मुस्लिम वोट बैंक की उलझन में उलझे नरेंद्र मोदी

लोकसभा चुनाव का डंका बजने लगा है चुनाव है तो प्रचार होना भी लाज़मी है। सभी दल जुटे हुए हैं प्रचार में सबकी अपनी अपनी कोशिशें हैं पर किसकी कोशिश कितनी और क्या रंग लाती है यह तो चुनाव के परिणाम ही बतलाएंगे। मौजुदा हालात में हम स्पष्ट देख सकते हैं कि भाजपा इस चुनाव प्रचार की होड़ में भी बांकी दलों को पछाड़ रही है। परन्तु फिर भी भाजपा की संयुक्त जन समर्थन की चाह में अटकलें नजर आ रही हैं।

यूं तो भाजपा बिना मुस्लिम वोट बैंक के भी लोकसभा चुनाव में फतह हासिल कर सकती है पर फिर भी कहीं न कहीं वो इस तथ्य से भी अवगत है कि देश में शासन करने के लिए विवध समुदायों की खास तिमारदारी करना भी जरुरी है वरना सत्ता टिक नहीं सकती। शोयद इसी लिए खुद को धर्मनिरपेक्ष दल कहने वाली भाजपा को भी मुस्लिम समुदाय के आगे हाथ जोडना ही पड़ा।

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एक समारोह के दौरान भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुसिलम समुदायों से अतीत में घटित कुछ मुस्लिम विरोधी अप्रिय घटनाओं के लिए अपनी पार्टी की तरफ से माफी मांगी। पर फिर भी एक कसक रह ही गई कि इन घटनाओं से जुड़े नरेन्द्र मोदी जो कि भाजपा के पी.एम पद के दावेदार हैं वह स्वयं माफी मांगने नहीं आए खेद प्रकट करने नहीं आए। मोदी स्वयं को इन घटनाओं का उत्तरदायी नहीं मानते पर फिर भी मुसिलम समुदाय के बीच मोदी अब भी खटक रहें हैं। 2002 की दहशत भरी साम्प्रदायिक दुर्घटना की आग की चिनगारियां अब भी मुसिलम समुदाय के दिलों में धधक रही है।

ऐसे में चाहे भाजपा खुद को कितना भी धर्मनिरपेक्ष दल साबित करने का प्रयास क्यों न कर ले पर अतीत के प्रभाव के कारण उसका हर प्रयास अधूरा ही रहेगा। अब जब मोदी पी.एम पद के दावेदार हैं तो हिंदु समर्थकों का साथ मिलना तो निश्चित है पर मुस्लिम वोट बैंक पाना बहुत मुस्किल है। हां अटल जी के नेतृत्व में भाजपा एक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रुप में जरुर विकसित हुआ पर गोधरा काण्ड ने पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि पर प्रश्न चिह्र जरुर खडे़ कर दिए।

बहरहाल जो भी हो भाजपा कि तरफ से मुसिलम समर्थन हासिल करने की भी हर संभव तैयारी दिख रही है पर इतना तो तय है कि गुजरात जितना मोदी की जन प्रसिद्धि का कारण है कहें कि लोकसभा चुनाव के लिए उनका लकी कार्ड है वही अतीत के कारण उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए बैड लक भी है।

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