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Vilasrao Deshmukh: महाराष्ट्र की राजनीति में मिसाल रहे विलासराव देशमुख, सरपंच से लेकर CM के पद तक पहुंचे

विलासराव देशमुख ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत पंचायत चुनावों से की थी। इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में कदम रखा।

former cm of maharashtra Vilasrao Deshmukh journey and biography

Vilasrao Deshmukh: 26 मई 1945 को महाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभालगांव में जन्मे विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के 18 अक्टूबर 1999 से 18 जनवरी 2003 तक मुख्यमंत्री रहे। वह दोबारा 2004 से 2008 तक भी महाराष्ट्र सरकार में मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की थी। साथ ही पुणे के इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से कानूनी शिक्षा भी हासिल की थी। देशमुख ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत पंचायत चुनावों से की। जहां पहले वह पंच और फिर बाद में सरपंच बने। इसके बाद वह जिला परिषद के सदस्य और लातूर तालुका पंचायत समिति के उपाध्यक्ष पद पर भी रहे।

राजनैतिक सफर

विलासराव देशमुख ने युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष पद से अपने करियर की बड़ी पारी शुरू की। इसके बाद उन्होंने राज्य की राजनीति में कदम रखा। साल 1980 से 1995 तक विलासराव लगातार तीन बार विधानसभा के लिए चुने गए। इस दौरान उन्होंने कृषि, मतस्य, पर्यटन, उद्योग, गृह, ग्रामीण विकास, परिवहन, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, युवा मामले, खेल समेत अनेक पदों पर बतौर मंत्री अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। इसके बाद 1995 में चुनाव हार गए। पर किसे मालूम था कि चुनाव में हारे हुए विलासराव के लिए एक बड़ा पद उनका इंतजार कर रहा था। साल 1999 में चुनाव हुए और विधानसभा में उनकी फिर से वापसी हुई तो वह पहली बार महाराष्ट्र के सीएम बने। पर वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये। इसके बाद 2004 में दोबारा राज्य के मुख्यमंत्री बने। विलासराव की गिनती महाराष्ट्र कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में होती थी।

सरकार बचाने को लेकर मचा था बवाल

महाराष्ट्र में सरकार गिरने, बदलने का रिवाज काफी पुराना है। विलासराव देशमुख खुद इसका सामना कर चुके थे। यह बात 2002 की है। तब विपक्ष के नेता नारायण राणे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। इसके बाद कांग्रेस और एनसीपी अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने के हर संभव प्रयास करने लगी। कांग्रेस अपने विधायकों को बेंगलुरु ले गयी। इसके बाद वहां के किस्सों को हर्षवर्धन पाटिल ने अपनी आत्मकथा 'विधानगाथा' में लिखा है। उन्होंने लिखा कि कैसे बेंगलुरु में विधायक कमरों में रहने के लिए आपस में लड़ रहे थे। कोई कह रहा था कि इसके साथ नहीं रहूंगा, तो कोई कह रहा था कि इस विधायक के साथ रहूंगा। मामला यहीं नहीं रूका।

जहां विधायकों को रुकवाया गया था वहां एक दिन का तीन लाख रुपये बिल आ रहा था तो हर्षवर्धन पाटिल ने वहां के प्रबंधन से बात करके सुविधाओं को कम करवाया। आत्मकथा में पाटिल ने खुद इस बात का जिक्र किया है कि कैसे विधायकों को बिना बताए उन्होंने ये सब किया। इसके बाद कुछ विधायक धोतियों में ही स्वीमिंग पूल में उतर गए। पाटिल लिखते हैं कि मधुकर चव्हाण और आनंदराव देवकाते जैसे वरिष्ठ नेता भी धोती पहनकर स्वीमिंग पूल में उतर चुके थे। मीडिया को जब इस बात का पता चला कि विधायक बेंगलुरु में है और वहां स्वीमिंग पूल में नहा रहे हैं तो उन्होंने विधायकों का सीधा लाइव प्रसारण कर दिया। इसके बाद विलासराव ने पाटिल से बात की। पर विधायकों को स्वीमिंग पूल में जाने से रोकने पर वह नाराज हो सकते थे, इसलिए हर्षवर्धन पाटिल ने स्विमिंग पूल में पानी बंद करवा दिया ताकि विवाद न हो।

26/11 का हमला और विलासराव

जब विलासराव देशमुख के मुख्यमंत्री पद का दूसरा कार्यकाल चल रहा था। उसी दौरान मुंबई में 26/11 सीरियल ब्लास्ट हुए थे। उन्होंने इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा से दिया था। उस दौरान उनकी आलोचना भी हुई थी क्योंकि विलासराव हमले के बाद अपने बेटे फिल्म अभिनेता रितेश देशमुख और फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा के साथ होटल ताज का मुआयना करने पहुंचे थे। इस मामले पर विपक्ष ने उनकी जबरदस्त आलोचना की थी।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि वह अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए रामगोपाल वर्मा को होटल ताज ले गये। इस्तीफे के बाद विलासराव ने केंद्रीय राजनीति की ओर रुख किया। वह राज्यसभा के सदस्य बने। साथ ही उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई। विलासराव देशमुख की किडनी और लिवर में दिक्कत होने के कारण लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 14 अगस्त 2012 को चेन्नई के ग्लोबल हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया।

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