लालबहादुर शास्त्री ने की थी MSP की शुरुआत, जानिए क्यों होता है इस पर विवाद?
MSP: हरियाणा के किसानों ने सूरजमुखी के बीज को न्यूनतम समर्थन मूल्य अर्थात मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर खरीदने की मांग को लेकर कुरुक्षेत्र में 6 जून से 13 जून तक आंदोलन किया। इस दौरान दिल्ली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर किसानों ने 33 घंटों तक धरना दिया और जाम लगाकर रखा। इसके बाद आखिरकार हरियाणा सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा।
देश में एमएसपी को लेकर आन्दोलन पहले भी कई बार हो चुके हैं। कुछ दिनों पहले किसान आंदोलन के दौरान भी यह खूब चर्चा में रहा। इस बीच सवाल यह पैदा होता है कि आखिर एमएसपी क्या है? जिसे लेकर किसान बार-बार आंदोलित हो जाते हैं? उसकी शुरुआत कैसे हुई और इसे किसने शुरू किया था?

क्यों होती है एमएसपी की मांग?
दरअसल, किसान चाहते हैं कि उनकी फसल एमएसपी से कम पर कहीं भी नहीं खरीदी जाये। क्योंकि होता यह है कि सरकारी खरीद का कोटा पूरा होते ही मंडी और मंडी समितियां फसल खरीदना बंद कर देती हैं। जिसके चलते किसान अपनी फसल को आढ़तियों अथवा व्यापारियों को बेचता है। व्यापारी वर्ग एमएसपी के बजाय बाजार में डिमांड और सप्लाई के हिसाब से अपना भाव तय करते हैं। जिसमें किसान को कभी फसल का अच्छा मूल्य मिल जाता है तो कई बार एमएसपी से भी कम दरों पर उसकी फसल बिकती है। कुलमिलाकर इस व्यवस्था में किसान के सामने अनिश्चितता बनी रहती है। इसी अनिश्चितता से बचने के लिए किसान एमएसपी को लेकर बहुत संवेदनशील रहते हैं।
अब एमएसपी क्या है?
यह किसानों की फसल की वह न्यूनतम कीमत होती है जो सरकार तय करती है। इसे दूसरे तरीके से समझें तो देश की जनता तक जो भी अनाज पहुंचता है उसे पहले सरकार किसानों से एमएसपी यानि वह मूल्य जो सरकार की एक कमेटी द्वारा तय किया जाता है, उस मूल्य पर खरीदा जाता है और फिर राशन सिस्टम या अन्य योजनाओं के तहत सरकार जरूरतमंद लोगों तक उसे पहुंचाती है। सरकार द्वारा किसानों के उत्पाद खरीदने के लिए तय किया गया मूल्य ही एमएसपी कहलाता है।
कौन तय करता है एमएसपी?
सरकार हर साल रबी और खरीफ फसलों पर एमएसपी घोषित करती है। यह एमएसपी, कृषि लागत और मूल्य आयोग अथवा सीएसीपी (Commission for Agricultural Costs and Prices) द्वारा तय किया जाता है। सीएसीपी एक सरकारी समिति है, जिसमें मुख्य रूप से 4 सदस्य होते हैं। इसमें एक अध्यक्ष, एक सदस्य सचिव और दो अन्य सचिव शामिल होते हैं। सीएसीपी समय के साथ खेती की लागत के आधार पर फसलों की कीमत तय करके अपना सुझाव सरकार को भेजती है और सरकार इन सुझावों के आधार पर एमएसपी की दर तय करती है।
किन फसलों पर एमएसपी मिलता है?
● 7 अनाज वाली फसलें - धान, गेहूं, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ
● 5 दालें - चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर
● 7 ऑयलसीड - मूंग, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी, तिल, नाइजर या काला तिल, कुसुम
● 4 अन्य फसल - गन्ना, कपास, जूट, नारियल
देश में कब आया एमएसपी?
देश में किसानों को उनकी मेहनत और लागत के हिसाब से फसलों का उचित दाम न मिलने की समस्या बहुत पुरानी है। जब देश आजाद हुआ तो देखा गया कि जिस साल अनाज कम पैदा होता उस साल कीमत बढ़ जाती थी और जब अधिक होता तो दाम कम हो जाता था।
किसानों की इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966) ने पहल की। प्रधानमंत्री शास्त्री ने 1964 में अपने सचिव एल.के. झा के नेतृत्व में खाद्य और कृषि मंत्रालय की खाद्य-अनाज मूल्य कमेटी का गठन करवाया। शास्त्री जी का मानना था कि किसानों को उनकी उपज के बदले उचित मूल्य मिलना चाहिए ताकि उन्हें ज्यादा नुकसान न हो। इस कमेटी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट 24 दिसंबर 1964 को सौंप दी।
इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने इस पर मुहर लगा दी। हालांकि, तब कितनी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाया जायेगा यह तय नहीं किया गया था। साल 1966-67 में पहली बार गेहूं और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया। कीमत तय करने के लिए केंद्र सरकार ने कृषि मूल्य आयोग का गठन किया और जिसका नाम बदलकर 1985 में कृषि लागत और मूल्य आयोग कर दिया गया। यही सीएसीपी कहलाता है।
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