Attempt to Murder Gandhi: महात्मा गांधी की हत्या से 10 दिन पहले हुए जानलेवा हमले की कहानी
महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में हुई थी। हालांकि, इस घटना से पहले भी 20 जनवरी को उनकी हत्या की एक असफल कोशिश की जा चुकी थी।

महात्मा गांधी की हत्या से दस दिन पहले भी एकबार हत्या का प्रयास हो चुका था। इस सन्दर्भ में नाथूराम गोडसे के छोटे भाई, गोपाल विनायक गोडसे अपनी पुस्तक 'गांधी वध और मैं' में लिखते हैं कि 20 जनवरी 1948 की शाम को दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी की प्रार्थना सभा स्थल के निकट बम विस्फोट हुआ था और मदनलाल पाहवा घटनास्थल से पकड़ा गया।
दरअसल, इस षड्यंत्र की जानकारी पाहवा ने बंबई के एक कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर व लेखक जगदीशचंद्र जैन को दी थी। महात्मा गांधी की हत्या के बाद, जैन ने अपनी गवाही में बताया कि मदनलाल पाहवा पाकिस्तानी शरणार्थी है। जैन के मुताबिक पाहवा से उनकी एक मुलाकात जनवरी 1948 के पहले अथवा दूसरे सप्ताह में हुई थी।
गांधी की हत्या की साजिश का पूर्व खुलासा
'गांधी वध और मैं' किताब के मुताबिक जनवरी के दूसरे सप्ताह में किसी दिन रात के करीब 8 बजे मदनलाल और जैन की मुलाकात हुई। इस दौरान मदनलाल ने जैन को बताया कि उसके दल ने एक बड़े नेता को मार डालने का निश्चय लिया है। जैन ने जब नाम पूछा तो मदनलाल आनाकानी करने लगा। फिर जैन के अधिक आग्रह के बाद मदनलाल ने उन्हें गांधीजी का नाम बताया।
गोपाल गोडसे आगे लिखते हैं कि यह जानकार जैन को आघात हुआ और मदनलाल से ऐसी मूर्खता न करने की सलाह दी। इसके बाद, मदनलाल वहां से चला गया। जैन ने भी इन बातों को अधिक महत्व नहीं दिया क्योंकि उन दिनों विभाजन के कारण विस्थापित (शरणार्थी) बहुत क्षुब्ध थे और वे बहुत ही कटु शब्दों में गांधीजी और कांग्रेस को कोसा करते थे। हालांकि, जैन ने यह बात जयप्रकाश नारायण को बताने की चेष्टा की लेकिन जब वे उनसे मिलने गए तो उनके आसपास इतनी भीड़ थी कि ठीक से मिल नहीं सके। फिर भी, दिल्ली में किसी षड्यंत्र की संभावना का संकेत जैन ने उन्हें दे दिया था।
सरदार पटेल और मोरारजी देसाई को दी जानकारी
महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में मदनलाल द्वारा किये गये बम-विस्फोट और गिरफ्तारी के समाचार की जानकारी जगदीशचंद्र जैन को अगले दिन यानि 21 जनवरी को समाचारपत्र के माध्यम से मिली। तब जैन ने फोन पर सरदार पटेल से बात करने का निश्चय किया लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
तब बॉम्बे के तत्कालीन मुख्यमंत्री बालासाहेब गंगाधर खेर से सचिवालय में मिलने का समय लिया, जहां मोरारजी देसाई उपस्थित थे। जैन ने मदनलाल के बारे में सारी जानकारी उन्हें बता दी। इसकी पुष्टि खुद मोरारजी देसाई अपनी गवाही (गांधी की हत्या की जांच के दौरान) में दी। गौरतलब है कि जैन से मिली जानकारी को अहमदाबाद में 23 जनवरी 1948 को मोरारजी देसाई ने सरदार पटेल से एक मुलाकात के दौरान दे दी थी।
महात्मा गांधी ने जांच के लिए सरदार को रोका
इस जानकारी के बाद, सरदार पटेल ने महात्मा गाँधी की सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था बढ़ा दी। साथ ही, उनकी प्रार्थना सभा में आने वाले सभी आगुंतकों की जांच का भी आदेश दिया जिसे महात्मा गांधी ने रोक दिया। इस बात का खुलासा सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल ने किया है।
दरअसल, साल 1966 में महात्मा गांधी की हत्या की जांच के लिए तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारीलाल नन्दा ने कमीशन ऑफ एन्क्वायरी एक्ट के तहत रिटायर्ड जज जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन गठित किया। इस कपूर कमीशन के समक्ष मणिबेन पटेल ने कहा है उनके पिता सरदार पटेल बापू की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे क्योंकि पहले भी हमले हो चुके थे। मेरे पिता ने महात्मा गांधी से जाकर कहा था कि प्रार्थना सभा में आने वाले लोगों की जांच की जाएगी, उसके बाद ही अंदर आने दिया जाए लेकिन गांधी इसके लिए तैयार नहीं हुए थे।
