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Lucknow Seat: कभी कांग्रेस का गढ़ था लखनऊ, अब 33 सालों से सीट पर है बीजेपी का कब्जा!

Lucknow seat: गोमती नदी के किनारे बसा लखनऊ नवाबों का शहर माना जाता है। अपनी तहजीब और नजाकत के लिए मशहूर लखनऊ संसदीय क्षेत्र देश की सबसे हॉट सीटों में शुमार है।

Lucknow Seat

यहां से वर्तमान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता व देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सांसद हैं।कभी लखनऊ लोकसभा सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती थी लेकिन अब यह बीजेपी का अभेद किला बनी हुई है। साल 1991 से इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है। ये वही सीट है जहां से देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पांच बार सांसद रह चुके हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए लखनऊ संसदीय सीट से बीजेपी ने राजनाथ सिंह को तीसरी बार मैदान में उतारा है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने विधायक रविदास मेहरोत्रा को उम्मीदवार बनाया है। जबकि बसपा ने लखनऊ सीट पर मुस्लिम दांव खेलते हुए 'सरवर मलिक' को अपना उम्मीदवार बनाया है।

लखनऊ का पौराणिक इतिहास

पौराणिक कथाओं के मुताबिक लखनऊ प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था। यह भगवान राम की विरासत थी, जिसे उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था। इसे लक्ष्मणावती, लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से भी जाना गया, जो बाद में बदलकर लखनऊ हो गया।

वैसे लखनऊ हमेशा से एक बहुसांस्कृतिक शहर रहा है। यहां के शासकों द्वारा शिष्टाचार, खूबसूरत उद्यानों, कविता, संगीत और बढ़िया व्यंजनों को हमेशा संरक्षण दिया गया। लखनऊ को 'नवाबों के शहर' के रूप में भी जाना जाता है। इसे पूर्व की स्वर्ण नगरी (गोल्डन सिटी) और शिराज-ए-हिंद के रूप में जाना जाता है।

लखनऊ लोकसभा सीट का सियासी इतिहास

लखनऊ लोकसभा सीट पर अब तक 18 बार आम चुनाव हो चुके हैं। जिसमें 8 बार बीजेपी और 7 बार कांग्रेस को जीत मिली है। जबकि जनता दल, जनता पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार को भी एक-एक बार सफलता मिल चुकी है।

इस लोकसभा सीट के तहत वर्तमान में कुल 9 विधानसभा सीटें (लखनऊ पूर्वी, लखनऊ उत्तरी, लखनऊ मध्य, लखनऊ पश्चिमी, सरोजनी नगर, लखनऊ कैंट, मोहनलालगंज, मलिहाबाद, बख्शी तालाब) आती हैं। जिसमें से 7 सीटों पर बीजेपी और 2 सीटों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है।

वैसे लखनऊ लोकसभा सीट का सियासी इतिहास बेहद ही दिलचस्प रहा है। आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव (1951-52) में कांग्रेस के टिकट पर प्रधानमंत्री नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने पहली जीत हासिल की थी। इसके बाद 1953 में संयुक्त राष्ट्र ने भारत की विजयलक्ष्मी पंडित को महासभा के 8वें अध्यक्ष के रूप में चुना, वह इस भूमिका के लिए चुनी गई पहली भारतीय महिला थीं।

उन्होंने संसद से इस्तीफा दे दिया और यह सीट खाली हो गई। उप चुनाव में भी नेहरू परिवार से ही श्योराजवती नेहरू सांसद बन गईं। उसके बाद 1957 में कांग्रेस से ही पुलिन बिहारी बनर्जी और फिर 1962 में बीके धवन लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन, कहानी में नया खेल 1967 में देखने को मिला। जब एक निर्दलीय प्रत्याशी ने कांग्रेस के 'किले' पर फतह किया।

दिलचस्प है निर्दलीय उम्मीदवार का यह किस्सा

साल 1967 में लखनऊ की संसदीय सीट पर एक निर्दलीय प्रत्याशी ने देश की बड़ी पार्टी के नेताओं को मात देते हुए संसद का सफर तय किया था। वे निर्दलीय प्रत्याशी थे आनंद नारायण मुल्ला। मुल्ला की जीत लखनऊ की सीट का ऐसा इतिहास है, जिसे कोई आज तक नहीं दोहरा सका है। आनंद नारायण मुल्ला उस चुनाव में कांग्रेस के बड़े नेता वीआर मोहन को हराकर संसद पहुंचे थे।

आनंद नारायण मुल्ला कश्मीरी ब्राह्मण थे। उनके पिता जगत नारायण मुल्ला मशहूर सरकारी वकील थे। आनंद नारायण वकालत करने के साथ ही उर्दू के कवि भी थे। साल 1967 में जब लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो उन्होंने पर्चा दाखिल किया। देश में कांग्रेस की लहर चल रही थी लेकिन मुल्ला की लोकप्रियता भी बहुत थी।

तब कांग्रेस ने बड़े नेता वेद रत्न मोहन को मैदान में उतरा। वेद रत्न मोहन लखनऊ के पूर्व मेयर रह चुके थे और अमीर घराने से थे। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनसंघ से चुनाव में आरसी शर्मा को टिकट मिला था। जब चुनाव हुए तो आनंद नारायण मुल्ला को 92,535 वोट मिले। दूसरे नंबर पर वेद रत्न मोहन को 71,563 वोट मिले जबकि आरसी शर्मा को 60,291 वोट मिले।

