इतिहास के पन्नों से- वो सिनेमा हॉल, जहां फिल्में देखते थे नेहरू
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)। आप दिल्ली के सिनेमाघरों पर रिसर्च करें या बात करें और रीगल का जिक्र ना करे, ये तो नहीं हो सकता। दरअसल नई दिल्ली का ये पहला सिनमा हाल है। ये सन 1931 में बना। [विशेष कॉलम- इंतिहास के पन्नों से]
चूंकि ये कनाट प्लेस में है तो माना जा सकता है कि कनाट प्लेस के बनने के साथ ही ये भी बना। हालांकि पुरानी दिल्ली में तो पहले भी कई सिनेमाघर थे, पर नई दिल्ली में पहला सिनेमाघर रीगल ही था। पर पहले इधर नाटक भी खेलते जाते थे। इधर ही आकर लार्ड माउंटबेटन और उनकी श्रीमती जी ने कई अंग्रेजी नाटकों को देखा।
राजेन्द्र प्रसाद से नेहरुजी
इधर नाटकों की स्टेज अब भी देखी जा सकती है। नाटकों के साथ या कहें कि ही इधर फिल्में भी दिखाई जाने लगीं। इधर ही आकर देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कई फिल्में देखी। नेहरु जी ने इधर 1956 में चलो दिल्ली नाम की फिल्म देखी। रीगल का डिजाइन ब्रिटिश आर्किटेक्ट वाल्टर जार्ज ने तैयार किया था। वे नई दिल्ली के डिजाइनर एडविन लुटियंस की टीम में थे।
रीगल से गहरा संबंध
राजकपूर का तो रीगल से गहरा संबंध रहा। उनकी इधर बहुत सी फिल्में रीलिज हुईं। जिनमें बाबी,जागते रहो, संगम, बूट पालिश शामिल है। रीगल के मैनेजर अमर वर्मा बताते हैं कि उनकी आखिरी पिक्चर लगी थी सत्यम शिव सुंदरम।
रीगल की खास बात ये है कि इसमें कई बाक्स हैं। जिसमें आप सपरिवार या मित्रों के मजे में पिकचर देख सकते हैं। यानी आपको एक छोटा स्पेस मिल जाता है,जिसमें बैठकर आप पिक्चर का आनंद ले सकते हैं।
शांताराम पसंद करते थे
दिल्ली के सिनेमा घरों पर लगातार रिसर्च करने वाले दि हिन्दू अखबार के डिप्टी एडिटर जिय उस सलाम कहते हैं कि रीगल को वी. शांताराम भी बहुत पसंद करते थे। इसलिए उनकी दहेज(1950) तथा दो आंखें बारह हाथ(1958) इधर रीलिज हुई। इधर ही कागज के फूल (1959) और मदर इंडिया (1959) जैसी कालजयी जैसी फिल्में भी रीलिज हुई।













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