जानिए क्‍या है हुर्रियत कॉन्‍फ्रेंस, कश्‍मीर के लिए क्‍या है इसका मकसद

श्रीनगर। हुर्रियत कॉन्‍फ्रेंस का नाम आपने अक्‍सर कश्‍मीर संकट या फिर भारत-पाकिस्‍तान के बीच होने वाली वार्ता से पहले सुना होगा। पिछले वर्ष भारत-पाकिस्‍तान के विदेश सचिवों की मुलाकात होने वाली थी लेकिन सिर्फ हुर्रियत या फिर अलगाववादी नेताओं की वजह से वार्ता कैंसिल हो गई।

जुलाई में जब से कश्‍मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत हुई तब से ही घाटी का माहौल बिगड़ा हुआ है।

इन सबके बीच हुर्रियत कांफ्रेंस के आने वाले कैलेंडर माहौल को और बिगाड़ने में लगे हुए हैं। आज हम आपको बताएंगे कि हुर्रियत कॉन्‍फ्रेंस क्‍या है, इसकी शुरुआत कब हुई और इसका मकसद क्‍या था।

वर्ष 1993 को हुई शुरुआत

वर्ष 1993 को हुई शुरुआत

13 जुलाई 1993 को कश्‍मीर में अलगाववादी आंदोलन को राजनीतिक रंग देने के मकसद से ऑल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस (एपीएससी) का गठन हुआ। यह संगठन उन तमाम पार्टियों का एक समूह था जिसने वर्ष 1987 में हुए चुनावों में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के गठबंधन के खिलाफ आए थे।

शुरू से ही कश्‍मीर है एक विवाद

शुरू से ही कश्‍मीर है एक विवाद

अलग-अलग विचारधारा वाले इस संगठन में शामिल लोग जम्‍मू कश्‍मीर पर एक ही राय रखते थे। सभी मानते थे कि जम्‍मू कश्‍मीर भारत के अधीन है और सबकी मांग थी कि लोगों की इच्‍छा के मुताबिक इस विवाद का एक निर्धारित नतीजा निकाला जाए। घाटी में जब आतंकवाद चरम पर था इस संगठन ने घाटी में पनप रहे आतंकी आंदोलन को राजनीतिक चेहरा दिया और दावा किया कि वे लोगों की इच्‍छाओं को ही सबके सामने रख रहे हैं।

दो अलग-अलग विचारधाराएं एक साथ

दो अलग-अलग विचारधाराएं एक साथ

इस संगठन ने दो अलग-अलग लेकिन मजबूत विचारधाराओं को एक साथ रखा। एक विचारधारा के लोग वे थे जो जम्‍मू कश्‍मीर की भारत और पाकिस्‍तान दोनों से आजादी की मांग करते थे तो दूसरी विचारधारा के लोग वे थे जो चाहते थे कि जम्‍मू कश्‍मीर पाकिस्‍तान का हिस्‍सा बन जाए।

आतंकवाद और हुर्रियत

आतंकवाद और हुर्रियत

हुर्रियत कांफ्रेंस में जितने भी लोग थे वे या तो हुर्रियत की किसी आतंकी शाखा का हिस्‍सा रहे थे या फिर उनका किसी आतंकी संगठन से कोई न कोई ताल्‍लुक रहा था। इस वजह से ही हमेशा इस संगठन को एक अलग नजरिए से देखा गया।

हुर्रियत से पहले क्‍या

हुर्रियत से पहले क्‍या

एपीएचसी से पहले घाटी में तहरीक-आई-हुर्रियत कश्‍मीर (टीएचके) नामक एकअलगाववादी आंदोलन चल रहा था। इसका मुखिया मियां अब्‍दुल कयूम था और यह 10 संगठनों का समूह था। इसमें जमात-ए-इस्‍लामी, जेकेएलएफ, मुस्लिम कांफ्रेंस, इस्‍लामिक स्‍टूडेंट्स लीग, महाज-ए-आजादी, मुस्लिम ख्‍वातीन मरकज, कश्‍मीर बार एसोसिएशन, इत्‍तेहादुल मुस्लिमीन, दुख्‍तरान-ए-मिलात और जमायत-ए-अहले हदीज जैसे संगठन थे। हालांकि इसका ज्‍यादा प्रभाव नहीं था।

