Veer Durgadas: देशभक्तों के आदर्श माने जाते हैं वीर दुर्गादास, औरंगजेब के कब्जे से बचाया मारवाड़
राजस्थान के इतिहास में पन्नाधाय के पश्चात वीर दुर्गादास ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं, जिनकी स्वामिभक्ति का उदाहरण आज भी दिया जाता है। वीर दुर्गादास राठौड़ भारत भूमि के वीर योद्धाओं में से एक माने जाते हैं।
दुर्गादास के साहस, वीरता और पराक्रम को आज भी याद किया जाता हैं। उन्होंने मारवाड़ की धरती को मुगलों की दासता से छुड़वाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि जिस मारवाड़ के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान कर दिया, जीवन के अंतिम क्षणों में उसे ही छोड़ना पड़ा।

उनके त्याग, बलिदान, शौर्य, पराक्रम और स्वामी भक्ति को देखते हुए मारवाड़ में आज भी यह पंक्तियाँ प्रचलित हैं:
माई ऐहड़ौ पूत जण, जेहड़ौ दुर्गादास!
385 वर्ष पूर्व हुआ था दुर्गादास का जन्म, मां ने किया लालन-पालन
13 अगस्त 1638 को मारवाड़ रियासत के सालवा गांव में आसकरण और नैतकंवर के घर पर एक बालक का जन्म हुआ और यही बालक वीर दुर्गादास राठौड़ था। दुर्गादास के पिता आसकरण जोधपुर के शासक महाराजा जसवंत सिंह के दरबार में मंत्री थे तथा द्रुनेवा जागीर के जागीरदार थे। दुर्गादास के पिता आसकरण अपनी पत्नी नैंतकंवर से नाराज थे। इस वजह से दुर्गादास अपनी मां के साथ ही लुणावा गांव में खेती करते थे।
बचपन से ही देशभक्त और स्वामीभक्त थे दुर्गादास
वीर दुर्गादास बचपन से ही देशभक्त व स्वामी भक्त थे वह अपने राजा के बारे में एक भी बुरा शब्द नहीं सुनते थे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक ऊंटपालक ने दुर्गादास के खेत में अपने ऊंट चरा दिए। जिसके कारण दुर्गादास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। जब दुर्गादास ने इस बात की शिकायत ऊंटपालक से की तो वह अपनी गलती मानने के बजाय न केवल दुर्गादास को बुरा भला कहने लगा बल्कि जोधपुर के शासक महाराजा जसवंत सिंह के बारे में भी अपशब्द कहे।
अपने राजा और राज्य के लिए इस तरह की बात सुनकर दुर्गादास का खून उबलने लगा और इन्होंने अपनी कटार निकालकर ऊंटपालक की हत्या कर दी। दरबार में पेश करने पर महाराजा जसवंत सिंह दुर्गादास राठौड़ की निर्भीकता से बड़े प्रसन्न हुए। महाराजा जसवन्तसिंह ने दुर्गादास राठौड़ की निर्भीकता और साहस से खुश होकर उन्हें क्षमा करते हुए अपनी सेना में शामिल कर लिया। धीरे-धीरे दुर्गादास उनके विश्वासपात्र बन गए।
महाराजा जसवन्त सिंह वीर दुर्गादास को मारवाड़ का भावी रक्षक भी कहा करते थे। इस समय दिल्ली पर औरंगजेब का शासन था। उसने षड्यंत्र पूर्वक 1678 में महाराजा जसवन्त सिंह को पठानों के विद्रोह को दबाने के लिये अफगानिस्तान भेज दिया। जहां उनकी मृत्यु हो गई।
जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब का जोधपुर पर कब्जा
जसवंत सिंह के निधन के समय उनकी दो रानियाँ रानी जादम और रानी नरुकी गर्भवती थीं। बाद में दोनों ने दो पुत्रों को जन्म दिया। रानी जादम के पुत्र का नाम अजीत सिंह और रानी नरुकी के पुत्र का नाम रणथम्बन रखा गया। जन्म के कुछ समय पश्चात रणथम्बन की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् अजीत सिंह को उत्तराधिकारी बनाया गया। फरवरी 1679 तक यह सूचना औरंगजेब तक पहुँची लेकिन उसने नवजात बच्चे को वैध वारिस के रूप में मानने से इंकार कर दिया।
महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु के बाद मौके का लाभ उठाते हुए औरंगज़ेब ने जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया और शाही हाकिम को वहां बिठा दिया। कुछ समय पश्चात उसने महाराजा जसवन्त सिंह के करीबी रिश्तेदार (भाई के पौत्र) और अपने वफादार कीर्ति सिंह को मारवाड़ की गद्दी पर बैठा दिया। कीर्ति सिंह एक तरह से कठपुतली था और शासन की बागडोर औरंगजेब के हाथों में ही थी।
इस दौरान बालक अजीत सिंह अपनी माता जादम के साथ दिल्ली में रूप सिंह राठौड़ की हवेली में ही रहे। औरंगजेब बालक अजीतसिंह को मारना चाहता था या उनसे इस्लाम धर्म स्वीकार करवाना चाहता था। लेकिन दुर्गादास राठौड़ औरंगजेब की इस नीति को भांप गए और अजीत सिंह को दिल्ली से बचाकर जोधपुर लाने की योजना में लग गए और कुछ समय बाद अपने वीर साथियों के बलिदान के बावजूद सफल भी हुए।
20 साल के संघर्ष के बाद हुआ अजीत सिंह का राज्याभिषेक
तकरीबन 20 साल तक वीर दुर्गादास राठौड़ और उनके सहयोगी अजीत सिंह को जोधपुर की गद्दी पर बिठाने के लिए संघर्ष करते रहे। इस दौरान मारवाड़ सीधे मुगल शासन के अधीन रहा। इसी बीच वीर दुर्गादास मेवाड़ के राजाओं और मराठों से लगातार संपर्क में रहे। अब तक अजित सिंह बड़े हो चुके थे। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मौके का फायदा उठाते हुए वीर दुर्गादास और अजित सिंह ने मुगल सेना को मारवाड़ से खदेड़ दिया। इसके बाद अजित सिंह मारवाड़ के राजा बने।
अजीत सिंह के रूखे व्यवहार के चलते दुर्गादास ने लिया संन्यास
वीर दुर्गादास ने धर्म की रक्षा की और जीवन भर मारवाड़ की सेवा करते रहे। मारवाड़ में उन्होंने कोई बड़ा पद स्वीकार नहीं किया। अजीत सिंह के राजा बनने के बाद कुछ लोगों ने उनको दुर्गादास के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया और अजीत सिंह का दुर्गादास के प्रति व्यवहार बदलने लगा।
इससे दुखी होकर स्वाभिमानी वीर दुर्गादास ने सन्यास ले लिया। वह मारवाड़ से मेवाड़ के विजय नगर चले गए और जीवन के अंतिम दिन भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर बिताये। 81 वर्ष की आयु में वीर दुर्गादास राठौड की मृत्यु 22 नवम्बर 1718 हुई। जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया वहां लाल पत्थर से बना चक्रतीर्थ नामक स्थान आज भी सुशोभित है और वीर दुर्गादास के साहस, पराक्रम और देशभक्ति का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वीर दुर्गादास देशभक्तों के आदर्श
भारतीय इतिहास ही नहीं अपितु विश्व इतिहास में वीर दुर्गादास का अद्वितीय स्थान है। अपने राज्य या सत्तासुख भोगने की लालसा में युद्ध लड़ने वाले तो अनेको हुए परंतु स्वतंत्रता एवं संस्कृति की रक्षार्थ निस्वार्थ व निष्पक्ष भाव से संघर्ष करने में दुर्गादास राठौड़ अद्वितीय है।
भारतीय संस्कृति में स्वतंत्रता के रक्षक के रूप में वीर दुर्गादास का योगदान अतुलनीय है। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्गादास राठौड़ के बारे में कहा है कि "उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी, बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमें राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी"।












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