Veer Savarkar: महात्मा गांधी ने कहा था, ‘भारत को वीर सावरकर के त्याग और देशभक्ति का बहुत जल्दी फायदा मिलेगा’
विनायक दामोदर सावरकर भारत के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली थी। आज के दिन 1966 में वीर सावरकर का निधन हुआ था।

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गांव में हुआ था। उन्हें वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। वीर सावरकर ने अभिनव भारत सोसाइटी नामक एक भूमिगत सोसाइटी की स्थापना की थी। वे इंडिया हाउस और फ्री इंडिया सोसाइटी जैसे क्रांतिकारी संगठनों से भी जुड़े रहे। वे 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। सावरकर ने 'द हिस्ट्री ऑफ द वार ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस' नामक एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने 1857 के महासंग्राम में इस्तेमाल किये गये छापामार युद्ध के तरीकों के बारे में लिखा था।
वीर सावरकर और महात्मा गांधी
वीर सावरकर की जीवनी लिखने वाले प्रख्यात लेखक धनंजय कीर ने लिखा है कि समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। इसमें एक व्यक्ति वह होता है, जोकि समाज के भलाई के लिए कष्ट सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठता है। गांधी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते थे। आपको बता दें कि धनंजय कीर, सावरकर के अलावा लोकमान्य तिलक, डॉ. भीमराव आंबेडकर और ज्योतिराव फुले के भी जीवनीकार हैं।
सावरकर को बहुत मान देते थे गांधी
लेखक धनंजय कीर के मुताबिक महात्मा गांधी का वीर सावरकर से रिश्ता बहुत पुराना था। वे एक-दूसरे से साल 1909 में विजयदशमी के दिन लंदन में पहली बार मिले थे। महात्मा गांधी ने उस दिन वहां एक भाषण देते हुए कहा था कि "उन्हें सावरकर के साथ बैठने का सम्मान मिला जिसपर उन्हें बहुत गर्व है। भारत को सावरकर के त्याग और देशभक्ति का बहुत जल्दी फायदा मिलेगा।"
इसके बाद, महात्मा गांधी और वीर सावरकर की मुलाकात 1927 में रत्नागिरी में हुई। तब गांधी रत्नागिरी के दौरे पर थे। सावरकर को वहां ब्रिटिश सरकार ने नजरबंद कर रखा था। दोनों ने अस्पृश्यता और शुद्धि के सम्बन्ध में लंबी बातचीत की। सावरकर को लेकर गांधी ने लिखा था कि "सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राणतक न्योछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अंततः हम दोनों का ध्येय भी एक है और मैं चाहूंगा कि उन सभी बातों के सम्बन्ध में आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमें आपका मुझसे मतभेद है। मैं जानता हूं कि आप रत्नागिरी से बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरुरी हो तो इन बातों पर जी भरकर बातचीत करने के लिए मुझे दो-तीन दिन का समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा।"
असहयोग आन्दोलन के चलते नहीं हुई थी सावरकर की रिहाई
वीर सावरकर की कालेपानी की सजा के दौरान असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था। इस आन्दोलन के चलते सावरकर बंधुओं की रिहाई में बाधा पैदा हुई थी। इसका स्पष्टीकरण भी स्वयं महात्मा गांधी ने दिया है।
बतौर महात्मा गांधी, "अगर असहयोग आन्दोलन न होता तो दोनों सावरकर बंधु भी कालेपानी से बहुत पहले छूट कर आ जाते लेकिन अभी तो असहयोग बाधक है।" दरअसल, असहयोग आन्दोलन का स्वरुप ही ऐसा था कि पूर्ण स्वराज्य की माँग के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में भरा जा रहा था और ऐसे में महात्मा गांधी चाहते हुए भी उनकी रिहाई के प्रयासों को अधिक बल नहीं दे सकते थे।
हालांकि, जब आन्दोलन 1922 में समाप्त हुआ तो एकबार फिर कांग्रेस द्वारा सावरकर की रिहाई के प्रयास शुरू किये गए। इस बार गांधी के करीबी माने जाने वाले मौलाना मोहम्मद अली ने सावरकर का खुलकर समर्थन किया। साल 1923 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्होंने अधिवेशन के पांचवें दिन सावरकर की रिहाई का एक प्रस्ताव पेश किया, जिसे पूरी कांग्रेस ने सर्वसम्मति से पारित किया।
स्वाधीनता आंदोलन की पुस्तक में मिला सावरकर को वीर नाम
1947 में स्वतंत्रता के बाद, अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक समिति का गठन किया, जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या, डॉ. एस. राधाकृष्णन, जय प्रकाश नारायण और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे नाम शामिल थे। इन सभी को भारत के स्वाधीनता आंदोलन पर एक पुस्तक 'टू द गेट ऑफ लिबर्टी' (To The Gates of Liberty) के प्रकाशन की जिम्मेदारी दी गयी थी। पुस्तक की प्रस्तावना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी और सावरकर के भी दो लेखों, आइडियोलॉजी ऑफ द वॉर इंडिपेंडेंस (Ideology of the War Independence) और द रानी झांसी (The Rani of Jhansi) को भी इसमें प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक की एक और विशेष बात यह थी कि इस समिति ने सावरकर के नाम के आगे 'वीर' लगाया था।
कम्युनिस्ट नेता भी देते थे सम्मान
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के ए.के. गोपालन और एच.एन. मुखर्जी जैसे वरिष्ठ संसद सदस्य हमेशा वीर सावरकर के पक्ष में खड़े रहते थे। जब 26 फरवरी 1966 में वीर सावरकर का निधन हुआ तो एच.एन. मुखर्जी ने ही सबसे पहले संसद द्वारा एक शोक संदेश जारी करने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा कि वीर सावरकर का निधन राष्ट्रीय महत्व का विषय है, संसद सदस्यों को उनकी संवेदनाएं पेश करने देना चाहिए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी ने भी उनकी बातों का समर्थन किया था। मगर ऐसा नहीं होने दिया गया।












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