कैसे हुई हुर्रियत की तैयारी

कैसे हुई हुर्रियत की तैयारी

27 दिसंबर 1992 को 19 वर्ष के मीरवाइज उमर फारुक, जिन्‍हें जेएंडके आवामी एक्‍शन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था, उन्‍होंने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों की एक मीटिंग अपने घर मीरवाइज मंजिल पर बुलाई। इस मीटिंग का मकसद एक ऐसे गठबंधन को तैयार करना था तो जम्‍मू कश्‍मीर में भारतीय शासन का विरोध करे। सात माह बाद एपीएचसी अस्तित्‍व में आया और मीरवाइज इसके पहले मुखिया बने।

यासीन मलिक से लेकर गिलानी तक

यासीन मलिक से लेकर गिलानी तक

एपीएचसी की एग्जिक्‍यूटिव कांउसिल में सात अलग-अलग पार्टियों के सात लोग बतौर सदस्‍य शामिल हुए। जमात-ए-इस्‍लामी से सैयद अली शाह गिलानी, आवामी एक्‍शन कमेटी के मीरवाज उमर फारूक, पीपुल्‍स लीग के शेख अब्‍दुल अजीज, इत्‍तेहाद-उल-मुस्लिमीन के मौलवी अब्‍बास अंसारी, मुस्लिम कांफ्रेंस के प्रोफेसर अब्‍दुल गनी भट, जेकेएलएफ से यासीन मलिक और पीपुल्‍स कांफ्रेंस के अब्‍दुल गनी लोन शामिल थे।

दो सदस्‍यों की हत्‍या

दो सदस्‍यों की हत्‍या

जो लोग हुर्रियत का हिस्‍सा बने उनमें से दो की हत्‍या हो गई। मई 2002 में अब्‍दुल गनी लोन को आतंकियों ने मार दिया। लोन, इस समय पीपुल्‍स कांफ्रेंस के मुखिया सज्‍जाद लोन के पिता थे। सज्‍जाद बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी के बड़े फैन हैं और उन्‍होंने राज्‍य की सरकार में अपना समर्थन दियाा हुआ है। अब्‍दुल गनी लोोन के अलावा अगस्‍त 2008 में शेख अजीज की पुलिस फायरिंंग में मौत हो गई थी।

21 सदस्‍यों वाली वर्किंग कमेटी

21 सदस्‍यों वाली वर्किंग कमेटी

हुर्रियत की एक 21 सदस्‍यों वाली वर्किंग कमेटी थी जिसमें सात एग्जिक्‍यूटिव काउंसिल के सात सदस्‍य और सात पार्टियों से दो व्‍यक्ति शामिल थे। इसके अलावा 23 सदस्‍यों वाली एक जनरल काउसिंल, ट्रेडर्स बॉडीज, कर्मचारी युनियन और कई सामाजिक संगठन भी थे। एग्जिक्‍यूटिव काउंसिल में सदस्‍यता एपीएचसी के संविधान के मुताबिक बढ़ाई नहीं जा सकती थी लेकिन जनरल काउंसिल में सदस्‍य बढ़ सकते थे।

संगठन में बिखराव

संगठन में बिखराव

सितंबर 2003 में हुर्रियत दो भागों में बंट गई। एक सैयद अली शाह गिलानी का ग्रुप थो तो दूसरा मीरवाइज उमर फारूख का। गिलानी का ग्रुप किसी भी तरह से भारत सरकार के साथ बातचीत का पक्षधर नहीं था। वहीं मीरवाइज का ग्रुप हमेशा से चाहता था कि कश्‍मीर पर भारत सरकार के साथ बातचीत होती रहनी चाहिए।

मीरवाइज ने किया वाजपेई का समर्थन

मीरवाइज ने किया वाजपेई का समर्थन

जहां गिलानी अपनी सोच से पीछे हटने को तैयार नहीं थे तो वहीं मीरवाइज और उनके पक्ष ने पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति परवेज मुशर्रफ के उस चार सूत्रीय फॉर्मूला का समर्थन किया थ जो कश्‍मीर के लिए बनाया गया था। मीरवाइज के पक्ष को उस समय अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया। वर्ष 2004 में तत्‍कालीन उप प्रधानमंत्री लाल कृष्‍ण आडवाणी के साथ यह पक्ष वार्ता में शामिल हुआ।

