ISI and Khalistan: कौन थे जगजीत चौहान और गंगा सिंह ढिल्लों, जिन्होंने पाक की शह पर खालिस्तान की मांग उठाई

भारत को तोड़ने के लिए खालिस्तान की मांग करवाने में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और अमेरिकी खुफिया एजेंसी (CIA) का हाथ होने के प्रमाण कई बार सामने आ चुके हैं।

Amritpal Singh Who were Jagjit Chauhan and Ganga Singh Dhillon who demand for Khalistan

ISI and Khalistan: "लहराती तलवारें, हाथों में बंदूकें और लाठी-डंडे लेकर उत्पात मचाते उपद्रवी और डरकर पीछे हटती बेबस पुलिस...." ये दृश्य अमृतसर के अजनाला में 23 फरवरी 2023 को देखने को मिला था। तब 'वारिस पंजाब दे' संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह और उसके समर्थकों ने अपने एक करीबी को छुड़ाने के लिए थाने पर धावा बोल उसपर कब्जा कर लिया। इस दौरान अमृतपाल ने कहा कि दिवंगत पीएम इंदिरा गांधी को खालिस्तान का विरोध करने की कीमत चुकानी पड़ी थी। हमें कोई नहीं रोक सकता, चाहे वह पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या भगवंत मान।

आजादी के बाद उठी थी 'खालिस्तान' की मांग

अंग्रेजों के इशारे पर सिखों के लिए अलग मुल्क की मांग तो आजादी के साथ ही शुरू हो गयी थी लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने इससे साफ इंकार कर दिया था। कुछ समय बाद 'पंजाबी सूबा आंदोलन' में अलग प्रदेश की मांग हुई, जो तकरीबन 19 साल चली। साल 1966 में इंदिरा गांधी की सरकार ने इस मांग को मान लिया और पंजाब और हरियाणा का बंटवारा कर दिया।

1967 में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने अन्य कई दलों के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन कुछ महीनों बाद ही कांग्रेस की शह पर अकाली दल में फूट पड़ गई और एक धड़ा अलग हो गया। इस धड़े ने पंजाब जनता पार्टी नाम से अलग पार्टी बना ली और कांग्रेस के समर्थन से लक्ष्मण सिंह गिल की सरकार बनी। इसी दौरान जगजीत सिंह चौहान नाम का विधायक पंजाब विधानसभा का उपसभापति और पंजाब का वित्त मंत्री बना। यह वही शख्स था जिसे खालिस्तान मूवमेंट का संस्थापक माना जाता है। जिसने बाद में 'खालिस्तान नेशनल काउंसिल' की स्थापना की थी।

जगजीत सिंह चौहान ने रची खालिस्तान की साजिश?

भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह बी.रमन अपनी किताब 'The Kaoboys of R&AW: Down Memory Laneʼ में लिखते हैं कि जगजीत सिंह चौहान के मन में खालिस्तान को लेकर अपनी ही एक अलग दुनिया थी, जिसके लिए उसे पैसे और समर्थन दोनों चाहिए था। जब वह साल 1969 में पंजाब विधानसभा का चुनाव हार गया तो ब्रिटेन चला गया। ब्रिटेन में पाकिस्तानी उच्चायोग और अमेरिकी दूतावास सिख होम रुल मूवमेंट के लिए आपसी संपर्क में थे। इसी बात का फायदा चौहान को मिला। उसने स्थानीय प्रयासों से दूतावासों में संपर्क साधा और कुछ समय बाद पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह याह्या खान ने उसे पाकिस्तान में मिलने के लिए बुलाया।

पाकिस्तान साल 1971 में भारत से मिली हार का बदला भारत के टुकड़े करके लेना चाहता था। साल 1974 में पाकिस्तान यह कहकर प्रचार करने लगा कि जब भारत की सहायता से बांग्लादेश बन सकता है तो पाकिस्तान की मदद से खालिस्तान क्यों नहीं? लेकिन, तब के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद 5 जुलाई 1977 में पाकिस्तान में तख्तापलट हुआ और सैन्य तानाशाह मोहम्मद जिया-उल-हक के हाथों में सत्ता आयी। भारत में तब मोरारजी देसाई (जनता पार्टी) की सरकार थी। तब भी चौहान के लिए स्थितियां एकदम अनुकूल नहीं थी।

