Pakistan: अब यहां से कहां जाएगा पाकिस्तान?
Pakistan: पाकिस्तान में अतंतः चुनाव हो ही गया। काफी टालमटोल के बाद साढ़े पांच साल बाद हुए इस चुनाव के परिणाम ने पाकिस्तान के लिए ही कई सवालों को जन्म दे दिया है। किसी भी पार्टी को साधारण बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार किसकी बनेगी और कैसे बनेगी, इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब पाकिस्तान में स्थिरता आएगी या चुनाव के बाद स्थितियां और बिगड़ेंगी?
एक सवाल और बहुत अहम है कि पाकिस्तानी सेना क्या जनता के सामने अपनी अहमियत और विश्वसनीयता बरकरार रख पाएगी? आर्थिक मोर्चे पर पहले से तबाह पाकिस्तान इस चुनाव के बाद क्या आर्थिक विकास की पटरी पर आ पाएगा?

हॉर्स ट्रैडिंग से बनेगी सरकार?
इन सभी सवालों का जवाब पाकिस्तान के बुद्धिजीवी भी ढूंढ रहे हैं। पर किसी के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। वे सभी आने वाले समय का इंतजार कर रहे हैं। पाकिस्तान के इस चुनाव के जो परिणाम आए हैं, उसमें सबसे ज्यादा आजाद अर्थात बिना किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लड़े उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है।
फिलहाल यह माना जा रहा है कि ये सारे चुने हुए आजाद नेशनल असेंबली के सदस्य इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ से संबंध रखते हैं और चुनाव के बाद अपना कोई ब्लॉक या गुट बनाएंगे। लेकिन पहले ही पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने यह साफ कर दिया है कि चुने हुए आजाद उम्मीदवार किसी पार्टी के साथ संबंद्ध नहीं माने जाएंगे। इसका सीधा मतलब है कि किसी पर भी कोई व्हिप लागू नहीं होगा वे आसानी से अकेले या समूह में किसी भी पार्टी को समर्थन दे सकते हैं।
किसके लिए लाभ की स्थिति?
2018 में जब इमरान खान को बहुमत नहीं मिला तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने ही सरकार बनाने के लिए आवश्यक सांसद जुटा कर दिए थे। पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में चुनाव परिणाम के आधार पर ही महिलाओं और गैर मुस्लिम वर्गों के प्रतिनिधियों को नोमिनेट करने का कोटा मिलता है। यानी तहरीक ए इंसाफ पार्टी को किसी तरह का कोई कोटा प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि उस पार्टी के बैनर तले किसी ने चुनाव ही नहीं लड़ा है। इसका सीधा सा मतलब है कि नवाज शरीफ, आसिफ जरदारी और अन्य पार्टियों को ही इसका लाभ मिलेगा। स्पष्ट है कि पाकिस्तान की राजनीति में जोड़ तोड़ खुल कर होगी और अराजकता बरकरार रहेगी।
सेना का प्लान फेल
9 मई 2023 को पाकिस्तानी सेना के प्रतिष्ठानों पर हमले के लिए इमरान खान और उनकी पार्टी को दोषी मानकर सेना ने उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की है। इमरान की पार्टी के सभी प्रमुख सदस्य या तो उनको छोड़कर चले गए या फिर जेल में डाल दिए गए।
यही नहीं तीन-तीन अदालती फैसलों में इमरान खान को सजा दिलाने के बाद यह मान लिया गया है कि पाकिस्तानी आर्मी के मौजूदा मुखिया इमरान खान को किसी भी सूरत में बख्शने के मूड में नहीं है। चुनाव से पहले यह भी कहा गया कि पाकिस्तान सेना नवाज शरीफ को थाली में सजा कर प्रधानमंत्री का पद देना चाहती है। परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया है।