मीरवाइज और यासीन मलिक गए पाक

मीरवाइज और यासीन मलिक गए पाक

मीरवाइज और यासीन मलिक दोनों ने श्रीनगर मुजफ्फराबाद सड़क के जरिए जूर्न 2005 में पाकिस्‍तान की यात्री की। यहां पर उन्‍होंने मुजफ्फराबाद में मौजूद अलगाववादी नेताओं से मुलाकात की और पाक सरकार के कुछ लोगों से भी मिले। इस दौरे के लिए दोनों वाजपेई सरकार की ओर से मदद मिली थी। श्रीनगर से दिल्‍ली, दिल्‍ली से इस्‍लामाबाद और फिर श्रीनगर से इस्‍लामाबाद, तक कश्‍मीर में शांति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

वर्ष 2002 के चुनावों में सामने आए मतभेद

वर्ष 2002 के चुनावों में सामने आए मतभेद

वर्ष 2002 में गिलानी ने पीपुल्‍स कांफ्रेंस का पार्टी के उम्‍मीदवार के मसले पर पार्टी छोड़ दी। सात सितंबर 2003 को गिलानी पक्ष ने हुर्रियत चेयरमैन अब्‍बास अंसारी को हटा दिया और मर्सरत आलम को इसक मुखिया बनाया गसा। इसके बाद हुर्रियत की सात सदस्‍यों वाली एग्जिक्‍यूटिव काउंसिल को भी खत्‍म कर दिया गया। पांच सदस्‍यों की एक कमेटी बनाई गई जिसे हुर्रियत का संविधान रिव्‍यू करने का काम दिया गया।

गिलानी ने छोड़ी जमात-ए-इस्‍लामी

गिलानी ने छोड़ी जमात-ए-इस्‍लामी

सैयद अली शाह गिलानी ने जमात-ए-इस्‍लामी पार्टी को भी छोड़ दिया और अगस्‍त 2004 में अपनी खुद की एक पार्टी तहरीक-ए-हुर्रियत जम्‍मू कश्‍मीर बनाई। आज यही पार्टी कश्‍मीर के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।

मीरवाइज के पक्ष में भी टूट

मीरवाइज के पक्ष में भी टूट

मीरवाइज के पक्ष में भी वर्ष 2014 में टूट हो गई जब इसके चार नेताओं डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के प्रेसीडेंट शब्‍बीर अहमद शाह, नेशनल फ्रंट के चेयरमैन नईम अहमद खान, महाज-ए-आजादी के चीफ मोहम्‍मद आजम इंकलाबी और इस्‍लामिक पॉलिटिकल पार्टी के मुखिया मोहम्‍मद यूसुफ नक्‍श ने मीरवाइज को छोड़ दिया।

मीरवाइज के पक्ष में भी टूट

मीरवाइज के पक्ष में भी टूट

मीरवाइज के पक्ष में भी वर्ष 2014 में टूट हो गई जब इसके चार नेताओं डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के प्रेसीडेंट शब्‍बीर अहमद शाह, नेशनल फ्रंट के चेयरमैन नईम अहमद खान, महाज-ए-आजादी के चीफ मोहम्‍मद आजम इंकलाबी और इस्‍लामिक पॉलिटिकल पार्टी के मुखिया मोहम्‍मद यूसुफ नक्‍श ने मीरवाइज को छोड़ दिया।

क्‍या कहता है हुर्रियत का संविधान

क्‍या कहता है हुर्रियत का संविधान

एपीएचसी का संविधान पार्टी को जम्‍मू कश्‍मीर की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक पार्टियों का एक संगठन बताता है। इसके नीचे दिए गए मकसदों के लिए तैयार किया-

  • जम्‍मू कश्‍मीर के लोगों के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ के मुताबिक एक शांतिपूर्ण संघर्ष को बढ़ावा देना ताकि उनकी आजादी सुनिश्चित हो सके।
  • भारत, पाकिस्‍तान, और जम्‍मू कश्‍मीर के लोगों के साथ मिलकर कश्‍मीर विवाद को एक वैकल्पिक समझौते के तहत हल करने की कोशिश करना।
  • कश्‍मीर में जारी संघर्ष को देशों और इसकी सरकारों के अलावा दुनिया के सामने भारत के बलपूर्वक और झूठे कब्‍जे के तौर पर दिखाना।

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