चौहान ने ऐसे बढ़ाए अमेरिका से संबंध

इसके बाद साल 1980 में भारत में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। चौहान फिर से ब्रिटेन और कनाडा से एक्टिव हो गया। इसके बाद उसने खालिस्तान मामले को लेकर चीनियों की मदद मांगी लेकिन चीन ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। चीन से कोई समर्थन न मिलने पर अमेरिका की उसमें दिलचस्पी बढ़ी। रिपोर्टों के मुताबिक चौहान ने उस दौरान वाशिंगटन की कई बार यात्राएं कीं, जबकि भारत सरकार ने उसके पासपोर्ट को अवैध घोषित कर रखा था।

एकबार तो अमेरिका के स्टेट सेक्रेटरी ने उसे बिना पासपोर्ट के ही मिलने बुला लिया था। 3 अक्टूबर, 1981 में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक चौहान के अमेरिकन सिक्योरिटी काउंसिल के चेयरमैन जनरल डेनियल ग्राहम से बेहद करीबी संबंध थे। इसी ने चौहान को पाकिस्तान के विदेश मंत्री आगा खान से मिलवाया था।

खालिस्तानी नेता और जनरल जिया का रिश्ता

अमेरिका में एक खालिस्तानी नेता गंगा सिंह ढिल्लों काफी तेजी से उभरता नेता था। उनकी शादी केन्या की एक सिख महिला से हुई थी। जनरल जिया उल हक की पत्नी से उस महिला की खासी दोस्ती थी। दरअसल जिया की पत्नी भी युगांडा से थी। अपनी पत्नी के संबंध का फायदा उठाकर गंगा सिंह ने जनरल जिया से संबंध स्थापित कर लिये। उसने वाशिंगटन में ननकाना साहिब फाउंडेशन की भी शुरुआत की और 1978 से 1981 के बीच कई बार पाकिस्तान की यात्राएं की।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सिंह ढिल्लों उसी महीने चंडीगढ़ में आयोजित सिख एजुकेशन कांफ्रेंस में खालिस्तानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए हिस्सा लेना चाहता था लेकिन भारत सरकार ने गंगा सिंह के बजाय उसकी पत्नी और बेटे को भारत आने की अनुमति दी। इसके बाद ही पाकिस्तान सार्वजनिक रूप से खालिस्तान को अपना समर्थन देने लगा था।

यहां तक कि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के प्रमुख नेता ने एकबार 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' को बताया था कि 1980 में लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्यायोग में ब्रिगेडियर लेवल के पांच अधिकारियों को नियुक्त किया गया था ताकि वो पाकिस्तान और खालिस्तानी नेताओं के बीच समन्वय और निर्देश देने का काम करें।

ऐसे पाकिस्तान ने दिया खालिस्तान को बढ़ावा

पाकिस्तान द्वारा विदेशों में खालिस्तान संबंधित अलगाववादी समाचारों के प्रचार-प्रसार के लिए भी कई हथकंडे अपनाये गये थे। साल 1964 के आसपास 'देश परदेस' नाम से एक पंजाब साप्ताहिक निकलता था, जिसका 1984 में 10 हजार के आसपास सर्कुलेशन हुआ करता था। उस दौर में इस पत्रिका का उपयोग पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ जमकर किया था। ऐसे ही लंदन के सिखों में 'वतन' नाम से एक उर्दू पत्रिका बहुत प्रचलित थी, जिसे 1984 में जनरल जिया के मंत्रिमंडल के एक पूर्व सदस्य, चौधरी जहुल इलाही ने खालिस्तान को प्रचारित करने के लिए शुरू किया था। लंदन में 'जंग' नाम से भी एक पाकिस्तानी न्यूज पेपर खालिस्तानी गतिविधियों को प्रचारित करता था।

तब खालसा मूवमेंट के लिए भेजा गया था पैसा?

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    वहीं 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' ने 20 दिसंबर 1984 को खुलासा किया था कि जनरैल सिंह भिंडरावाले को खालसा मूवमेंट के लिए लंदन स्थित हैवलॉक रोड के गुरुद्वारे से 100,000 पौंड से अधिक की राशि भेजी गई थी। साथ ही यह भी कहा कि खालिस्तानी चरमपंथियों को 1980 से पाकिस्तान के एबटाबाद, हस्सन अब्दल, सियालकोट और साहिवाल में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वहीं 4 सितंबर 1982 में ब्लिट्ज ने भी खुलासा किया था कि खालिस्तान के चरमपंथियों को अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सीआईए) भी सहायता दे रही है। इन दावों को लोकसभा में 16 नवंबर 1983 को केंद्रीय गृहमंत्री पी.सी. सेठी ने स्वीकार किया था।

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