Halal Certification: क्या भारत की इकॉनमी से भी बड़ी है हलाल इकॉनमी, क्या हैं आतंकी कनेक्शन
इस्लाम के धार्मिक नियमों के अनुसार किसी भी खाद्य एवं इस्तेमाल में आने वाली वस्तु का हलाल होना जरुरी है। इसके लिए देश-दुनिया में हलाल प्रमाणन की संस्थाएं खुल गयी हैं जोकि अधिकतर अवैध हैं।

Halal Certification: कर्नाटक विधान परिषद में भाजपा के MLC एन. रविकुमार हलाल सर्टिफिकेशन पर पाबंदी का एक विधेयक लाने की पहल कर रहे हैं। उनका कहना है कि FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) के अलावा किसी अन्य निकाय द्वारा खाद्य वस्तुओं का प्रमाणन नहीं करना चाहिए। बगैर FSSAI सर्टिफिकेट के हलाल मीट के बेचने पर पाबंदी लगनी चाहिए।
रविकुमार का कहना है कि कुछ अनधिकृत संस्थान खाद्य उत्पादों को प्रमाणित करने में शामिल हैं और इसलिए अवैध रूप से बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया में यह बिल निश्चित रूप से मदद करेगा।
आखिर क्या है हलाल?
हलाल एक धार्मिक प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल इस्लाम में किया जाता है। इसका जिक्र इस्लामिक कानून शरियत में मिलता है। दरअसल, इस्लाम में कोई भी वस्तु जब तक हलाल नहीं होगी उसका इस्तेमाल हराम यानि वर्जित माना जायेगा। इसके लिए आजकल देशभर में ऐसी संस्थाएं खुल गयी हैं जो हलाल प्रमाणपत्र जारी करने का काम करती हैं। जबकि अधिकारिक एवं संवैधानिक रूप से उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं हैं। इस कारण से चाहे वह मीट हो या अन्य खाद्य पदार्थ सभी को हलाल प्रमाणित करने की एक होड़ लग गयी है। इसका नुकसान गैर-मुसलमानों को भी उठाना पड़ता है क्योंकि उनके यहां हलाल जैसी कोई प्रथा नहीं है। इसलिए यह उनके संवैधानिक और धार्मिक दोनों अधिकारों का हनन करता हैं।
कौन बांटता है हलाल के सर्टिफिकेट?
भारत ही नहीं दुनियाभर में कई ऐसी संस्थाएं हैं जो इस्लामिक शरियत कानून के हिसाब से हलाल के सर्टिफिकेट देती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि भारत सरकार ने ऐसे किसी भी प्रमाण-पत्र को बांटने के लिए किसी भी संस्था को अधिकृत नहीं किया है। फिर भी देशभर में ऐसी संस्थाओं का कारोबार जोरशोर से चल रहा है।
इन संस्थाओं में ग्लोबल इस्लामिक शरीयत सर्विस (नई दिल्ली), जमियत उलेम-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट (नई दिल्ली), हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (तमिलनाडु), काजी मुफ्ती मुहम्मद किफायतुल्लाह बक़ावी (तमिलनाडु), तकवा एडवाइजरी एंड शरिया इन्वेस्टमेंट सॉल्यूशन (महाराष्ट्र), जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र (महाराष्ट्र), मरकज़-उल-इस्लामिक तालिमी (इस्लामिया इजुकेशन सेंटर) (पश्चिम बंगाल) , इस्लामिक सेंटर फॉर हलाल सर्टिफिकेट (पश्चिम बंगाल), क़ुआरी जमील अहमद (हरियाणा), प्राइम सर्टिफिकेट प्राइवेट लिमिटेड (नई दिल्ली), और एलएमस असिस्टेंस सर्विस प्राइवेट लिमिटेड (उत्तर प्रदेश) के नाम प्रमुख हैं।
कितनी बड़ी है हलाल इकॉनमी
हलाल प्रमाणपत्र वाली संस्थाओं की सालाना आय करोड़ों अरबों डॉलर की हो चुकी है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनियाभर में सिर्फ हलाल खाद्य बाजार का हिस्सा वैश्विक बाजार का 16 प्रतिशत के लगभग हो चुका है। आगामी समय में इसमें 20 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। दीनार स्टैंडर्ड, द कैपिटल ऑफ इस्लामिक इकोनॉमी और सलाम गेटवे द्वारा प्रकाशित स्टेट ऑफ ग्लोबल इस्लामिक इकोनॉमी की 2018-19 की रिपोर्ट पर गौर करें तो हलाल अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की आय अरबों डॉलर तक पहुंच गई है।
हलाल इकॉनमी फिलहाल ट्रैवल क्षेत्र में 17,700 करोड़ डॉलर, खाद्य क्षेत्र में 130,300 करोड़ डॉलर, वित्तीय क्षेत्र में 243,800 करोड़ डॉलर, फैशन क्षेत्र में 27,000 करोड़ डॉलर, फार्मा क्षेत्र में 8,700 करोड़ डॉलर, कॉस्मेटिक क्षेत्र में 6,100 करोड़ डॉलर तक पहुंच चुकी हैं। वर्तमान में वैश्विक हलाल अर्थव्यवस्था 3.6 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। अनुमान यह भी है कि साल 2030 तक हलाल अर्थव्यवस्था का अनुमानित आकार 4.96 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। जोकि अमरीका, चीन और जापान जैसे देशों के अलावा अन्य सभी देशों की वर्तमान जीडीपी से भी अधिक होगा।
हलाल का आतंकी कनेक्शन?
