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बकरी, मुर्गी पालन से मिल सकती है गरीबी से मुक्ति

नई दिल्ली। रोजमर्रा के जीवन में थोड़ा हस्तक्षेप से देश के अत्यधिक गरीब लोगों की संपत्ति में 15 फीसदी, खपत में 26 फीसदी और बचत में 96 फीसदी वृद्धि हो सकती है। यह तथ्य छह देशों में सर्वाधिक गरीब 21 हजार लोगों के जीवन पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया है।

Goats

उदाहरण: मुर्गी, बकरी या ऐसे अन्य उत्पादों का कारोबार। पान के पत्ते और सब्जियां जैसे सामानों की बिक्री। ऐसे उत्पादों का उपयोग करने का प्रशिक्षण। संपत्ति को आपात स्थिति में बेचने से रोकने के लिए पैसे। मार्गदर्शन। स्वास्थ्य शिक्षा। 18 से 24 महीने के बीच बचत संबंधी सेवाएं।

ये हस्तक्षेप 'ग्रेजुएशन मॉडल' के आधार पर किए गए, जिसके तहत अत्यधिक गरीब लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में मदद की गई।

अमेरिका के बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब (जे-पीएएल) के शोधार्थियों ने इस मॉडल का परीक्षण भारत के अलावा इथोपिया, घाना, होंडुरास, पाकिस्तान और पेरू में किया।

माइक्रो क्रेडिट के अंतर्गत ले सकते हैं लोन

एक अन्य शोधार्थी जे-पीएएल के संस्थापक तथा अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी के मुताबिक, "इस कार्यक्रम के काम करने का तरीका माइक्रो क्रेडिट या स्वयं-सहायता समूह के तरीके से थोड़ा भिन्न था, जिसमें परिवार को संपत्ति की कीमत वापस नहीं चुकानी थी। साथ ही प्रशिक्षण और सहायता से लाभार्थी को अपने चुने हुए स्वरोजगार क्षेत्र का पूरा लाभ उठाने में मदद मिली।"

माइक्रो-क्रेडिट कार्यक्रमों से गरीबी रेखा से थोड़े नीचे या कई बार थोड़े ऊपर के लोगों को मदद मिल पाती है। यह अत्यधिक निर्धन समूह तक नहीं पहुंच पाता है।

जे-पीएएल का यह शोध पश्चिम बंगाल में बंधन फायनेंशियल सर्विसिस की गैर-लाभकारी इकाई बंधन-कोन्नागर के माध्यम से किया गया।

20 से 25 हजार का खर्च

बंधन फायनेंशियल सर्विसिस के अध्यक्ष शेखर घोष ने कहा, "हमने एक साल तक एक निश्चित राशि दी और 18-24 महीने तक सहायता प्रदान की। हर लाभार्थी पर कुल 20 हजार से 25 हजार रुपये तक का खर्च बैठा, जिसमें 70 फीसदी संपत्ति और निश्चित नियमित भुगतान पर, 10 फीसदी प्रशिक्षण पर और शेष 20 फीसदी प्रबंधन और दो साल तक परियोजनाओं की निगरानी करने पर खर्च हुआ।"

घोष ने कहा कि इस कार्यक्रम के अंत में इसमें शामिल लोगों के पास अधिक संपत्ति और बचत थी। उन्होंने अधिक समय तक काम किया। कम दिन भूखे रहना पड़ा। उनमें तनाव कम दिखा और उनके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ।

सभी छह देशों में शोधार्थियों ने 10,495 परिवारों पर अध्ययन किया। उन्होंने दो साल के कार्यक्रम में शामिल किए गए लोगों और कार्यक्रम में शामिल नहीं किए गए लोगों पर अध्ययन किया। एक साल बाद उन दोनों समूह के लोगों के जीवन में आए बदलाव की तुलना की।

शोधार्थियों ने पाया कि तीन साल बाद कार्यक्रम के लाभार्थियों के पास दूसरे के मुकाबले काफी अधिक संपत्ति थी। उन्होंने अधिक बचत की। उन्होंने अधिक समय तक काम किया। कम दिन भूखे रह कर गुजारे। उनमें तनाव कम दिखा और उनके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ।

21.6 करोड़ लोगों के पास कोई संपत्त‍ि नहीं है

इंडियास्पेंड के मुताबिक, देश में 21.6 करोड़ लोग या 4.3 करोड़ परिवारों के पास कुछ भी संपत्ति नहीं है। इनमें से आठ करोड़ लोग या 1.6 करोड़ परिवार जनजातीय समूह के हैं।

सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) जैसी कई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला रही है।

इन पर 2013-14 में 47,014 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो 125 फीसदी बढ़कर 2015-16 में 1,06,115 करोड़ रुपये तक पहुंच गए हैं।

जे-पीएएल अध्ययन के मुताबिक दो साल में शिक्षकों और स्वास्थ्यसेवा सहित प्रत्येक लाभार्थी पर करीब 20 हजार रुपये खर्च हुए। सरकार यदि रोजगार योजनाओं के तहत उन्हें 58 दिनों का रोजगार देती, तब भी इतना ही खर्च होता।

अध्ययन के बेहतर परिणाम के कारण एनजीओ साझेदार बंधन ने इस कार्यक्रम को छह राज्यों में फैला दिया है। कार्यक्रम के दायरे में पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और मध्य प्रदेश के 32,280 परिवार आ गए हैं। इस कार्यक्रम के दायरे में 20 और देशों को भी लाया जा रहा है।

(एक गैर लाभकारी, जनहित पत्रकारिता मंच, इंडियास्पेंड डॉट ऑर्ग के साथ एक व्यवस्था के तहत। प्राची साल्वे संस्थान में नीति विश्लेषक हैं। यहां प्रस्तुत विचार उनके अपने हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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