Mother's Day: भावनाओं को भुनाने का दिन बन गया मदर्स डे
बाजार ने मदर्स डे की भावनाओं को भुनाने के लिए मां के लिए फूल, केक, मिठाई, तोहफों आदि की भरमार तो कर दी, परन्तु मां की भारतीय लोक में क्या अवधारणा रही और परम्परा रही उसे विस्मृत कर दिया है।

Mother's Day: मई के दूसरे रविवार को विश्व में मदर्स डे अर्थात मातृदिवस मनाया जाता है। कहा जाता है कि यह दिन माताओं को समर्पित है। इस दिन की शुरुआत अमेरिका में एना जारविस ने अपनी मां की मृत्यु के बाद वर्ष 1908 में की थी। एना जारविस को इसकी प्रेरणा अपनी मां एन रीव्स जारविस से मिली थी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन महिलाओं को यह समझाने में लगा दिया था कि उन्हें बच्चों का पालन पोषण बेहतर तरीके से करना है और उनका यह भी सपना था कि माताओं के काम की कद्र की जाए।
बीबीसी के अनुसार वर्ष "1858 से वह मेथॉडिस्ट इपिस्कोपल चर्च में काफ़ी सक्रिय थीं। वहां पर वह एक मदर्स डे नेटवर्क चला रही थीं। इसका मकसद ऊंची शिशु मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर को कम करना था। ज़्यादातर इसकी वजह उनके क्षेत्र ग्रेफ़्टन, वेस्ट वर्जीनिया में फैली एक बीमारी थी।" इसी में प्रोफ़ेसर कैथरीन एंटोलिनी के अनुसार एन रीव्स खुद भी ऐसी महिला थीं जिनके नौ बच्चों की मृत्यु हो गयी थी। ऐसे में उनकी बेटी एना जारविस ने अपनी मां के लिए कुछ करने का विचार किया और उन्होंने चाहा कि इस दिन लोग अपनी मां के द्वारा किए गए त्याग को स्मरण करें, यह विचार चर्च को भी पसंद आया था। मई के दूसरे रविवार का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि जब उन्होंने यह मनाने का निर्णय लिया तो उस दिन 9 मई का दिन था और उनकी मां का जन्मदिन था।
वर्ष 1914 में राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने इसे अमेरिका में औपचारिक रूप से सहमति दे दी। देखते ही देखते बाजारवाद ने इस भावना को भुनाना आरंभ कर दिया। मदर्स डे का भी एक बिजनेस मॉडल दुनियाभर में खड़ा कर दिया गया। गिफ्ट, कार्ड का व्यापार भावुकता के रिश्ते पर भारी पड़ता गया। भारत में भी हम देखते हैं कि इस दिन को बाजार बहुत ही जोर शोर से प्रचारित करता है। लोग गिफ्ट और कार्ड आदि खरीदते हैं, जबकि एना स्वयं इस दिन के बाजारीकरण के इतने विरोध में थीं कि उन्होंने वर्ष 1920 में फूल न खरीदने की अपील की थी क्योंकि इस दिन फूलों के दाम आसमान छूने लगते थे। उनका कहना था कि माताओं के काम की सराहना के स्थान पर यह मात्र दिखावे का दिन बनकर रह गया है।
एना इस दिन के बाजारीकरण के इतने विरोध में थीं कि उन्होंने मदर्स डे के नाम पर चलने वाले तमाम समूहों के खिलाफ मुक़दमे दायर कर दिए थे और अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को उन्होंने इनसे लड़ने की कानूनी फीस में लगा दिया था। उन्होंने अपनी अंतिम सांस एक वृद्धाश्रम में वर्ष 1948 में ली थी।
यह तो मई माह के दूसरे रविवार को अमेरिका द्वारा आयोजित मदर्स डे की कहानी है, जो बीबीसी, हिस्ट्री चैनल आदि के ऑनलाइन पोर्टल्स पर उपलब्ध है। भारत में भी इस दिन को लोग अपनी माओं के कथित प्यार के प्रति समर्पित करते हैं, परन्तु कहीं न कहीं मां और सन्तान की सहज भावना उसी बाजारवाद का शिकार हो गयी है, जिस बाजारवाद का विरोध करते करते एना ने दम तोड़ दिया था।
भारत में ऐसी महिलाओं की एक लम्बी परम्परा रही है जिन्होनें मां शब्द की ऐसी परिभाषा का निर्माण किया था, जिसका स्मरण इस दिन किया जाना चाहिए। भारत के तमाम धर्मग्रंथों में मां शब्द की बहुत सुन्दर परिभाषा दी गयी है। महाभारत में जब यक्ष युधिष्ठिर की परीक्षा लेते हैं तो उनसे पूछते हैं कि भूमि से भी भारी कौन है? तो युधिष्ठिर कहते हैं कि: "माता गुरुतरा भूमेः पिता उच्चतरश्च खात्।" अर्थात माता भूमि से अधिक भारी हैं।
भारत में माता के नाम से ही पुत्र को ही पहचाना गया। जैसे कौशल्यानंदन, सुमित्रा नंदन, कैकेयीपुत्र, कौन्तेय, यशोदा नंदन, गौरी पुत्र आदि। यह तक कहा गया था कि जिस परिवार में मां का आदर नहीं होता वहां पर तमाम प्रकार के अनुष्ठान आदि विफल हो जाते हैं। मनुस्मृति में तो यहां तक लिखा है कि जिस परिवार में स्त्रियों को कष्ट होता है, वह कुल शीघ्र ही नाश की गति पर चला जाता है:
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्। न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
चाणक्य ने भी अर्थशास्त्र में गर्भवती स्त्रियों अर्थात भविष्य की माताओं को तमाम प्रकार की सुविधाओं का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा था कि गर्भवती महिलाओं को नदी पार कराने के लिए शुल्क नहीं लेना चाहिए।
शकुतंला और भरत, माता सीता और लवकुश, जीजाबाई और शिवाजी ये माता पुत्र के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिसमें मां ने अपने बेटों का ऐसा लालन पालन किया जो इतिहास में उदाहरण बन गया। लेकिन ऐसे ऐतिहासिक चरित्रों को छोड़कर अगर किसी ऐसे चरित्र के पीछे भागते हैं जिसका भारत भूमि से कोई रिश्ता ही नहीं है तो यह एक प्रकार से हमारे मानसिक क्षरण का ही लक्षण है।
ऐसे देश में जहां पर हर दिन मां के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए व्यतीत होता है, वहां पर एन रीव्स की याद में मनाया जाने वाला दिन मदर्स डे के रूप में स्थापित हो जाए, यह अजीब प्रतीत होता है। जब माँ के प्रति तमाम गौरवशाली अवधारणाओं को विस्मृत करके मात्र एना जारविस की उस विवश माँ की विवशता को स्मरण करने वाला दिन मातृ दिवस बन जाए, जिसने तमाम कुव्यवस्थाओं के चलते अपने 9 बच्चों को ही नहीं खोया था, बल्कि बीमारी का भी शिकार हुई थीं।
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एन रीव्स के साथ तमाम सहानुभूति व्यक्त करते हुए भी यही कहा जाना उचित होगा कि भारत में यदि मातृदिवस मनाना है तो रामायण-महाभारत से लेकर वर्तमान में जीजाबाई तक की तमाम ऐसी माताओं की शिक्षाओं को स्मरण किया जाए, उन्हें बार-बार दोहराया जाए तथा समाज के लिए उचित मातृशक्ति के उदाहरण प्रस्तुत किए जाएं।












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