पिछले कुछ सालों में आतंकवादियों की फंडिंग पर लगाम लगाने के लिए भारत समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पूरा जोर लगा रही हैं। इसमें सबसे अहम किरदार फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) का है। इसके अलावा यूरेशियन ग्रुप कोम्बाटिंग मनी लॉन्ड्रिंग एंड फाइनेंसिंग ऑफ टेररिज्म, एशिया/पैसेफिक ग्रुप ऑन मनी लॉन्ड्रिंग जैसी संस्थाएं भी मौजूद हैं। जिनका भारत भी सहयोगी देश है।
दरअसल, बीते दशक में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, उसी दौरान हलाल आर्थिक गतिविधियों ने भी गति पकड़नी शुरू कर दी थी। आज हलाल इकॉनमी का फायदा आतंकवादी संगठनों को भी मिल रहा है। दरअसल यह व्यवस्थित और अप्रत्यक्ष रूप से पूरा खेल खेला जाता है। इसलिए तो हलाल कंपनियों के पूरे व्यापार की आय को पारदर्शी करने की मांग भी उठने लगी है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के खिलाफ मुंबई के 26/11 आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए अमेरिका के एक हलाल प्रमाणित बूचड़खाने से पैसा इकट्ठा किया गया था। इसका खुलासा लश्कर-ए-तैयबा के दो आतंकी डेविड हेली और तहव्वुर राणा ने किया था। साल 2009 में रायटर्स ने लश्कर-ए-तैयबा को मिलने वाले फंड पर अपने लेख में कहा था कि पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए पैसा उद्योग-धंधों (हलाल) से मिलने वाले चंदे से आता है।
ऑस्ट्रेलिया में लाया गया था प्राइवेट बिल
साल 2015 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया ने एक प्राइवेट मेंबर बिल लाकर हलाल पर संदेह जताते हुए कहा था कि इसकी आय से आतंकियों को आर्थिक सहायता दी जा रही है। सीनेटर जॉर्ज क्रिशटेनसन ने उस समय ये लेख भी लिखा था कि अगर आप हलाल पदार्थों को खरीद रहे हैं तो आप इस्लामिक आतंकवाद को पैसा पहुंचा रहे हैं।
आतंकियों का केस लड़ती है हलाल सर्टिफिकेट देने वाली संस्थाएं?
सबसे बड़ी बात यह है कि हलाल प्रमाणपत्र से होने वाली कमाई का इस्तेमाल आतंकवादियों को कानूनी सहायता देने के लिए भी किया जाता हैं। इसमें सबसे प्रमुख दिल्ली स्थित जमीयत उलेमा-ए-हिंद है जोकि हलाल प्रमाणपत्र जारी करके करोड़ों रुपए की कमाई करती है। यह संदिग्ध आतंकियों के मुकदमे लड़ने और जेल से बाहर निकाल कर उनके पुनर्वास में मदद करती है। इसमें जर्मन बेकरी ब्लास्ट केस के दोषी इंडियन मुजाहिद्दीन का आतंकी मिर्जा हिमायत बेग, लश्कर कनेक्शन मामले का आरोपी अब्दुल रहमान, जयपुर के ISIS केस का आरोपी सिराजुद्दीन, 26/11 मुंबई ब्लास्ट का आरोपी इंडियन मुजाहिद्दीन का आतंकी असद खान, 2008 अहमदाबाद आतंकी हमले का आरोपी अफज़ल उस्मानी जैसे कई नाम शामिल हैं।
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