन पोल कहा जाता है। यह चुनावों से पहले किये जाते है। दुनिया में सबसे पहले, चुनावी सर्वे की शुरुआत अमेरिका में हुई थी। जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए इस तरीके को अपनाया था। इसलिए इन दोनों को ओपिनियन पोल सर्वे का जनक माना जाता है।

बाद में इनका यह तरीका काफी लोकप्रिय हो गया और इससे प्रभावित होकर ब्रिटेन ने 1937 और फ्रांस ने 1938 में अपने यहां बड़े पैमाने पर ओपिनियन पोल सर्वे कराए। फिर जर्मनी, डेनमार्क, बेल्जियम तथा आयरलैंड में चुनाव पूर्व सर्वे कराने का प्रचलन शुरू हो गया।

एक्जिट पोल का क्या है इतिहास?

एग्जिट पोल, चुनावों के बाद और नतीजों की घोषणा से पहले करवाए जाते है। नीदरलैंड के समाजशास्त्री और पूर्व राजनेता मार्सेल वॉन डैम ने एग्जिट पोल की शुरूआत की थी। उन्होंने पहली बार 15 फरवरी 1967 को इसका इस्तेमाल किया। तब नीदरलैंड में हुए चुनावों में उनका आंकलन बिल्कुल सही निकला था।

इसी आधार पर भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत का श्रेय इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन (IIPU) के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को जाता है। डिकोस्टा को चुनाव के दौरान एग्जिट पोल के जरिए लोगों के चुनावी मिजाज को परखने वाला पहला शख्स माना जाता है। हालाँकि, उनके अनुमान कभी प्रकाशित नहीं हुए।

1980 के आसपास छपने शुरू हुए भारत में एग्जिट पोल

भारत में चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल दोनों की शुरुआत 1980 के आसपास हो गयी थी। उस दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से पत्रकार बने प्रणय रॉय ने मतदाताओं का मूड जानने के लिए ओपिनियन पोल करवाया था। शुरुआती सालों में यह मैग्जीन में छपा करते थे। जबकि टीवी पर एग्जिट पोल का 1996-98 में प्रसारण किया गया था। उस दौरान यह पोल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) द्वारा किया था।

एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल कैसे होते हैं?

एग्जिट पोल में वोट डालने के बाद मतदाताओं से सवाल पूछे जाते हैं कि चुनाव में वोट किस राजनीतिक दल को दिया और क्यों दिया। हर विधानसभा के अलग-अलग पोलिंग बूथ से वोटर्स से सवाल पूछा जाता है। एग्जिट पोल से यह संकेत मिलता है कि चुनाव में हवा किस दल की तरफ बह रही है और किस राजनीतिक पार्टी का पलड़ा भारी है? साथ ही उन मुद्दों, व्यक्तित्वों और उम्मीदवारों के बारे में जिन्होंने मतदाताओं को प्रभावित किया है।

वैसे राजनीतिक दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि ये चुनाव प्रतिद्वंद्वी पार्टी द्वारा प्रेरित या वित्तपोषित है। आलोचकों का यह भी कहना है कि एग्जिट पोल में प्राप्त परिणाम प्रश्नों के चयन और समय और तैयार किए गए नमूने से प्रभावित हो सकते हैं।

वहीं ओपिनियन पोल की बात करें तो वो एग्जिट पोल से काफी अलग होता है। क्योंकि इससे चुनावों के नतीजों का अनुमान लगाना काफी मुश्किल होता है। ओपिनियन पोल चुनाव से पहले कराया जाता है। इस दौरान वोटरों से पूछा जाता है कि आप कौन-सी पार्टी को वोट देंगे? सर्वे करने वाले लोग चुनावों से पहले वोटरों की राय जानने की कोशिश करते हैं। ओपिनियन पोल में वोट डालने वाले और नहीं डालने वाले सभी प्रकार के लोग शामिल हो सकते हैं।

कौन करवाता है एग्जिट और ओपिनियन पोल्स?

ओपिनियन और एग्जिट पोल्स मीडिया और सर्वे करने वाली एजेंसियां करवाती हैं। इनका एक निश्चित सैंपल साइज होता है। आसान भाषा में समझे तो मान लीजिए कि पोल के दौरान सर्वे करने वाली किसी एजेंसी ने दो लाख लोगों से बात की है, तो इसके बाद उनसे मिली जानकारियों पर रिपोर्ट तैयार की जाती है। एजेंसी हर सीट के हिसाब से अलग-अलग लोगों से बात करती है और उसके आधार पर बताया जाता है कि चुनाव के नतीजे कैसे रहने वाले हैं और कौन सी पार्टी सत्ता में आ सकती है।

क्या इन पर कभी प्रतिबंध की मांग भी उठी थी?

साल 1998 में चुनावों से पहले, ओपिनियन पोल ज्यादातर टीवी चैनलों पर प्रसारित किए गए थे। उस समय लोगों ने इन्हें बहुत पसंद किया। हालांकि, कुछ राजनैतिक दलों द्वारा इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की गई। इन दलों का कहना था कि ओपिनियन पोल या एग्जिट पोल चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं। चुनाव आयोग ने इसके बाद 1999 में ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया।

भारत में एग्जिट पोल को नियंत्रित करने वाले नियम

भारत सहित, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में एग्जिट पोल के प्रसारण समय के बारे में ही नियम, कानून और प्रोटोकॉल बनाए गए हैं। भारत में पहली बार एग्जिट पोल को लेकर 1998 में गाइडलाइंस जारी हुई थी। चुनाव आयोग ने आर्टिकल 324 के तहत 14 फरवरी 1998 की शाम 5 बजे से 7 मार्च 1998 की शाम 5 बजे तक एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल के नतीजों को टीवी और अखबारों में छापने या दिखाने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद से समय-समय पर चुनाव आयोग इसे लेकर गाइडलाइंस जारी करता रहता है।

एग्जिट पोल को प्रकाशित करने की अनुमति कब दी जानी चाहिए, इसका मुद्दा विभिन्न रूपों में तीन बार सुप्रीम कोर्ट में जा चुका है। फिलहाल एग्जिट पोल वोटिंग शुरू होने से लेकर आखिरी चरण के खत्म होने तक नहीं दिखाए जा सकते। दरअसल, एग्जिट पोल पर प्रतिबंध की मांग को लेकर चुनाव आयोग ने प्रतिबंध के संदर्भ में कानून में संशोधन के लिए एक अध्यादेश लाए जाने के लिए कानून मंत्रालय को पत्र लिखा। इसके बाद जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान जब तक अंतिम वोट नहीं पड़ जाता, तब तक किसी भी रूप में एग्जिट पोल का प्रकाशन या प्रसारण नहीं किया जा सकता।

अब एग्जिट पोल हमेशा मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दिखाए जाते हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126 के तहत मतदान के पहले एग्जिट पोल सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। इस नियम को तोड़ने पर 2 वर्ष की सजा या जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।

यह भी पढ़ें: Exit polls: आखिर क्या होता है एग्जिट पोल? क्या है इसके नियम, जानें सब कुछ

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