Student Suicides: टूटते सपने या हद से ज्यादा तनाव, क्यों आत्महत्या कर रहे हैं विद्यार्थी?

Student Suicides: "खुदकुशी एक ऐसा रास्ता है जो हर कठिन से कठिन समस्या से अंतिम निजात दिलाने का पक्का समाधान है।" कुछ साल पहले यूपी के कानपुर देहात की 19 साल की एक युवती ने घरेलू उलझनों और पसंद के युवक से शादी नहीं होने के तनाव में गंगा नदी में कूदकर जान दे दी थी। खुद को खत्म करने से पहले उसने घर में एक पत्र छोड़ दिया था, उसमें ये लाइनें लिखी हुई थीं।

अभी मंगलवार (12 सितंबर 2023) को राजस्थान में कोचिंग सिटी के नाम से मशहूर कोटा में फिर 16 वर्षीय छात्रा ने खुद को फांसी लगाकर जान दे दी। वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी। सिर्फ इस साल कोटा में ही 25 छात्र-छात्राएं खुदकुशी कर चुके हैं। ये इंजीनियर और डॉक्टर बनने के सपने संजोए हुए यहां आए थे।

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दुनिया में इतने लोग हर साल दे देते हैं जान

दुनिया भर में सालाना करीब 8,00,000 (आठ लाख) लोग खुदकुशी कर लेते हैं। इनमें से 1,35,000 भारत के निवासी हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक़ 2019 में खुदकुशी करने वाले 77 प्रतिशत लोग निम्न और मध्य आय वर्ग वाले देशों के थे।

क्या कहती है सरकार की रिपोर्ट

हाल ही में सरकार की ओर से राज्यसभा में केरल के सांसद डॉ. वी. शिवदासन के सवालों का जवाब देते हुए केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार ने बताया कि 2023 के सात महीनों में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले 20 छात्रों के जान देने के मामले दर्ज किये गये हैं। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे केस 2018 में 21, 2019 में 19, 2020 में 7 और 2021 में 7 दर्ज किये गये थे। 2022 में इसमें अचानक इजाफा हुआ और यह संख्या 24 हो गई थी। ये सभी छात्र-छात्राएं ऐसे थे, जो केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, एनआईटी, ट्रिपल आईटी, आईआईएम और आईआईएसईआर में पढ़ाई कर रहे थे।

सबसे ज्यादा तनाव में हैं मेडिकल स्टूडेंट

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई एक जानकारी में देश के शीर्ष चिकित्सा नियामक प्राधिकरण ने खुलासा किया कि देश में सबसे अधिक तनावग्रस्त मेडिकल छात्र रहते हैं। यह बात भी सामने आई है कि आम लोगों की तुलना में मेडिकल क्षेत्र में खुदकुशी की ढाई गुना अधिक घटनाएं हो रही हैं। दरअसल करीब-करीब सभी मेडिकल कालेजों में नियम, सुरक्षा उपाय और सहायता प्रणाली का सख्ती से पालन नहीं किया जा रहा है।

पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक 64 एमबीबीएस और 55 पीजी मेडिकल छात्रों ने खुदकुशी कर ली और 1,166 छात्रों ने मेडिकल की पढ़ाई ही बीच में छोड़ दी। इनमें से 160 एमबीबीएस और 1,006 पीजी की पढ़ाई कर रहे थे।

कुछ ऐसे ही हालात में वर्ष 2010 से 2019 के बीच कुल 125 मेडिकल छात्रों, 105 रेजिडेंट्स डाक्टरों और 128 डाक्टरों ने खुदकुशी कर ली। सबसे ज्यादा 22.4 फीसद एनेस्थिसियोलॉजी और 16 फीसद प्रसूति-स्त्रीरोग विज्ञान के छात्रों ने खुदकुशी की। इसके अलावा 45.2 फीसद मेडिकल छात्रों, 23.1 रेजिडेंट्स और 26.7 फीसद डाक्टरों ने प्रताड़ना, जाति-आधारित भेदभाव, शैक्षिक दबावों और वैवाहिक कलहों की वजह से जानें दीं। उनमें से सिर्फ 13 फीसद ने खुदकुशी से पहले मनोचिकित्सक की सहायता ली।

