इस झोला छाप डॉक्टर से इलाज करवाते हैं बड़े-बड़े लोग

कान के इस झोला झाप डॉक्टर के हाथ में तेल की शीशी और कान के ऊपर फाहा लगी रहती है। ये डॉक्टर बिना किसी सर्टिफिकेट के हर छोटे बड़े शहरों में आसानी से दिख जाते हैं। इनकी क्लीनिक फुटपाथ पर सजती है। अगर आप ये सोच रहे हैं, कि इन डॉक्टरों से इलाज करवाने वाले मरीज भी झोला छाप होते हैं, तो यह आपके मन का फितूर या गलतफहमी हो सकती है।
क्योंकि फुटपाथ पर चलने वाली इन क्लीनिक्स में रिक्शा व ऑटोचालकों से लेकर अधिकारी व नेता तक आते हैं। यही नहीं जिन युवाओं को आप कूल-डूड कहकर संबोधित करते हैं, वो भी इनके पेशेंट अकसर बन जाते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस की तरह लखनऊ का पॉश मार्केट हजरतगंज की तस्वीर में ऊपर आप देख सकते हैं। झोला झाप डॉक्टर को नहीं, बल्कि उनके पेशेंट का इक्नॉमिक स्टेटस आप उनकी वेशभूषा को देख आसानी से समझ सकते हैं।

कनमैलिये... ओह नहीं इस झोलाछाप डॉक्टर का नाम है सुरेश, जो आपके कान के मैल को आसानी से निकाल सकता है। हम इसे झोलाछाप डॉक्टर इसलिये कह रहे हैं, क्योंकि यह मैल निकालने के लिये सर्जिकल औजारों और दवाओं का इस्तेमाल करता है। और चंपी करते वक्त यह वही काम करता है, जो बड़े अस्पतालों में फीजियोथेरेपिस्ट करते हैं। और इसका हाथ लगते ही आपके सिर का दर्द भी छूमंतर हो जाएगा। फीस की बात करें तो कान सफाई के 10 रुपए और चम्पी के 20 रुपए। मालिश चमेली के तेल से की जाती है। यह डॉक्टर हर रोज करीब 150 रुपए कमा लेता है।
कान साफ करने का हुनर होने के बावजूद तमाम लोग ऐसे हैं, जो इनसे काम साफ कराने में डारते हैं। यही कारण है कि इनकी कमाई 150 रुपए प्रति दिन तक सीमित रह जाती है। जरा सोचिये अगर सरकार इन्हें चिन्हित करके सर्टिफाइड ट्रेनिंग दे और इनका पंजीकरण करे, तो इनकी सेवाओं का लाभ लोगों को और भी बेहतर मिल सकता है। यही नहीं आज अगर ये महीने के 5 हजार रुपए कमा रहे हैं, तो कल इनकी कमाई 15 हजार प्रति माह भी हो सकती है, बस जरूरत है एक पहल की। आगे पढ़ें- भारत की 20 गंदी बातें जो हैं कमाई का जरिया।












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