Dog Bite Cases: क्यों नहीं रुक रही कुत्ता काटने की घटनाएं?
Dog Bite Cases: इन दिनों कुत्तों ने पुलिस, नगर निगम और पशु चिकित्सकों की नींद हराम कर रखी है। कानपुर से लेकर चेन्नई तक कुत्ता काटने और उसके कारण लोगों में दहशत पैदा होने की तमाम खबरें आ रही हैं। लोगों के गुस्से के चलते प्रशासन की भी शामत आई हुई है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कुत्तों या अन्य मवेशियों द्वारा किसी पर हमला करने या नुकसान पहुँचने पर राज्य को प्राथमिक रूप से जिम्मेदार माना है और मुआवजा का भी प्रावधान करने को कहा है।

कोर्ट ने मुआवजे के तौर पर प्रत्येक दांत के निशान के लिए न्यूनतम 10,000 रुपये और प्रत्येक 0.2 सेमी घाव के लिए न्यूनतम 20,000 रुपये तय किए हैं। अब दिल्ली में भी कुत्ते के काटने के पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग उठी है।
लोगों का गुस्सा चरम पर
हाल ही में चेन्नई में लोगों ने एक आवारा कुत्ते को पीट-पीट कर मार डाला। कहा जा रहा है कि उस कुत्ते ने कुछ ही समय के अंतराल पर 29 लोगों को काट लिया था। स्थानीय लोग कुत्ते और प्रशासन से इतने नाराज हुए कि कुत्ते की जान ही ले ली। कुछ महीने पहले ही आगरा के बाह ब्लॉक में आवारा कुत्तों के हमले में एक 8 वर्षीय लड़की की जान चली गई। अक्टूबर, 23 में बिहार के बेगुसराय में कुत्तों ने एक एक कर 9 महिलाओं की जान ले ली। इस साल की शुरुआत में हैदराबाद में भी एक 4 वर्षीय लड़के पर आवारा कुत्तों ने हमला कर दिया था।
हर साल हजारों लोग मरते हैं कुत्तों के काटने से
ग्लोबल हेल्थ जर्नल लैंसेट के अनुसार हर साल कुत्तों के हमले से लगभग 59 हजार लोग मारे जाते हैं। इनमें से सर्वाधिक मौत आवारा कुत्तों के काटने से होती है। भारत में आधिकारिक तौर पर 60 मिलियन से अधिक आवारा कुत्ते हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2022 के बीच कुत्तों के काटने के 1.5 करोड़ से अधिक मामले सामने आए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का आकलन है कि रेबीज से होने वाली कुल वैश्विक मौतों में से 36 प्रतिशत अकेले भारत में होती हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में यह औसत 65 प्रतिशत है। 2022 में सिर्फ दिल्ली में कुत्तों के काटने के 5559 मामले सामने आए।
सरकार के अधूरे मन से प्रयास
कहने को राज्य सरकारें कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, पालतू जानवरों को छोड़ने पर जुर्माना और आवारा कुत्तों पर नियंत्रण जैसे कार्यक्रम चला रहीं हैं, लेकिन ये उपाय कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। फिर कई बार पशु कल्याण संगठन भी आड़े आ जाते हैं। 2001 से ही भारत में कुत्तों को मारने पर भी प्रतिबंध है। हालांकि 2008 में मुंबई उच्च न्यायालय ने नगरपालिका को उपद्रव करने वाले कुत्तों को मारने की अनुमति दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को निलंबित कर दिया है।
कुत्ता प्रेमी भी कम नहीं हैं जिम्मेदार
बहुत से लोग कुत्ते के सामान्य व्यवहार की जानकारी के बिना ही उन्हें खरीद कर घर ले आते हैं। फिर बिना उनकी ठीक से देखभाल किए घंटों पिंजरे में बंद रखते हैं या जंजीर से बांधे रहते हैं। कई मामले में तो घर के बच्चों द्वारा जानवर को भड़काना, पीटना या किसी नुकीली चीज से वार करना भी कुत्ते के काटने का कारण बनता है। हमेशा कुत्तों की ही गलती नहीं होती है। कुछ जानवरों के साथ अलग तरह की समस्याएं हो सकती हैं।
सभी नस्ल के कुत्ते नहीं पाल सकते घर में
वैसे तो समय समय पर राज्य सरकारें कुत्ता पालने और उनसे जुड़ी लाइसेंसिंग नीति की समीक्षा करती रहती हैं, लेकिन पहली बार दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र से पिटबुल, टेरियर्स, अमेरिकन बुलडॉग और रॉटवीलर जैसी खतरनाक कुत्तों की नस्लों को रखने के लाइसेंस पर प्रतिबंध लगाने या रद्द करने के लिए तीन महीने के भीतर निर्णय लेने को कहा है।
6 दिसम्बर, 23 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने अक्टूबर में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अधिकारियों को इस मुद्दे पर निर्णय लेना है, क्योंकि संबंधित कानूनों और विनियमों का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। कोर्ट ने अधिकारियों से तीन महीने के भीतर निर्णय लेने को कहा है। याचिकाकर्त्ता ने आरोप लगाया था कि बुलडॉग, रॉटवीलर, पिटबुल, टेरियर्स, नीपोलिटन मास्टिफ जैसी नस्ल के कुत्ते खतरनाक हैं, लेकिन अभी भी कुछ राज्य पालतू जानवर के रूप में इनका पंजीकरण कर रहे हैं।












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