Oscar Awards: कैसे मिलता है ऑस्कर अवार्ड, जोरदार लॉबिंग और प्रमोशन जरूरी
बॉलीवुड सहित अन्य रीजनल भारतीय फिल्म इंडस्ट्री, हॉलीवुड के बाद सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहती है। यहां हर साल तकरीबन 1800 से ज्यादा फिल्में बनती हैं, लेकिन फिर भी ऑस्कर अवार्ड जीत नहीं पाती।

Oscar Awards: महबूब खान की मदर इंडिया, मीरा नायर की सलाम बॉम्बे, और आशुतोष गोवारिकर की लगान ऐसी भारतीय फिल्में है जो ऑस्कर अवार्ड के लिए भेजी गई लेकिन अवार्ड नहीं जीत सकी। आखिर वजह क्या है? देश-विदेश में करोड़ों-अरबों का व्यापार करने वाली भारतीय फिल्में क्यों ऑस्कर के पटल पर जाकर पिछड़ जाती हैं? आइये, हम इसी को समझने की कोशिश करते हैं।
अभी आप सोच रहे होंगे कि अचानक ऑस्कर की बात क्यों हो रही हैं। दरअसल, भारत की फिल्म 'छेलो शो' (द लास्ट फिल्म शो) को ऑस्कर में ऑफिशियल एंट्री मिली है, उसे इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी में शामिल किया गया है। वहीं 'RRR' के नाटू-नाटू गाने को म्यूजिक (ओरिजिनल सॉन्ग) कैटेगरी में स्थान मिला है।
ऑस्कर के लिए कैसे होता है फिल्मों का चुनाव
ऑस्कर अवार्ड में विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म नाम से एक कैटेगरी होती है। इसी के अंतर्गत ऑस्कर अकादमी दुनियाभर की फिल्मों को आमंत्रित करती हैं। भारत की तरफ से भी हर साल ऑस्कर के लिए फिल्मों का चयन तो किया जाता है, पर ज्यादातर फिल्में आखिरी पांच में भी जगह नहीं बना पाती। मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे और लगान ही ऐसी मात्र तीन भारतीय फिल्में हैं जो ऑस्कर की आखिरी सूची तक तो पहुंची लेकिन अवॉर्ड नहीं जीत सकी।
ऑस्कर अवार्ड के लिए फिल्मों को चुनकर भेजने की जिम्मेदारी भारत की ओर से फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) की कमेटी करती है। इसके लिए नियम है कि पिछले एक साल के दौरान वह फिल्म देश के किसी सिनेमाहॉल में रिलीज हुई हो। साथ ही फिल्म अंग्रेजी में न हो मतलब देश की किसी भी आधिकारिक भाषा में होनी चाहिए। इसके साथ इंग्लिश सबटाइटल्स का होना जरूरी होता है। इन नियमों पर खरा उतरने के बाद किसी फिल्म को ऑस्कर के लिए भारत की ओर से भेजा जाता है।
ऑस्कर के लिए लॉबिंग बेहद जरुरी
भारत जिस फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजता है, उसके निर्माता पर अपने फिल्म को प्रमोट करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। जिस पर करोड़ों का खर्चा आता है। दरअसल ऑस्कर में दो तरह के लोग यह तय करते हैं कि कौन सी फिल्म नॉमिनेट होगी और कौन जीतेगी।
पहले हैं, एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज के मेंबर, इनकी संख्या तकरीबन 6,000 से ऊपर होती है। जबकि दूसरे हैं, अकाउंटिंग कंपनी प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स। अब यहां पर मामला यह है कि जिस निर्माता की फिल्म ऑस्कर के लिए नामांकित होती है, उसे सभी मेंबर्स के लिए अपनी फिल्मों के शो रखने होते हैं। उनको अपनी फिल्म दिखाने के लिए जी-हुजूरी भी करनी होती है। साथ ही स्क्रीनिंग, नाश्ता और बाकी खर्च भी उठाने होते हैं। अमेरिका (हॉलीवुड वहीं है इसलिए) की प्रमुख फिल्म मैगजीनों और अखबारों में विज्ञापन देना अनिवार्य होता है। जिससे वोट करने वालों की नजरों में वह फिल्म बार-बार आती रहे। यह पूरा खेल साइकोलॉजिकल है, जो टॉप ऑफ माइंड कॉन्सेप्ट (बार-बार एक ही चीज को दिखाकर या बताकर उसके दिमाग पर चढ़ा देना) पर काम करता है।
