Sahib Singh Verma: दिल्ली के वे मुख्यमंत्री, जिन्होंने इस्तीफा दिया और डीटीसी की बस से घर चले गये

Sahib Singh Verma: 1998 में प्याज की कीमतें आसमान छू रही थीं। दिल्ली में मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा को प्याज की कीमत अपनी कुर्सी से चुकानी पड़ी। 1998 में वर्मा ने इस्तीफा देने के तुरंत बाद अपने सरकारी आवास को खाली कर दिया था। इसके बाद डीटीसी की बस में बैठकर पूरे परिवार के साथ अपने गांव मुंडका चले गये। बाद में उन्होंने केंद्र सरकार में श्रम मंत्री के रूप में काम किया। आज पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको दिल्ली के चौथे और भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्री रहे साहिब सिंह वर्मा से जुड़ी कुछ जानकारियों को साझा करेंगे।

शुरुआती जीवन और राजनीति

साहिब सिंह का जन्म 15 मार्च 1943 को दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर बसे गांव मुंडका में एक किसान परिवार में हुआ था। इनकी मां का नाम भरपाई देवी था और पिता का नाम मीर सिंह था। इमरजेंसी के बाद साल 1977 में हुए दिल्ली नगर निगम के चुनाव में पहली बार पार्षद के रूप में जीत दर्ज कर राजनीति में शुरुआत की थी। वह केशवपुरम वार्ड से पार्षद चुने गए थे। अस्सी के दशक में उनकी फिर जीत हुई और बीजेपी संगठन में कद भी बढ़ा। 1991 के चुनाव में उन्हें बाहरी दिल्ली लोकसभा से भाजपा का टिकट मिल गया। उनके प्रतिद्वंदी के रूप में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार थे। सज्जन को संजय गांधी का खास माना जाता था। इस चुनाव में साहिब सिंह वर्मा 86 हजार वोटों से हारे थे। पर दिल्ली में उनकी पहचान बननी शुरू हो गई थी।

Sahib Singh Verma Chief Minister of Delhi who resigned and went home in a DTC bus

इसके बाद 1993 के दिल्ली में हुए पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने शालीमार बाग विधानसभा सीट पर जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी एस.सी. वत्स को 21 हजार वोट से हराया था। बीजेपी ने मदन लाल खुराना के नेतृत्व में सरकार बनाई और वर्मा इस कैबिनेट के शिक्षा मंत्री बने। शिक्षा और विकास मन्त्रालय का महत्वपूर्ण मन्त्री पद मिलने पर उन्होंने कई अच्छे कार्य किये।

इसका यह परिणाम हुआ कि 1996 में जब भ्रष्टाचार के आरोप में मदन लाल खुराना ने त्याग पत्र दिया तो दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कमान साहिब सिंह को ही दी गयी। 26 फरवरी 1996 को दिल्ली को नया मुख्यमंत्री मिल गया। छत्रसाल स्टेडियम में शपथ ग्रहण समारोह हुआ। लेकिन चुनाव से लगभग 50 दिन पहले 1998 में प्याज की बढ़ती कीमतों को लेकर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद संगठन की ओर से दिल्ली की कमान तेज तर्रार नेता सुषमा स्वराज को दे दी गई। पर सुषमा को केवल एक महीने का समय मिला जिसमें प्याज की कीमतें कम नहीं हुई और दिल्ली की जनता ने भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया। उसके बाद से अभी तक दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं बन सकी है।

सरकारी नौकरी भी की

साहिब सिंह वर्मा ने राजनीति से नहीं बल्कि दिल्ली म्यूनिसिपैलिटी की लाइब्रेरी में नौकरी से अपने आरंभिक जीवन की शुरूआत की थी। साहिब सिंह ने एएमयू से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई की थी। साहिब सिंह वर्मा आरएसएस के एक स्वयंसेवक भी थे। लिहाजा इमरजेंसी के दौरान उनके नाम का गिरफ्तारी वारंट निकला था पर वे बच निकले थे। इसके बाद उन्होंने अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था।

ए बुल इन चाइना शॉप का मिला खिताब

2002 में अटल सरकार में श्रम मंत्री बनने के बाद उनके एक काम के लिए हमेशा याद किया जाता है। अपने कार्यकाल में उन्होंने सबके दबाव के बाद भी कर्मचारी भविष्य निधि पर ब्याज की दरों को कम करने से रोका। उनके इस काम को ए बुल इन चाइना शॉप कहा गया। इसके बावजूद वह 2004 का लोक सभा चुनाव हार गये। इस बार उनकी हार में लगभग सवा दो लाख वोटों का अंतर था। इसके बाद वे संगठन में सक्रिय हो गये।

साहिब सिंह गांव वालों के लिए शिक्षा की अहमियत समझते थे। इसीलिए जब वे दिल्ली के शिक्षा मंत्री बने तो आईपी यूनिवर्सिटी के अलावा दर्जनों कॉलेज शुरू किए थे। और जब मुख्यमंत्री बने तो हर गांव में लाइब्रेरी और स्कूल बनाने का विचार प्रस्तुत किया था। 30 जून 2007 को दिल्ली जयपुर हाईवे पर एक कार एक्सिडेंट में साहिब सिंह वर्मा का देहांत हो गया। उस समय साहिब सिंह बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे।

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