विदेश से आने वाली फ्लाइट मनमोहन सिंह के लिये शाप!

आप हंस रहे हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाये तो यह सच है। क्योंकि जब-जब मनमोहन फ्लाइट पकड़कर अपनी धरती पर लौटते हैं, तब-तब घरेलू विवाद उनके स्वागत के लिये खड़े रहते हैं। ऐसे ही कुछ उदाहरण हम आपके सामने परोस रहे हैं-
पहला मौका जून 2012:
जून 2012 में मनमोहन सिंह मेक्सिको और ब्राजील में आयोजित शिखरवार्ताओं से लौट रहे थे, तभी उनसे फ्लाइट में ही पत्रकारों ने तृणमूल कांग्रेस पर एक सवाल पूछ लिया। पीएम साहब के पास कोई जवाब नहीं था। घर पहुंचते ही ममता बनर्जी ने जमकर मनमोहन सिंह की फजीहत की। झगड़ा पश्चिम बंगाल को विशेष पैकेज को लेकर था। आगे चलकर ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को सपोर्ट करने से इंकार कर दिया। उस दौरान ममता बनर्जी ने मनमोहन का नाम राष्ट्रपति पद के लिये उड़ा दिया, जो कांग्रेस को ठेस पहुंचाने वाला था। ऐन मौके पर मुलायम सिंह ने यू-टर्न लेते हुए ममता बनर्जी की सारी योजना पर पानी फेर दिया और कांग्रेस के साथ खड़े हो गये।
दूसरा मौका सितंबर 2012
प्रधानमंत्री ईरान में नॉन-अलाइनमेंट मूवमेंट से वापस लौट रहे थे। तभी कोलगेट घोटाले यानी कोयला घोटाले का धमाका हो चुका था। विमान में मौजूद पत्रकारों ने जब इस्तीफे की बात छेड़ी तो पीएम ने कहा मैं भाजपा की डिमांड पर इस्तीफा क्यों दूं। मनमोहन ने विपक्षी दलों को जमकर कोसा कि वो संसद चलने नहीं दते हैं। मॉनसून सत्र विपक्ष ने ही बर्बाद करके रख दिया। इन सब बातों के बाद जब प्रधानमंत्री फ्लाइट से बाहर आये, तो भाजपा के कई नेताओं ने कोयला घोटाले के लिये मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया।
तीसरा मौका, सितंबर 2013
प्रधानमंत्री रूस में आयोजित जी-20 की शिखरवार्ता के लिये फ्लाइट पकड़ने से पहले विपक्षी दलों ने उन्हें कोयला घोटाले की खोयी हुई फाइलों को लेकर घेर लिया। तब मनमोहन काफी मशक्कत के बाद विपक्ष को शांत करा पाये।
चौथा मौका, सितंबर 2013
जी-20 की शिखर वार्ता से लौटते वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फ्लाइट में ही पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि वो अगले चुनाव के बाद पीएम नहीं बनना चाहते, बल्कि राहुल गांधी के अंडर में काम करना चाहते हैं। इस पर विपक्षी दलों ने मनमोहन की जमकर खिल्ली उड़ाई और पूछा कि अभी वो किसके अंडर में काम कर रहे हैं? पीएम की इस बात पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब तक भी तो वह राहुल गांधी के अंडर में ही काम कर रहे हैं। अब और कितना देश को कितना गुमराह करेंगे।
पांचवां मौका, अक्टूबर 2013
प्रधानमंत्री अमेरिका में थे, जिस समय राहुल गांधी ने उनकी कड़ी आलोचना की और दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को नॉनसेंस बताया। राहुल के आक्रामक तेवर इतने कड़े थे कि लौटते वक्त मनमोहन सिंह को फ्लाइट में चैन नहीं पड़ा। उन्होंने आते ही सबसे पहले इसी मु्द्दे को उठाया। जबकि पाकिस्तानी घुसपैठ, नवाज शरीफ से बातचीत समेत देश के सामने कई अन्य मुद्दे इस समय हैं, मनमोहन ने उन्हें छोड़कर मनमोहन इस अध्यादेश को वापस लेने की जुगत में लग गये हैं। सच पूछिए तो यह साफ दर्शाता है कि हमारे पीएम सच में राहुल के अंडर में ही काम कर रहे हैं।
पीएम की लाइफ से जुड़े ये वाक्ये उन्हें अगली बार जरूर याद आयेंगे, जब वो विदेश जाने के लिये फ्लाइट में चढ़ेंगे।












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