महात्मा गांधी की करीबी सहयोगी रहीं मनुबेन अपनी डायरी 'अंतिम झांकी' में लिखती हैं कि जब मदनलाल पाहवा ने बम से हमला किया तो अगले दिन 21 जनवरी 1948 को गांधीजी की सुरक्षा के लिए बिड़ला भवन में मिलिट्री रखी गई और तय किया गया कि प्रार्थना में आने वाले लोगों की तलाशी ली जाएगी। लेकिन, बापू ने इससे साफ-साफ इनकार कर दिया। सरदार पटेल से काफी वाद-विवाद के बाद उन्होंने कुछ मिलिट्री का पहरा रहने देने की बात मान ली।
सरदार पटेल को दोषी मानते थे जेपी
वास्तविकता तो यही थी कि महात्मा गांधी की सुरक्षा को लेकर सरदार पटेल चिंतित थे और उन्होंने इस दिशा में प्रयास भी किये। मगर महात्मा गांधी के आगे उनकी एक न चल सकी। फिर भी कई नेताओं का मानना था कि सरदार पटेल ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई। इस सन्दर्भ में, मणिबेन पटेल ने कपूर कमीशन के समक्ष स्वीकार किया है कि जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से उनके पिता को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था।
जयप्रकाश नारायण के अलावा, मौलाना आजाद की अपनी आत्मकथा 'इंडिया विन्स फ्रीडम' (पेज 223) में भी यह लिखा है कि जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि सरदार पटेल गृहमंत्री के तौर पर गांधी की हत्या में अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं।
न्यायमूर्ति बोले - पुलिस चाहती तो रोक सकती थी हत्या
10 नवंबर 1949 को दिये गये अपने निर्णय में जज आत्माचरण लिखते हैं कि 20 जनवरी 1948 से 30 जनवरी 1948 तक पुलिस द्वारा की गई जांच पड़ताल की शिथिलता मुझे केंद्रीय शासन के ध्यान में लानी है। 20 जनवरी 1948 को मदनलाल के पकड़े जाने के बाद उसका पूरा बयान दिल्ली पुलिस के पास था। उधर जगदीशचंद्र जैन से सभी जानकारी मिल चुकी थी। इसके बावजूद पुलिस गांधी जी की हत्या को रोकने में असमर्थ रही, यह अत्यंत दुख की बात है।
पुलिस ने तत्परता दिखायी होती तो यह दुखद घटना टाली जा सकती थी। 'गांधी वध और मैं' पुस्तक के मुताबिक जज साहब की यह धारणा उनके समक्ष पेश किये गये प्रमाणों के आधार पर थी। दरअसल नथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को पूना पुलिस भलीभांति जानती थी। उधर, विष्णु करकरे भी अहमदनगर पुलिस की जानकारी में था। इसलिए यदि पूना और अहमदनगर के कुछ पुलिस अधिकारियों को बिड़ला भवन की सुरक्षा में लगाया जाता तो दुर्घटना के पहले ही संबंधित आरोपियों को पकड़ा जाना संभव था।
कब और कैसे हुई महात्मा गांधी की हत्या
पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार 19 जनवरी 1948 को ही गांधी की हत्या का पूरा खाका तैयार हो गया था। पहले हमलें में नाथूराम शामिल नहीं था, क्योंकि 20 जनवरी को उसकी तबीयत खराब हो गयी। इसलिए चार लोग - गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा ही बिड़ला भवन गये। बिड़ला भवन की दीवार के पीछे से मदनलाल पाहवा ने प्रार्थना सभा में बम फेंका। तभी मदनलाल को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया बाकी तीन वहां से भाग निकले।
इस बम कांड के बाद नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे बॉम्बे चले गये। फिर 29 जनवरी वापस दिल्ली लौटे और 30 जनवरी की शाम 5 बजे बापू को प्रार्थना सभा में नाथूराम ने गोली मार दी। नाथूराम को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन नारायण आप्टे और विष्णु करकरे दिल्ली से भाग निकले। आखिरकार, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे को 14 फरवरी 1948 को गिरफ्तार किया गया।
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