विशेषज्ञों की राय

-विशेषज्ञ कहते हैं कि जब लोग सब जगह से निराश हो जाते हैं, तभी आत्महत्या या खुदकुशी जैसा दुस्साहस करने की सोचते हैं। कोई किसी परेशानी की शुरुआत में ही खुदकुशी के बारे में नहीं सोचता है। जब उन्हें लगता है कि अब कोई सहारा नहीं बचा है, तो वे फौरन इस रास्ते पर कदम बढ़ा देते हैं।

जब मानसिक वेदना ज्यादा गहरी हो जाती है, हर तरफ अंधकार ही दिखता है तब लोग अपने आप को खत्म कर इससे निजात पाने की सोचने लगते हैं। जैसे-जैसे दुनिया में तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे हमारी सहनशीलता और हालात से जूझने की क्षमता भी घटती जा रही है। चाहे पढ़ाई का प्रेशर हो या घरेलू दबाव, प्रेम में नाकामी हो या भविष्य की चिंता, व्यापार में घाटा हो या कर्ज के जाल से नहीं निकल पाने की बेचैनी, इनका सामना करने में हम बुरी तरह लाचार हैं।

ऐसे संकेत मिले तो सावधान हो जाएं

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर कोई लगातार निराशापूर्ण बातें कर रहा हो, अपनी पसंद की चीजों या कामों से दूरी बनाने लगा हो। उसका व्यवहार भी बदला-बदला सा लग रहा तो तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। ऐसे लोगों के खुदकुशी करने की आशंका बढ़़ जाती है।

मौजूदा जीवन शैली भी बन रही घातक

आज के समय में तकनीकी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है और मशीनी सुविधाएं हद से ज्यादा उपलब्ध हैं। इससे हम नैतिकता जैसी अमूर्त और आपसी भावनाओं की परवाह ही नहीं करते हैं। लिहाजा खुदकुशी करने वाले को यह तो समझ आती है कि उसके सामने समस्याओं का पहाड़ हैं, लेकिन उसको यह समझ नहीं आती है कि वह जो दुस्साहसिक कदम उठाने जा रहा है, उसका उसके करीबी लोगों पर क्या असर होगा। मसलन अगर माता-पिता में कोई एक या दोनों खुदकुशी कर लें तो उनके बच्चों का क्या होगा। रिश्तेदारों, पड़ोसियों ने साथ न रखा तो वे क्या करेंगे।

क्यों कमजोर हो रहा है आत्मबल

बिखरता परिवार, अकेलापन, प्री मैच्योरिटी एज, जीवन के हर पल में आक्रामकता का सामना, लगातार प्रकृति से दूर भागने, नैतिक विचारों से बचपन से ही दूरी, विभिन्न पारिवारिक संस्कारों में अरुचि, सामाजिक मानदंडों के प्रति नफरत जैसी सोच एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की क्षमता या यूं कहें कि आत्मबल को खत्म कर रही है।

क्या कहती है NCRB की रपट?

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया' रपट-2021 में बताया गया है कि वर्ष 2020-21 में कोविड के दौरान छात्रों की खुदकुशी में भारी इजाफा हुआ था, जो पिछले पांच वर्षों से लगातार बढ़ रही है। रपट में बताया गया है कि वर्ष 2020 में 12,526 मौतों से 4.5 फीसद की तेजी के साथ देश में प्रतिदिन 35 से अधिक के औसत से तेरह हजार से अधिक छात्रों की जानें जा चुकी हैं, जिनमें 10 हजार 732 खुदकुशी में से 864 का कारण परीक्षाओं में विफलता रही है। वर्ष 1995 के बाद पहली बार देश में वर्ष 2021 में सर्वाधिक स्टूडेंट खुदकुशी हुई हैं।

क्या है उपाय?

जीवन शैली में तकनीकी के साथ-साथ कुछ समय परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ बैठने, बातें करने, साथ रहने और हर पंद्रह-बीस दिन में सब लोग एक साथ कहीं घूमने जाने, किसी समारोह में शामिल होने और उत्सव जैसा माहौल बनाकर उसके आयोजन में साथ-साथ जुटने से आपसी लगाव और नैतिकता बढ़ती है। हम जितना अपनों के करीब आएंगे, उतना ही खुदकुशी जैसी समस्या से बचेंगे।

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