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Kanwar Yatra: भगवान श्रीराम और शिवभक्त रावण ने की थी कांवड़ यात्रा, जानें इसका महत्व

Kanwar Yatra: हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में लोग सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा कर अपने गांव लौटते है। इसको कांवड़ यात्रा कहा जाता है। श्रावण की चतुर्दशी के दिन गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। धार्मिक रूप से देखा जाए तो भक्त बाबा भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए कांवड़ यात्रा में जाते हैं।

जिन शिवालयों तक गंगा नहीं पहुंचती, वहां तक पवित्र जल ले जाने का काम कांवड़िए करते हैं। ऐसी मान्यता है कि भोलेनाथ अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। कांवड़ यात्रा के पीछे के विज्ञान को देखा जाए तो इसका संबंध जल और जीवन से है। क्योंकि जल के बिना जीवन संभव नहीं है और इस यात्रा का अर्थ सुदूर क्षेत्र तक पवित्र जल ले जाना भी है।

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प्राचीन मान्यताओं व कथाओं के अनुसार कावड़ यात्रा का शुभारंभ कब हुआ और किसने किया। इसके बारे में सटीक जानकारी नहीं है‌ लेकिन पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। जिसके अनुसार भगवान परशुराम, भगवान श्रीराम, शिव भक्त रावण, तथा माता-पिता के आज्ञाकारी श्रवण कुमार की कांवड़ यात्रा का उल्लेख है। इनके अनुसार कथाएं भी प्रचलित हैं।

भगवान परशुराम ने की कांवड़ यात्रा

एक बार कामधेनु को पाने के लालच में राजा सहस्त्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी थी। पिता की हत्या का बदला लेने के लिए भगवान परशुराम ने राजा की भुजाओं को काट दिया, जिससे उसकी भी मृत्यु हो गई। भगवान परशुराम की कठोर तपस्या के बाद ऋषि जमदग्नि को जीवनदान मिल गया। तब उन्होंने अपने पुत्र परशुराम को सहस्त्रबाहु की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करने को कहा।

जिसके बाद परशुराम मीलों पैदल यात्रा कर कांवड़ में गंगाजल भरकर लाए और उन्होंने आश्रम के पास ही शिवलिंग की स्थापना कर भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। इसी कारण से भगवान परशुराम को संसार का पहला कांवड़िया कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए और यूपी के बागपत के पास स्थित 'पुरा महादेव' का गंगाजल से अभिषेक किया था। उस समय सावन मास ही चल रहा था, इसी के बाद से कांवड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने किया था जलाभिषेक

आनंद रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम पहले कांवड़िया थे। भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था। उस समय सावन मास चल रहा था। मान्यता है कि तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई।

शिवभक्त रावण ने की थी कांवड़ यात्रा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष को पी लिया था। जहर के नकारात्मक प्रभावों ने भोलेनाथ को असहज कर दिया था। भगवान शंकर को इस पीड़ा से मुक्त कराने के लिए उनके परमभक्त रावण ने कांवड़ में गंगाजल भरकर कई बरसों तक महादेव का जलाभिषेक किया था। जिसके बाद भगवान शिव जहर के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हो गए थे। तभी से कांवड़ यात्रा का आरंभ माना गया और रावण को पहला कांवड़िया माना जाता है।

त्रेता युग में श्रवण कुमार का भी उल्लेख

कुछ ग्रंथों में त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी। श्रवण कुमार ने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाने के लिए कांवड़ बैठाया था। श्रवण कुमार के माता पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की थी, माता पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार कांवड़ में ही हरिद्वार ले गए और उनको गंगा स्नान करवाया। वापसी में वे गंगाजल भी साथ लेकर आए थे और उन्होंने शिवलिंग पर चढ़ाया। इसे भी कांवड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।

सावन में भगवान शिव कनखल में, इसलिए हरिद्वार से कावड़ यात्रा का प्रारंभ

कांवड़ यात्रा हरिद्वार से शुरू होती है, जहां श्रद्धालु लाखों की संख्या में पहुंचते हैं और गंगा जल लेकर अपने गांव के लिए निकलते हैं। कांवड़ यात्रा का हरिद्वार से नाता यह है कि सावन में महादेव शिव अपने ससुराल राजा दक्ष की नई नगरी कनखल मतलब हरिद्वार में निवास करते हैं। इस महीने श्रीहरि विष्णु शयन में जाते हैं इसीलिए तीनों लोकों की देखभाल भगवान शिव करते हैं। इसीलिए कांवड़िए गंगा जल लेने के लिए हरिद्वार जाते हैं। तब से श्रावण के महीने में कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा शुरू हो गई और यूपी, उत्तराखंड समेत तमाम राज्यों में शिव भक्त बड़े स्तर पर हर साल सावन के दिनों में कांवड़ यात्रा निकालते हैं।

जमीन पर नहीं रखते हैं कांवड़

यात्रा के दौरान श्रद्धालु कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते हैं। कांवड़ चढ़ाने वाले लोगों को कांवड़ियां कहा जाता है। ज्यादातर कांवड़ियां केसरिया रंग के कपड़े पहनते हैं। ये गौमुख, इलाहबाद, हरिद्वार और गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगाजल भरते हैं, इसके बाद पैदल यात्रा कर अपने गांव में स्थित शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

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