नेहरु को बचाने वाले बालवीर को भूला देश
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) हरीश मेहरा को याद है 2 अक्तूबर,1957 का मंजर। जगह थी राजधानी का तारीखी रामलीला मैदान। वक्त रहा होगा शाम के सात बजे। उस दिन उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरु की जना बचाई थी।

उसी के चलते वे देखते ही देखते ही सेलिब्रेटी बन गए थे। वे सेलिब्रेटी इसलिए बने थे क्योंकि उन्होंने मात्र 14 साल की उम्र में अपनी जान की परवाह किए बगैर पंडित नेहरु और तमाम अन्य गणमान्य नागरिकों को बड़े हादसे का शिकार होने से बचाया था।
मिला सरकार से सम्मान
उनकी उसी बहादुरी के चलते उन्हें सरकार ने पहले बाल वीर पुरस्कार से सम्मानित किया था। उसके बाद ही सरकार ने हर साल बाल वीर पुरस्कार देने का सिलसिला शुरू किया। मेहता के जेहन में उन दिनों की यादें जीवंत हैं।
चल रहा था रामलीला का कार्यक्रम
उस दिन वे राजधानी के एतिहासिक रामलीला मैदान में चल रही रामलीला के कार्यक्रम के दौरान वलंटियर की ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे। वीआईपी मेहमानों के लिए आरक्षित कुर्सियों पर पंडित नेहरु, श्रीमती इंदिरा गांधी, केन्द्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम वगैरह भी उपस्थित थे।
तब ही उस शामियाने के ऊपर तेजी से आग की लपटें फैलने लगीं जिधर तमाम नामवर हस्तिय़ां बैठीं थीं। " मैं तुरंत 20 फीट ऊंचे खंभे के सहारे उस जगह पर चढने लगा जिधर आग लगी थी। मेरे पास स्काउट का चाकू भी था। जिधर से आग फैल रही थी, वहां पर पहुंचकर मैंने उस बिजली की तार को अपने चाकू से काट डाला। इस सारी प्रक्रिया को अंजाम देने में मात्र पांच मिनट का वक्त लगा।"
हाथ झुलसे
उस शामियाने के नीचे बैठे तमाम आम और खास लोगों ने हरीश के अदम्य साहस और सूझबूझ को देखा। पर इस दौरान उनके दोनों हाथ बुरी तरह से झुलस गए। उन्हें राजधानी के इरविन अस्पताल (अब लोकनायक जयप्रकाश नायक अस्पताल) में भर्ती कराया गया। अगले दिन अस्पताल में उनका हालचाल जानने के लिए बाबू जगजीवन राम स्वयं आए।
जब वे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए तो उन्होंने फिर से अपने गिरधारी लाल स्कूल जाना शुरू कर दिया। जिंदगी फिर से अपनी रफ्तार से आगे बढ़ने लगी।उन दिनों की यादों को बांटते हुए हरीश जी बताते हैं, " उसके बाद मैं एक दिन अपनी कक्षा में बैठा था,उसी दौरान हमारे स्कूल के प्रधानाचार्य आ गए। उनके आते ही सारी कक्षा सम्मान में खड़ी हो गई।
जब सारे बच्चे बैठे तो उन्होंने बता या कि मुझे प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की तरफ से शुरू किए गए राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला हुआ है। उसके बाद मुझे फरवरी,1958 में प्रधानमंत्री निवास तीन मूर्ति में पंडित नेहरु ने सम्मान किया।
उन्होंने मेरे माता-पिता से कहा कि आपका पुत्र आगे चलकर देश का नाम रोशन करतारहेगा। हमें उस पार नाज है। वे हमारे साथ करीब 12-15मिनट तक रहे। इस उपलब्धि से गज्-गद् मेरे माता-पिता ने उस दिन सारे मोहल्ले में मिठाई बांटी।"
छपे इंटरव्यू
मेहरा की उपलब्धि पर स्थानीय अखबारों ने उनके इंटरव्यू छापने शुरू कर दिए। डीएवीपी ने उन पर एक वृतचित्र तैयार किया, जिसे देशभर के सिनेमा घरों में चलाया जाना लगा। आकाशवाणी ने भी उन पर एक कार्यक्रम तैयार किया। अब आया 26 जनवरी,1959 का दिन। उस दिन उन्हें गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का मौका मिला जब उनकी उम्र मात्री 14 साल थी। इसी के साथ वे पहले बाल वीर बने जिनको इतने बड़े सम्मान से नवाजा गया।
वृद्ध हो गया पहला बालवीर
खैर अब पहला बाल वीर वृद्ध हो चुका हैं। करीब 70 वर्षके वे हो गए हैं। चेहरे पर झुरियों को देखा जा सकता है। बाल सफेद हो चुके हैं। उनसे मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने वादे किए थे कि उनकी उपलब्धि के चलते उन्हें सरकार उन्हें पदोन्नति देगी। पर वादे तो वादे ही रहे।
हरीश चन्द्र मेहरा ने सपने देखे थे बेहतर और उज्जवल भविष्य के। पर सारे सपने चूर हो गए। आगे चलकर उन्हें परिवार की खराब आर्थिक हालत के कारण सरकारी नौकरी करनी पड़ी। वो लोअर डिवीजन क्लर्क के पद पर भर्ती हुए और उन्हें 35 सालों की सकारी नौकरी में एक पदोन्नति मिली। वो कुछ साल पहले रिटायर हो गए।
हालांकि उनसे सोनिया गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी ने वादा किया था कि उनकी शानदार उपलब्धि के चलते उन्हें उनके विभाग से कम से कम पदोन्नति अलग से दिलवाई जाएगी।












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