सावन आयो रे.. तन भी भीगा और मन भी...
खेतवा धानन के तैयार; चुनरिया उड़े लहरियादार; जियेरा झूम झूम जाए.. आप सोच रहे होंगे की आज मुझे ये क्या हो गया अचानक से? दरसल हमारे शहर में दो सालों बाद इतनी बढ़िया बारिश हो रही है। हर तरफ हरियाली है; पूरा वातावरण धुला धुला सा है साँस लेने तक में बड़ी पाजिटिविटी आ रही है। चाय पकौड़े खाने का मन हो रहा है और मन में ये लोकगीत आया जो अम्मा गाती थी।
क्या आप जानते हैं देश की 7 सिस्टर्स के बारे में, जो हैं बेपनाह खूबसूरत..

साहित्यकारों ने खूब रचा सावन
हमारे साहित्यकारों ने भी इस महीने को खूब महिमा मंडित किया है। न अधिक गर्मी न अधिक ठंड; उस पर हर ओर खुशगवार मौसम तो लेखक की कलम तो खुद बखुद चल पड़ती है। साहित्य तो मानों इस ऋतु का सबसे बड़ा गवाह है जिसने शब्दों के माध्यम से मौसम के मिजाज को जन जन में व्याप्त किया है, सरोबार किया है।
अगर करते हैं किसी से प्यार तो कीजिये सावन में उपवास
हिन्दी साहित्य का मध्ययुग
चाहे वो हिन्दी साहित्य का मध्ययुग हो जिसमें तुलसी, सूर, जायसी आदि कवियों ने पावस ऋतु का सुंदर और सरस चित्रण किया है या आधुनिक हिन्दी साहित्य में छायावादी कवियों में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त , सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, या महादेवी वर्मा द्वारा लिखी वर्षा संबंधी कविताएँ हों या आज के लेखकों की आधुनिक लेखन क्षमता में वर्षा हो, सबने जैसे साक्षात बारिश को जीने के गुर दिए हैं।
हरिवंश राय बच्चन की एक रचना 'साजन आए, सावन आया'
अब दिन बदले, घड़ियां बदलीं,
साजन आए, सावन आया।
धरती की जलती साँसों ने
मेरी साँसों में ताप भरा,
सरसी की छाती दरकी तो
कर घाव गई मुझ पर गहरा,
है नियति-प्रकृति की ऋतुओं में
संबंध कहीं कुछ अनजाना,
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।
रामधारी सिंह दिनकर को साहित्य तो वीर रस से सम्पन्न माना जाता है। पर ये भी सावन की बौछारों से बच नहीं पाए। सावन पर उनकी लिखी रचना देखिये-
जेठ नहीं, यह जलन हृदय की,
उठकर ज़रा देख तो ले,
जगती में सावन आया है,
मायाविनि! सपने धो ले..
आज के कवि गोपालदास नीरज भला कैसे पीछे छूटते, जिन्होंने अगर हिन्दी फिल्मो में 'मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गयी निंदिया.. जैसे गीत लिखे तो अपनी कविताओं में भी सावन को उकेरा है
यदि मैं होता घन सावन का
पिया पिया कह मुझको भी पपिहरी बुलाती कोई,
मेरे हित भी मृग-नयनी निज सेज सजाती कोई,
निरख मुझे भी थिरक उठा करता मन-मोर किसी का,
श्याम-संदेशा मुझसे भी राधा मँगवाती कोई,
किसी माँग का मोती बनता ढल मेरा भी आँसू,
मैं भी बनता दर्द किसी कवि कालिदास के मन का।
यदि मैं होता घन सावन का॥
महाकवि कालिदास ने सावन पर लिखा-
जब सावन पास आ गया, तब निज प्रिया
के प्राणों को सहारा देने की इच्छाज से उसने
मेघ द्वारा अपना कुशल-सन्देजश भेजना चाहा।
फिर, टटके खिले कुटज के फूलों का
अर्घ्यव देकर उसने गदगद हो प्रीति-भरे
वचनों से उसका स्वा गत किया।
हिंदी साहित्य के महामहिम सुमित्रानंदन पन्त की कविता में पढ़िए सावन -
झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के
छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के।
चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के,
थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।
अमीर खुसरों के काल में उनकी लिखी रचना आनंद लीजिये
अम्मा मेरे बाबा को भेजो री,
कि सावन आया।
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,
कि सावन आया।
अम्मा मेरे भाई को भेजो री,
कि सावन आया।
वसीम बरेलवी द्वारा लिखी' सावन की रचना पढ़िए
तोड़ गया सावन
धरती को अम्बर से जोड़ गया सावन
जोड़ा कुछ ऐसे कि तोड़ गया सावन
बूंदों में उतरीं समन्दर-सी बातें
बाहर के होंटों पे अन्दर की बातें
भीगे हुओं को निचोड़ गया सावन
गुलजार साहब कैसे पीछे रह सकते थे, जिसने जीवन जिया, अनुभवों और संवेदनाओं की जिसके पास धाती है वो कैसे वर्षा ऋतुमें अपनी कलम को रोक सकता है
बारिश आती है तो....
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला सब बजने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते,
साइकल का पहिया पानी कुल्लियां करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं कद भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूबके चलता है
खुश्क था तो रस्ते में टिक-टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप-टप चलते हैं!












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