Politics on Rape: बलात्कार पर राजनीति क्यों?
Politics on Rape: वाराणसी में सामूहिक बलात्कार और एक राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता ने फिर से एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या नेताओं का बलात्कार के प्रति दृष्टिकोण राजनीति से प्रभावित होता है।

किसी एक पार्टी के लिए राजस्थान में बलात्कार अपराध है तो उसी पार्टी के लिए काशी का दुष्कर्म विरोधी पार्टी का चरित्र। महिलाओं के खिलाफ सामाजिक अपराधों को अलग अलग राजनीतिक नजरिए से देखने का ही एक परिणाम है बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि।
राजनीतिक दलों द्वारा लड़कियों को ही दोषी ठहराना
यह अक्सर देखा गया है कि जब भी किसी राजनीतिक दल, कार्यकर्ता या नेता पर बलात्कार या अशोभनीय व्यवहार का आरोप लगता है, तो वह दल गलती स्वीकार करने या खुद के लिए मानदंड स्थापित करने के बजाय पीड़िता या नारी जाति के ऊपर ही छींटाकशी करने लगता है। निर्भया कांड के बाद तब के आंध्र प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सत्यनारायण ने कहा था - "सिर्फ इसलिए कि भारत ने आधी रात को आजादी हासिल की, इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं अंधेरे के बाद बाहर निकल सकती हैं"।
उसी समय बीएसपी नेता राजपाल सैनी ने भी यह अनर्गल प्रलाप किया - "महिलाओं और बच्चों को फोन देने की कोई जरूरत नहीं है। यह उनका ध्यान भटकाता है और बेकार है। महिलाओं को फोन की जरूरत क्यों है? मेरी मां, पत्नी और बहन के पास कभी नहीं था मोबाइल फोन। वे इसके बिना भी जीवित रहे"।
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने तो हद ही पर कर दी। उनके शब्द थे - "लड़कियों की शादी 16 साल की उम्र में कर दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें अपनी यौन जरूरतों के लिए अपने पति मिल जाएं और उन्हें कहीं और जाने की जरूरत न पड़े। इस तरह बलात्कार नहीं होंगे।" हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य धर्मवीर गोयत ने भी कहा था -"बलात्कार के 90% मामले सहमति से होते हैं"।
सवाल तो समाजवादी पार्टी के नेता अबू आज़मी ने लड़कियों पर ही उठाया, जब उन्होंने कहा -"रात में उन पुरुषों के साथ घूमने की क्या ज़रूरत है जो रिश्तेदार नहीं हैं? इसे बंद किया जाना चाहिए।" एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने बलात्कार को एक प्रांत से जोड़ दिया। उनके बोल थे -"मेरे खिलाफ बिहारियों के खिलाफ बोलने के लिए बहुत सारे मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन कोई भी इस तथ्य के बारे में बात नहीं कर रहा है कि ये सब बलात्कारी बिहार के हैं"।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने भी कभी बलात्कारियों का बचाव किया था। उन्होंने कहा था -"बलात्कार के लिए पुरुषों को फांसी नहीं दी जानी चाहिए। वे लड़के हैं, उनसे गलतियाँ हो जाती हैं।" बिगड़े बोल के इतने सारे उदाहरण हैं, लेकिन मजाल है कि किसी पार्टी ने इस तरह की बेहूदा बातों के लिए अपने किसी नेता को जिम्मेदार ठहराया हो, या किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो। ये सारी बातें महिलाओं के प्रति राजनीतिज्ञों के मनोविज्ञान को ही दर्शाती हैं।
नई सोच की जरूरत
सख्त कानून और सज़ा के प्रावधान के बावजूद यदि बलात्कार जैसी सामाजिक समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है तो समाज को इनके बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। तभी भविष्य में इस अपराध की रोकथाम कर सकते हैं। सस्ते इंटरनेट ने पोर्न को आसानी से लोगों तक पहुंचा दिया है। पोर्न में बलात्कार, यातना, बंधन आदि पाशविक कृत्यों की भरमार होती है।
लड़की के शरीर पर अत्याचार या उसके साथ बलात्कार होते देख मजा लेने वाले भला कैसे मर्यादा और विवेक का इस्तेमाल कर सकते हैं। बच्चों का पालन-पोषण भी ऐसे माहौल में किया जा रहा है ,जहां ना तो उनके दोस्त होते हैं और ना ही परिवार के अन्य लोगों से मेल जोल होती है। बलात्कार करने वालों का जब भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया, यही पाया गया कि उनकी जेहन में इसका विचार नशा करके या पोर्न देख कर आया।
समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दलों को मिलकर एक ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसके तहत अश्लील फिल्में, बलात्कार, बंधन श्रेणी के पोर्न बनाने वालों को भी सज़ा मिले, क्योंकि ये अक्सर हिंसक कृत्य के लिए ट्रिगर के रूप में कार्य करते हैं। समाज और सरकारों को इस दिशा में जल्दी सोचना चाहिए।
नए कानूनों से कितनी उम्मीद
केंद्र सरकार ने संपूर्ण आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए संसद से तीन नए कानून पास करा दिए हैं। राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई है, और ये कानून अब लागू हो चुके हैं। बलात्कार और यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों में जो महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, उनके अनुसार महिलाओं के खिलाफ बलात्कार जैसी जघन्यता के लिए न्यूनतम सज़ा सात साल से बढ़ाकर दस साल कर दी गई है, जबकि नाबालिगों से बलात्कार के खिलाफ अलग कानून बनाए गए हैं।
यदि 16 साल से कम उम्र की लड़की से कोई बलात्कार करता है तो उसे आजीवन कारावास की भी सजा हो सकती हैं। 12 साल से कम उम्र की नाबालिग से बलात्कार पर मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। खास बात यह है कि नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में भी मौत की सजा दी जा सकती है। इसके साथ ही यौन उत्पीड़न के पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा के लिए भी एक नया कानून लाया गया है।
अब किसी महिला को धोखा देकर उसके साथ यौन संबंध बनाने को भी अपराध की श्रेणी में ले आया गया है। जो पुरुष लड़कियों को शादी का झूठा वादा करते थे, सेक्स संबंध स्थापित करते थे और फिर उन्हें छोड़ कर चले जाते थे, उन्हें भी अब न्याय के कटघरे में लाया जा रहा है, क्योंकि सेक्स के लिए भावनात्मक दबाव को भी बलात्कार के रूप में परिभाषित कर दिया गया है। उम्मीद की जा सकती है कि कानून के डर से भी लोग इस घृणित अपराध से दूर रहेंगे।












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