'आप' की शुरुआत धमाकेदार, क्या प्रशासन होगा शानदार?

आप के 28 प्रत्याशी जीत कर विधायक बने। इस जीत ने उस धारणा को तोड़ दिया, जिसमें लोग कहते थे कि चुनाव जीतने के लिये करोड़ों रुपए की जरूरत होती है। सच पूछिए तो पहली बार सत्ता में आये आप के विधायकों में अधिकांश की पृष्ठभूमि बेहद साधारण है। अब सवाल यह उठता है कि आप के ये साधारण लोग क्या सरकार चला पायेंगे?
किसी ने सोचा नहीं था 28 सीटें जीतेगी आप
आम आदमी पार्टी को 29.5 प्रतिशत वोट मिले। यह सब सिर्फ बाहर से आये या फिर किसी छोटी सी संख्या में लोगों द्वारा दिये गये वोट नहीं हैं, बल्कि इससे यह साफ है कि दिल्ली की समृद्ध आबादी ने आप को स्वीकार किया है। 43 से घटकर 8 सीटों तक कांग्रेस के पहुंचने का बड़ा कारण था लोगों के अंदर भरा गुस्सा, महंगाई की वजह से छटपटाहट थी। यही दो बड़े फैक्टर थे कि लोगों में कांग्रेस के प्रति घृणा और निराशा भर गई। जिन लोगों ने आप के लिये वोट किये उन लोगों ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि इतनी बड़ी संख्या में जीत हासिल होगी।
आप को भरोसा लोकसभा चुनाव में करेंगे अच्छा प्रदर्शन
अब, आप नेता अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी लोकसभा चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं। पार्टी का दावा है कि देश भर में लगभग 350 जिलों में उसके सक्रिय कार्यकर्ता हैं और कार्यालय भी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि केजरीवाल की पार्टी क्या यह सफलता दोहरा पायेगी।
आप का लिटमस परीक्षण होगा प्रशासन
अगर केजरीवाल के वो प्रत्याशी जो बहुत थोड़े अंतर से हार गये, जीत गये होते, तो आम आदमी पार्टी को 28 की जगह 36 सीटें मिलतीं। अगर ऐसा होता तो केजरीवाल का असली लिटमस टेस्ट अभी से शुरू हो चुका होता। इस अग्निपरीक्षा में उन्हें उन समस्याओं के ढेर का सामना करना पड़ता, जिनके हल नहीं होने पर मतदाता कभी माफ नहीं करते। आम आदमी पार्टी वह पार्टी है जिसके पास जीरो एक्सपीरियंस है। आप पार्टी ने जनता से चांद-तारे तोड़ लाने जैसे वादे किये थे- आम जनता को 700 लीटर नि:शुल्क पानी और बिजली की कीमत को आधा करना।
दोनों ही असंभव हैं, खास तौर से बिजली की कीमतों को आधा करना, क्योंकि दिल्ली में बिजली का खर्च नित दिन बढ़ता ही जा रहा है। राज्य की उत्पादन क्षमता बहुत कम है, जबकि डिमांड ज्यादा की रहती है।
इसके अलावा, केजरीवाल ने वादा किया था कि वो मुस्लिम युवकों पर चल रहे आतंकवाद संबंधी मुकदमों को वापस लेंगे, यहां भी वो समाजवादी पार्टी की तरह फेल हो जाती।
पहले से ही समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार वादा पूरा करने में विफल होने के लिए मुस्लिम आबादी के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। सत्ता में आने और फिर मामलों को वापस लेने, बाटला हाउस मुठभेड़ के मुद्दे पर एक नहीं बल्कि कई विवादास्पद मामले चल रहे हैं, जो आप के मामले में बिल्कुल भी आसान नहीं होते। इसके अलावा, लगभग हर दूसरे दिल्लीवासी ने ऑटो रिक्शा के पीछे चस्पा पोस्टरों को देखा, जिन पर लिखा था कि आम आदमी पार्टी बलात्कार और छेड़छाड़ से दिल्ली में महिलाओं की रक्षा के लिए "कमांडो फोर्स" लायेगी।
पिछले साल 16 दिसंबर को जघन्य बलात्कार के बाद भी दिल्ली में कोई बदलाव नहीं आये, वास्तविकता यह है कि दिल्ली पुलिस ही दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। लिहाजा दिल्ली पुलिस की नाकामी पर जिस तरह शीला दीक्षित को कठघरे में खड़ा किया जाता था, उसी प्रकार अरविंद केजरीवाल भी नजर आते।
आम आदमी पार्टी इस बात को झुठला नहीं सकती कि उनकी इस शानदार जीत में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का बहुत बड़ा हाथ है।
अन्य राज्यों सिलसिला बरकरार रखना आप के लिए चुनौती
अगर आपको यह लग रहा है कि लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी की परफॉर्मेंस ऐसी ही रहेगी, तो हो सकता है यह आपकी गलत फहमी हो, क्योंकि अन्ना और केजरीवाल के बीच टकराव, केजरीवाल के सुनहरे राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगाने का काम कर सकता है। एक अन्य कारण यह कि 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का आंदोलन हमेशा से ही की दिल्ली व उसके आस-पास ही ज्यादा केंद्रित था। इसमें एक नाम नरेंद्र मोदी का भी जुड़ता है, जो केजरीवाल के सपनों को चकना चूर कर सकते हैं। उनकी लहर पूरे देश में चल रही है।
चुनाव के बाद किये गये सर्वेक्षणों के अनुसार इस बार जिन लोगों ने केजरीवाल की पार्टी को वोट दिया है, वो केंद्रीय चुनाव में मोदी के लिए वोट कर सकते हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय चुनाव हमेशा से विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कश्मीर, माओवाद, आतंकवाद और आर्थिक सुधारों के मुद्दे हमेशा शीर्ष पर रहते हैं।
निश्चित तौर पर अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव में पानी का परीक्षण करेंगे, और अगर सरकार बनी तो जनता की नजर उनके विधायकों की परफॉरमेंस पर भी होगी। वर्तमान में आसार तो यही दिख रहे हैं कि लोकसभा के साथ-साथ दिल्ली विधानसभा चुनाव दोबारा होंगे। ऐसे में केजरीवाल के लिये मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
दोबारा गलती नहीं दोहरायेगी भाजपा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा में भाजपा ने बहुत देर लगायी। यह उसकी सबसे बड़ी गलती थी। वह यह गलती अगली बार नहीं दोहरायेगी। और हां जब भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ पड़ते हैं, तब ज्यादातर मतदाता एक ही पार्टी को दोनों में वोट देना पसंद करते हैं। ऐसे में यह विचाराधारा आप के लिये यह बड़ी बाधा होगी। इसके अलावा, कांग्रेस के साथ गठबंधन कर दिल्ली में सरकार बनाने के प्रस्ताव को स्वीकार करना सबसे बड़ी मूर्खता। आप को यह याद रखना होगा कि जनता ने उसे वोट बाद में, कांग्रेस के खिलाफ वोट पहले किया है।
केजरीवाल ममता के रास्ते पर जा रहे हैं?
शुरुआत शानदार रही है, यह कहना जल्दबाजी होगा कि आम आदमी पार्टी ही स्पष्ट विजेता है। ग्रांड फिनाले अभी कुछ महीने दूर है। चुनाव जीतना एक बात है और प्रशासन चलाना दूसरी बात है। आप को भी कुछ ऐसे ही अनुभव प्राप्त हो सकते हैं, जैसे कि ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में प्राप्त हो रहे हैं।
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