भले ही तकनीकी आधार पर नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल एन सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। लेकिन सच्चाई यह है कि इमरान खान द्वारा दिए गए टिकट पर जीत कर आने वाले सांसद नवाज की पार्टी के सांसदों के मुकाबले डेढ़ गुना ज्यादा हैं। साफ है कि पाकिस्तान की आवाम ने पाकिस्तान की आर्मी के प्लान को चौपट करके रख दिया है।
यदि अब भी जनरल आसिम मुनीर अपनी मूंछ ऊपर रखने के लिए नवाज शरीफ की सरकार बनवाने के लिए दबाव या खौफ का इस्तेमाल करते हैं तो बहुत संभव है कि वह अपनी साख पूरी तरह खो दें। पाकिस्तान की राजनीति में आर्मी के दखल का एक लंबा सिलसिला जो पाकिस्तान में चल रहा है कि उसका दुष्परिणाम आसिम मुनीर को ही ना भुगतना पड़ जाए।
क्या बदलेंगे इमरान के दिन
एक संभावना यह भी बन सकती है कि इमरान की पार्टी से जुड़े लोग पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना लें और आर्मी को इसका सपोर्ट करने के लिए मना भी लें। यह संभावना बलवती इसलिए दिख रही है कि चुनाव से पहले पीपीपी के नेता बिलावल जरदारी भुट्टो यह कह चुके हैं कि किसी भी स्थिति में वह नवाज शरीफ के नेतृत्व में बनने वाली सरकार के साथ नहीं जाएंगे।
तहरीक ए इसाफ पार्टी के लिए यह एक विन विन स्थिति बन जाएगी। उनके समर्थक आजाद सांसद आसिफ अली जरदारी के साथ इसी शर्त पर सरकार बनाने के लिए राजी होंगे कि इमरान खान पर चलने वाले मुकदमे खत्म किए जाए और उन्हें जेल से बाहर लाया जाए। पर इसके आसार तभी बनते हैं, जब पाकिस्तान की आर्मी इसके लिए तैयार हो जाए।
इसके लिए जनरल आसिम मुनीर को अपने सारे गिले शिकवे भूलने होंगे। उन्हें यह भी भूलना होगा कि किस तरह इमरान ने उन्हें आईएसआई के प्रमुख के पद से सिर्फ इसलिए हटा दिया था कि उन्होंने पंजाब में हो रहे घोटाले की शिकायत की थी, जिसमें इमरान खान की बेगम बुशरा बीवी के भी शामिल होने की खबर थी।
जनरल आसिम मुनीर को यह भी बिसार देना होगा कि इमरान ने अपनी ओर से इस बात की पूरी कोशिश की थी कि वह पाकिस्तान के आर्मी चीफ बन ही ना पाए। इसके लिए इमरान ने प्रधानमंत्री रहते जनरल बाजवा से यह डील करने की भी कोशिश की कि वह साथ दे तो आसिम मुनीर के रिटायरमेंट तक बाजवा को ही सेना प्रमुख बनाए रखने का एक्सटेंशन दें। आईएसआई के मौजूदा चीफ जनरल नदीम अंजुम को भी उस अपमान को भुला देना होगा, जिसमें इमरान खान ने पूरी सेना के नेतृत्व को मीर जाफर और जानवर कह कर संबोधित किया था।
फिर आईएमएफ़ प्रोग्राम और फिर महंगाई
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस चुनाव के बाद पाकिस्तान की आवाम का दुख दर्द कम होगा? आर्थिक मोर्चे पर किसी सुधार की कोई गुंजाइश दिखती है? इसका जवाब ना में है। क्योंकि सरकार किसी की भी बने, पाकिस्तान को एक बार फिर आईएमएफ के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा।
आईएमएफ से कर्ज के लिए पाकिस्तान को उसकी कड़ी शर्तें माननी पड़ेगी। यानी पाकिस्तान की नई सरकार को फिर से जनता पर आर्थिक बोझ की एक और किस्त बढ़ानी पड़ेगी। पेट्रोल डीजल, गैस के दाम बढाने पड़ेंगे। महंगाई का एक नया दौर शुरू होगा। फिर नई सरकार और जनता के बीच संघर्ष का एक नया सीजन शुरू होगा। दबाव बढ़ा तो सरकार बीच में ही जा सकती है या फिर से लोग पाला बदल सकते हैं। यानी यहां से भी पाकिस्तान में कोई स्थाई शांति दिखाई नहीं दे रही है।
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