इन सब में फिल्म निर्माता के करोड़ों खर्च हो जाते हैं। फिर भी ऑस्कर अवॉर्ड के लिए शार्टलिस्ट होने के चांसेस कम ही होते हैं। क्योंकि हर साल विदेशी भाषा की कैटेगरी में तकरीबन 100 फिल्मों का चयन होता है। ऐसे में जो वोटर होते हैं, वे माउथ पब्लिसिटी, नेटवर्किंग या प्रमोशन में दिखने वाले चीजों से प्रभावित होकर वोट करते हैं। यही सब कारण है कि भारतीय फिल्में यहां पिछड़ जाती है क्योंकि भारत में अधिकतम कमाई करने वाली फिल्म का बजट 500 करोड़ तक होता है। जबकि ऑस्कर के लिए प्रचार-प्रसार में ही करोड़ों का खर्च हो जाता है। वहीं इतिहास में आप देखेंगे भारत की ओर से भेजी गई ज्यादातर फिल्में फिचर स्टोरी की तरह होती है।
जॉन बेली का भारतीय फिल्मों पर 'तंज'
साल 2019 में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज के तत्कालीन अध्यक्ष जॉन बेली भारत आए थे। तब उनसे पूछा गया कि आखिर भारतीय फिल्मों को ऑस्कर अवॉर्ड क्यों नहीं मिलता? इस पर जॉन ने कहा था कि मेरी बातों का गलत मतलब मत निकालिएगा, लेकिन सच यह है कि भारतीय फिल्मों को व्यापक रूप से नहीं दिखाया जाता है। मुझे पता है कि भारत की फिल्में चीन में बहुत लोकप्रिय हैं, लेकिन क्या वे कोरिया या जापान में लोकप्रिय हैं? क्या वे दक्षिण पूर्व एशिया में लोकप्रिय हैं? क्या फ्रांस में भारतीय फिल्में देखी जाती हैं? आपको पीआर संगठनों, डिस्ट्रीब्यूटर्स, सरकार से यह पूछना चाहिए कि भारतीय फिल्मों को दुनियाभर में प्रचारित क्यों नहीं किया जा सकता है? जिन फिल्मों को नॉमिनेशन के लिए भेजा जाता है, क्या वे दूसरे देशों को संबोधित करती हैं? इन सभी चीजों पर विचार करना होगा।
ऑस्कर में भारत सहित एशियाई देशों को मिलता है 'लॉलीपॉप'
अभी तक हमने बात की लॉबिंग और प्रमोशन की। मगर इसके अलावा भी एक काला सच है कि ऑस्कर में अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं को वास्तविकता में तवज्जो ही नहीं मिलती। खासकर इसमें एशियाई देशों को तो कुछ नहीं मिलता जबकि यूरोप की अन्य भाषाओं की फिल्मों को अवार्ड्स मिल जाते हैं।
हालांकि कुछ एशियाई फिल्मों को अवॉर्ड मिल चुके हैं। अभी तक एशियाई देशों में पैरासाइट (दक्षिण कोरिया) को बेस्ट मोशन पिक्चर अवार्ड, बेस्ट ऑरिजनल स्क्रीनप्ले, और बेस्ट डायरेक्टर; क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन (चीन) को बेस्ट प्रोडक्शन डिजाइन, बेस्ट सिनेमैटोग्राफी, और बेस्ट ऑरिजिनल स्कोर; रान (जापान) को बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन; और स्लमडॉग मिलियनेयर (हिंदी) को बेस्ट ऑरिजिनल सॉन्ग के लिए ऑस्कर मिला है। बाकि, ऑस्कर के इतिहास में गैर-अंग्रेजी भाषाओं की इस कैटगरी में बस फ्रेंच, इटेलियन और स्पैनिश फिल्मों का बोलबाला रहा है।
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