1971 में फिर हुई कांग्रेस की वापसी

1971 चुनाव में कांग्रेस ने शीला कौल को मैदान में उतारा। शीला कौल जवाहर लाल नेहरु के साले की पत्नी और इंदिरा गांधी की मामी थीं। उनके खिलाफ भारतीय जनसंघ ने पुरुषोत्तम दास कपूर को उतारा। इस चुनाव में पुरुषोत्तम को 1,19,201 वोटों से हराकर शीला कौल संसद पहुंचीं। हालांकि, 1977 में फिजा बदली और हेमवती नंदन बहुगुणा भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी शीला कौल को 1,65,345 वोटों से मात दी।

इसके बाद कांग्रेस ने 1980 और 1984 के लोकसभा चुनाव में शीला कौल को टिकट दिया और वे दोनों बार इस संसदीय सीट को जीतने में सफल रहीं। 1980 में उन्होंने जनता पार्टी के प्रत्याशी महमूद भट्ट को 30,382 वोटों से हराया। जबकि 1984 में लोकदल के प्रत्याशी मोहम्मद यूनुस सलीम को 1,22,120 वोटों से हराया।

इसके बाद साल 1989 में हुए आम चुनाव में जनता दल ने एक शिक्षक से नेता बने मंधाता सिंह को मैदान में उतारा और जबकि कांग्रेस ने दाऊजी पर दांव खेला। मंधाता सिंह ने दाऊजी को 15,296 वोटों से हराकर जनता दल को लखनऊ में पहली बार जीत दिलाई।

लखनऊ में हुई बीजेपी की एंट्री

जब पूरे देश में राम मंदिर और मंडल-कमंडल की राजनीति चल रही थी। तब 1991 में तकरीबन 29 सालों के बाद दोबारा अटल बिहारी वाजपेयी ने बीजेपी की ओर से लखनऊ लोकसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। जी हां! 29 साल बाद क्योंकि पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने 1955 में उपचुनाव लड़ा था और तीसरे स्थान पर रहे। फिर वह 1957 और 1962 में दूसरे स्थान पर रहे। इन 3 हार के बाद अब उन्होंने 1991 में यहां पर्चा दाखिल किया।

इस चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी को 1,94,886 वोट मिले, जबकि निकट प्रतिद्वंदी कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत सिंह को 77,583 वोट ही मिले थे। जबकि सीटिंग सांसद रहे मंधाता सिंह (जनता दल) को सिर्फ 22,357 वोट मिले थे, जिसके कारण वे चौथे स्थान पर चले गए थे। तीसरे स्थान पर झारखंड पार्टी के प्रत्याशी हीरू सक्सेना (डब्ल्यू) रहे थे।

1991 के बाद यहां से अजेय रहे अटल बिहारी वाजपेयी

लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी की एंट्री के बाद से वे लगातार पांच बार (1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 तक) यहां से सांसद चुनकर संसद पहुंचे। वे लखनऊ के सांसद रहते हुए ही देश के प्रधानमंत्री भी बने थे।
हालांकि, साल 2009 के आम चुनाव में बीजेपी ने अटल संसदीयबिहारी वाजपेयी की जगह उनके करीबी रहे लालजी टंडन को लखनऊ से उतारा। इस सीट पर अटल बिहारी का प्रभाव इतना था कि 2009 में चुनाव लड़ने के दौरान लालजी टंडन, अटल की चिट्ठी लेकर वोटरों से वोट निकल पड़ते थे।

इसके अलावा टंडन ने अटल बिहारी वाजपेयी की खड़ाऊं लेकर क्षेत्र में प्रचार तक किया था। अटल बिहारी वाजपेयी की चिट्ठी के सहारे ही लालजी टंडन इस सीट से जीतकर संसद पहुंचे।इसके बाद साल 2014 में बीजेपी ने राजनाथ सिंह को मैदान में उतारा। राजनाथ सिंह ने इस सीट पर 50.26% वोट दर हासिल कर अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी को 2,72,749 वोटों से पराजित किया।

इसके बाद 2019 के चुनाव में राजनाथ सिंह फिर मैदान में उतरे और इस बार वे 56.7% वोट दर हासिल कर सपा प्रत्याशी पूनम शत्रुघ्न सिन्हा (शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी) को 3,47,302 वोटों से पराजित कर संसद पहुंचे। कुल मिलाकर देखा जाए तो लखनऊ लोकसभा सीट पर 33 सालों से बीजेपी का कब्जा है। इस बार भी बीजेपी ने राजनाथ सिंह को लखनऊ सीट से मैदान में उतारा है।

लखनऊ सीट का जातीय समीकरण

लखनऊ लोकसभा सीट पर जातीय समीकरण को देखें तो यहां राजपूत, ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक लखनऊ जिले की आबादी करीब 46 लाख है। जिसमें पुरुषों की आबादी 24 लाख से अधिक और महिलाओं की आबादी करीब 22 लाख है। वहीं लखनऊ लोकसभा सीट में 2019 के आंकड़े के अनुसार 19.37 लाख वोटर हैं। जिसमें पुरुषों की संख्या 11 लाख और 9 लाख से अधिक महिला वोटर शामिल हैं। जातीय समीकरणों पर नजर डाले तो करीब 71 फीसदी आबादी हिंदू समाज से हैं। जिसमें 18 प्रतिशत वोटर राजपूत और ब्राह्मण का है। इसके अलावा 28 प्रतिशत ओबीसी, 0.2 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और करीब 18 प्रतिशत अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। जबकि साल 2011 की जनगणना के आधार पर लखनऊ लोकसभा में 26.36 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।

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