बनारस जंक्शन: वो बनारस की साड़ी खूब सजे..
बनारस जंक्शन। बनारसी साड़ी में लिपटी सोलह सिंगार किये हुए एक भारतीय नारी की छवि दिखती है जब हम अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बात करते हैं। भारत में शायद ही ऐसी कोई औरत होगी जिसकी अलमारी में एक बनारसी साड़ी न हो। दुल्हन की बकसिया भी एक बनारसी साड़ी ज़रूर समेटे होती है अपने अंदर और हो भी क्यों न।

बनारसी साड़ी की बात ही अलग है जो और किसी परिधान में नहीं और इस सब के पीछे है वो कुशल हाथ जो इसे बारीकी से काढ़ते है। एक बनारसी साड़ी को बनाने में 15 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग सकता है; जो उसकी डिजाईन और कारीगरी पर निर्भर करता है।
मुगलों के ज़माने की है बनारसी साड़ी
मुगलों के राज्य में बनारसी साड़ी को उसका बेहतर मुकाम हासिल हुआ। साड़ी पर बने मोटिफ भी नए कलेवर में आये और साड़ियों ने नई डिजाईन बनना शुरू हुई, ये नई डिजाईन भारतीय और फ़ारसी कलाओं का मेल थी। इन साड़ियों में इस्तेमाल होने वाला सिल्क दक्षिण भारत से मुख्यतः बंगलुरु से मंगवाया जाता है।
बनारसी साड़ियों के भी निम्न प्रकार होते हैं-
- प्योर सिल्क साड़ी या कटन
- ओर्गंज़ा साड़ी (कोरा) जिसमे सिल्क पर ज़री और ज़रदोज़ी का काम करते है
- जारजट साड़ी
- शत्तिर साड़ी
कैसे बनती है बनारसी साड़ी
आपको बताती हूँ की बनारसी साड़ी कैसे बनायीं जाती है। एक आदर्श बनारसी साड़ी में 5600 के आसपास धागों के तार होते हैं जो 45 इंच तक चौड़े होते हैं, साड़ी का आधार पावरलूम पर बनाया जाता है बाकी का ताना बुनने में कारीगर एक बेस बनाते हैं जो 24 से 26 मीटर लम्बा होता है।ये सब काम दो से तीन कारीगर मिलकर करते है। एक आदमी साड़ी बुनता है तो दूसरा चक्का चलाता है जिसमे बंडल बनाये जाते हैं।
एक डिजाईन बनाने में लगते है 100 कार्ड
बंडल बनाने की प्रक्रिया में साथ ही नये मोटिफ बनाये जाते है। डिजाईन बोर्ड पर सबसे पहले आर्टिस्ट द्वारा आकृति बनायीं जाती है और उसमे मन माफिक रंग भरे जाते है फिर अंतिम नमूनों के पंच कार्ड बनाये जाते हैं। एक डिजाईन बनाने के लिए एक बार में 100 से अधिक छिद्रित कार्ड बनाये जाते हैं जिससे यह सुनिश्चित होता है की डिजाईन में सही रंग भरे जा रहे हैं, सभी कार्ड्स को सही तरीके से अरेंज करके एक साड़ी बनाई जाती है।
कानून भी देता है इस कला का संरक्षण
देश-विदेश में अपने बेहतरीन डिज़ायनों के लिए मशहूर बनारस की साड़ी और ज़री के काम को भौगोलिक रुप से क़ानूनी संरक्षण मिल गया है। यह संरक्षण कपड़ा मंत्रालय के तहत कपड़ा समिति ने भौगोलिक संकेत क़ानून 1999 के तहत प्रदान किया है। समिति कपड़ा मंत्रालय के तहत एक संवैधानिक संस्था है। देश के इस परम्परागत ख़ज़ाने पर घरेलू उत्पादकों और आयातकों द्वारा हमेशा अतिक्रमण किया जाता रहा है। इन उत्पादों की ऊँची कीमत और बाज़ार हिस्से को अतिक्रमण के ज़रिये उड़ा लिया जाता था। संरक्षण से बनारस के इन उत्पादों को देश और विदेश में विकास करने में मदद मिलेगी।












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