मैगी के बाद सेरेलेक को लेकर नेस्ले विवादों में, पहले कैडबरी और पेप्सी पर भी लग चुके हैं आरोप!
Nestle: हाल ही में स्विस एनजीओ 'पब्लिक आई' ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है और इस पर चिंता जताई है। दरअसल, एनजीओ ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि नेस्ले द्वारा भारत में बेचे जाने वाले सेरेलैक प्रोडक्ट्स में प्रति सर्विंग 2.7 ग्राम अतिरिक्त चीनी होती है। इसमें आरोप लगाया गया है कि नेस्ले मध्यम आय वाले देशों में अतिरिक्त चीनी के साथ बेबी फूड प्रोडक्ट्स बेचती है, जबकि ये प्रोडक्ट्स स्विट्जरलैंड, जर्मनी, यूके और फ्रांस जैसे विकसित देशों में अतिरिक्त चीनी के बिना बेचे जाते हैं।
लेकिन आपको बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब कोई बड़ी विदेशी फूड या ड्रिंक कंपनी विवादों में घिरी हो, इससे पहले भी कई प्रमुख विदेशी कंपनियां इस तरह के विवादों में घिर चुकी हैं।

कैडबरी
भारत में वर्ष 2003 में कैडबरी डेरी मिल्क के साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी वजह से कैडबरी की ब्रांड और बिक्री दोनों मिट्टी में मिल गई। यह घटना अक्टूबर 2003 में हुई, जब मुंबई में ग्राहकों ने डेयरी मिल्क चॉकलेट में कीड़े मिलने की शिकायत की। शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करते हुए महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमएफडीए) ने कैडबरी के पुणे प्लांट में बने चॉकलेट स्टॉक को जब्त कर लिया।
कैडबरी ने शुरू में दावा किया कि चॉकलेट में कीड़े फैक्ट्री में नहीं लगे, बल्कि दुकानदारों ने चॉकलेट को सही से स्टोर नहीं किया, उस वजह से लगे। लेकिन एमएफडीए इस तर्क से सहमत नहीं था, उन्हें मैन्युफैक्चरिंग के दौरान खराब पैकेजिंग या मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में गंदगी पर शक था।
विवाद के कारण नेगेटिव पब्लिसिटी हुई, जिससे कैडबरी की बिक्री में 30% की गिरावट आई, जबकि आमतौर पर त्योहारों पर 15% की बढ़ोतरी देखी जाती थी, क्योंकि दीपावली नजदीक ही थी। लेकिन फिर जनवरी 2004 में कैडबरी ने डेयरी मिल्क की पैकेजिंग को नया रूप देने के लिए इंपोर्टेड मशीनरी पर ₹15 करोड़ खर्च किए, एक 'मेटलिक पॉली-फ्लो पैकेजिंग' पेश की, जो महंगी थी लेकिन चॉकलेट की कीमत में वृद्धि नहीं हुई।
कैडबरी ने भारी-भरकम एंडोर्समेंट के लिए ब्रांड एंबेसडर अमिताभ बच्चन को भी शामिल किया, अपनी पर्सनल इक्विटी को दांव पर लगाया, और 2004 के जनवरी-मार्च क्वॉर्टर के लिए विज्ञापन खर्च में 15% से अधिक की वृद्धि की। मई 2004 में डेरी मिल्क की रिकवरी फिर से शुरू हुई और जून तक कैडबरी ने दावा किया कि ग्राहकों ने उस पर फिर से भरोसा करना शुरू कर दिया है।
कोका कोला और पेप्सी
2003 में कोका-कोला और पेप्सी को अपने सॉफ्ट ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड्स (कीटनाशक) कंटामिनेशन के आरोपों के कारण भारत में संकट का सामना करना पड़ा थे। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने दावा किया कि दोनों कंपनियां जो सॉफ्ट ड्रिंक बनाती हैं, उनमें यूरोपीय संघ के नियमों से 40 गुना अधिक स्तर तक पेस्टीसाइड थे।
इसके कारण कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन, प्रतिबंध और बिक्री में 35 से 40 प्रतिशत की गिरावट आई। कोका-कोला और पेप्सी ने सीएसई की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कहा कि उनके प्रोडक्ट इंटरनेशनल फूड सिक्योरिटी नॉर्म्स को पूरा करते हैं। हालांकि, सीएसई ने अपनी रिपोर्ट का बचाव करते हुए बेहतर फ्रेमवर्क और सॉफ्ट ड्रिंक्स की मैन्युफैक्चरिंग में उपयोग किए जाने वाले पानी की क्वालिटी पर सख्त नियमों की आवश्यकता का हवाला दिया।
भारत सरकार ने मामले की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति गठित की, जिसने सीएसई की रिपोर्ट को सही ठहराया। हालांकि, कोक और पेप्सी ने सीएसई की रिपोर्ट को बदनाम करने के लिए अपनी आपसी प्रतिद्वंदिता छोड़कर संयुक्त रूप से एक अभियान चलाया, केस दर्ज किए, लेकिन सीएसई ने अपना पक्ष रखा और केस वापस ले लिए गए। इस संकट से निपटने के लिए, दोनों कंपनियों ने अपनी छवि को फिर से बेहतर बनाने के लिए कदम उठाए, जिसमें पब्लिक रिलेशन को बेहतर करना और टॉप लेवल मैनेजमेंट को चेंज करना शामिल था।
नेस्ले
भारत में 2015 का मैगी क्राइसिस, नेस्ले को एक बड़ा झटका था। मामला तब सामने आया जब लैब टेस्ट्स में पाया गया कि मैगी नूडल्स में अत्यधिक लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) मौजूद है, जिसके कारण वो इंसानों के खाने के लिए असुरक्षित और खतरनाक थी।
विवाद 2014 में शुरू हुआ जब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के फूड सिक्योरिटी रेगुलेटर्स ने मैगी नूडल्स में अत्यधिक लेड और एमएसजी के मौजूद होने की सूचना दी। फिर इस मामले की जांच शुरू हुई और मैगी के सैंपल सेंट्रल फूड लेबोरेटरी (सीएफएल) को भेजे गए, और सीएफएल ने मैगी में लेड के ज्यादा स्तर में मौजूद होने की बात को सही ठहराया।
इसके बाद फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया (एफएसएसएआई) ने नेस्ले को मैगी नूडल्स वापस लेने को कहा। नेस्ले के पास 5 जून से 1 सितंबर, 2015 के बीच बाजार से लगभग 38,000 टन मैगी वापस लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। इसी के साथ एफएसएसएआई ने नेस्ले को मैगी को बाजार में बेचने के लिए बैन भी कर दिया गया था। क्राइसिस के कारण भारतीय बाजार में मैगी की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से घटकर शून्य हो गई।
बैन के कारण नेस्ले को ₹500 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ और कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री ने मैगी में एमएसजी होने के लिए नेस्ले पर ₹640 करोड़ का जुर्माना भी लगाया था। हालांकि, अगस्त 2015 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैगी पर से बैन हटा दिया, इस शर्त पर कि मैगी को री-लॉन्च किया जाएगा और वह भी एफएसएसएआई से अप्रूवल के बाद। फिर नवंबर 2015 में नेस्ले को एफएसएसएआई से मंजूरी मिली और मैगी को री-लॉन्च किया गया।
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