15 August: कैसे मनाया गया था आजादी का पहला दिन, जानें उस दिन की गतिविधियां

15 August: 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराकर देशवासियों को संबोधित किया था। इसके पहले 14 अगस्त की आधी रात को ही पंडित नेहरू ने अपने प्रसिद्ध भाषण 'द ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' से संविधान सभा को परिभाषित किया था। लाल किले से पहले पंडित नेहरू ने संविधान सभा की ओर से नियुक्त देश के पहले गवर्नर जनरल माउंटबेटन के शपथ ग्रहण के बाद एक औपचारिक कार्यक्रम में उत्साही भीड़ से बचते हुए प्रिंसेस पार्क में तिरंगा फहराया था। उस पार्क में ब्रिटिश संवेदनशीलता को ठेस नहीं पहुंचाने के लिए यूनियन जैक को उतारने की योजना को पंडित नेहरू स्थगित करना चाहते थे।

दिल्ली की सड़कों पर 'पंडित माउंटबेटन की जय' के नारे भी लगे

लॉर्ड लुईस माउंटबेटन (25 जून, 1900- 27 अगस्त, 1979) ने पंडित नेहरू की तारीफ में इसकी चर्चा करते हुए लिखा। 'फिलिप ज़िग्लर माउंटबेटन: आधिकारिक जीवनी' (कोलिन्स, 1985) में उनके हवाले से 15 अगस्त को जश्न मनाती जनता की पंडित नेहरू को लेकर बढ़ी दीवानगी की चर्चा करते हुए लिखा कि संविधान सभा वाली इमारत से प्रिंसेस पार्क तक पहुंचने में उन दोनों को कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। वहीं, एलन कैंपबेल-जोहानसन लिखते हैं कि 15 अगस्त, 1947 के दिन दिल्ली की सड़कों पर 'जय हिंद', 'माउंटबैटन की जय' और कहीं-कहीं 'पंडित माउंटबैटन की जय' के नारे लग रहे थे।

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दिल्ली में पहले स्वतंत्रता दिवस समारोह की जगह बंगाल में अनशन पर थे महात्मा गांधी

दिल्ली में हो रहे पहले स्वतंत्रता दिवस के इस पूरे जश्न से भरे आधिकारिक आयोजन में देश के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी मौजूद नहीं थे। दरअसल, महात्मा गांधी 15 अगस्त 1947 को बंगाल के नोआखली (अब बांग्लादेश का हिस्सा) में फैली मुस्लिम-हिंदू सांप्रदायिक हिंसा को खत्म करने में जुटे थे। आजादी से पहले नौ अगस्त 1947 को ही वह कोलकाता पहुंचे थे। पहले वहां की बस्तियों में सांप्रदायिक तनाव खत्म कर शांति स्थापित करने के लिए काम किया। इसके बाद उन्होंने खून-खराबा रोकने के लिए अनशन शुरू कर दिया था।पंजाब

और बंगाल में जश्न की जगह चल रही थी खूनी जंग, शांति के लिए बंगाल पहुंचे थे गांधी

आजादी के समय देश की आबादी लगभग 32 करोड़ थी। सबसे नजदीकी यानी साल 1941 की जनगणना के मुताबिक आजादी के समय पंजाब की जनसंख्या 3,43,09,861 और बंगाल की कुल आबादी 6,14,60,377 थी। स्वतंत्रता के अमृत के साथ ही निकली विभाजन की विभिषिका से देश के यही दो प्रांत सबसे अधिक प्रभावित हुए थे। उस दौरान लगभग 10 करोड़ लोगों का सामान्य जीवन एक ही रात में कठिनाइयों में बदल गया था। धर्म के आधार पर मानवीय इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन की घटना से बदले सांप्रदायिक हालात को ठीक करने के लिए महात्मा गांधी पूर्वी पाकिस्तान के नजदीक लोगों को समझाने में जुट गए थे।

दिल्ली के अलावा बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता में क्या खास हो रहा था

डॉमिनिक लैपियर और लैरी कॉलिंस की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के हिंदी अनुवाद 'आधी रात को आजादी" के मुताबिक 15 अगस्त, 1947 की शुरुआत दिल्ली में संविधान सभा के बाहर शंखनाद से हुई थी। तत्कालीन बॉम्बे में अंग्रेजों की अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए विकसित किया गया 'बाम्बे यॉट क्लब' के गेट पर पुलिस वाले ने बोर्ड लगा दिया- 'बंद।' इसके पहले वहां गोरों के अलावा किसी और का प्रवेश नहीं हो सकता था। मद्रास के नटराज मंदिर से पीतांबर और दूसरी पवित्र वस्तुएं लेकर साधुओं का समूह दिल्ली पहुंच रहा था। प्रसिद्ध मंदिरों में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में विशेष प्रार्थनाएं हो रही थी। देश के चौथे महानगर कलकत्ता में खुद महात्मा गांधी लोगों को शांति का संदेश देते हुए कह रहे थे, 'यदि विवेक और भाईचारे की रक्षा कलकत्ता में हो गई तो समझ लीजिए कि सारे देश में हो गई। कलकत्ता के उदाहरण से सारे देश की मानवता जाग जाएगी।'

15 अगस्त को देश में और क्या-क्या हुआ जिसका जिक्र जरूरी है

10 मई, 1857 से शुरू स्वतंत्रता संग्राम का अपेक्षित परिणाम 15 अगस्त, 1947 को सामने आया। भारत ने आखिरकार आजाद सुबह का पहला सूरज देखा। इसके साथ ही देश ने विभाजन का काफी दर्दनाक घाव भी सहा। 15 अगस्त को 1947 को ही देश ने रक्षा वीरता पुरस्कारों-परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र की स्थापना भी की।

इसके अलावा 15 अगस्त की ऐतिहासिक तारीख को अन्य वर्षों में कुछ और उल्लेखनीय काम हुए हैं। इनमें साल 1972 में 15 अगस्त के ही दिन भारतीय डाक सेवा में 'पोस्टल इंडेक्स नंबर' यानी पिन कोड लागू किया गया था। देश के सुदूर इलाके में भी अलग पिन कोड होने से डाक की आवाजाही में आसानी होने लगी। 15 अगस्त को ही साल 1854 में ईस्ट इंडिया रेलवे ने कलकत्ता से हुगली तक पहली पैसेंजर ट्रेन चलाई गई थी। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसका संचालन 1855 में शुरू हुआ था। 15 अगस्त, 1872 को भारतीय दार्शनिक, योगी, पत्रकार, संपादक, कवि, लेखक, स्वतंत्रता सेनानी श्री अरबिंदो घोष का जन्म हुआ था। वहीं 15 अगस्त, 1886 को भारत के महान संत एवं आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस उर्फ गदाधर चटर्जी का निर्वाण हुआ था।

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