कभी तूती बोलती थी, आज गठबंधन के लिए खाक छान रहे अजीत सिंह
अजीत सिंह जिनका पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबदबा बोलता था आज उनपर राजनीतिक में अस्तित्व को बचाए रखने का खतरा है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चुनाव के ऐलान से ठीक पहले जिस तरह से राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजीत सिंह गठबंधन की चर्चा के बीच सुर्खियों में आए, उसे देखने के बाद लग रहा था कि वह प्रदेश के चुनाव से पहले अहम भूमिका निभाएंगे।
जिस तरह से पहले सपा के साथ गठबंधन की राह में रोड़ा पड़ा और फिर कांग्रेस ने उनसे दूरी बनाई उसने अजीत सिंह की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी है लेकिन राजनीति में तकरीबन तीन दशक से सक्रिय अजीत सिंह पहले इतने मजबूर नहीं थे।

गठबंधन की ताकाझांकी
अजीत सिंह और शिवपाल यादव की कई बार मुलाकात हुई माना जा रहा था कि सपा का रालोद से गठबंधन होगा लेकिन जिस तरह से मुलायम सिंह ने अजीत सिंह से विलय की शर्त रखी उसने अजीत सिंह के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए। दरअसल सपा में विलय के बाद रालोद का अस्तित्व खत्म हो जाता जिसके बाद अजीत सिंह के लिए सपा के साथ किसी भी तरह की डील का रास्त बंद हो जाता।

2017 अजीत सिंह के लिए अस्तित्व की लड़ाई
कयास लगाए जा रहे थे कि अजीत सिंह कांग्रेस के साथ भी जा सकते हैं, लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार तकरीबन ना के बराबर है उसे देखते हुए अजीत सिंह के लिए कांग्रेस फायदे का सौदा नहीं दिखा। लिहाजा उनके पास भारतीय जनता पार्टी का ही एक विकल्प बचा है। अब देखने वाले बात यह है कि भाजपा उन्हें तवज्जो देती है या नहीं।
राजनीति के इस संकट मे अजीत सिंह के लिए 2017 का चुनाव अग्निपरीक्षा की तरह है। अजीत सिंह के पास सबसे बड़ी चुनौती है अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाए रखना, मौजूदा समय में उनके पास सिर्फ 9 विधायक हैं।

पेशे से कंप्यूटर साइंटिस्ट
अजीत सिंह का जन्म 12 फरवरी 1939 में उत्तर प्रदेश के मेरठ के भड़ोला गांव में हुआ था। वह देश के प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे हैं, ऐसे में राजनीति उन्होंने बचपन से ही अपने घर में देखी थी।
अजीत सिंह अपनी स्कूली पढ़ाई देहरादून के कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल से पूरी की जिसके बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी में ग्रेजुएशन किया और आईआईटी खड़गपुर से बीटेक पूरा किया, यही नहीं उन्होंने एमएस की पढ़ाई इलिनाइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पूरी की। उन्होंने अपना शुरुआती कैरियर बतौर कंप्यूटर साइंटिस्ट शुरु किया था।

बेटा भी राजनीति में
अजीत सिंह के का विवाह राधिका सिंह से हुआ था और उनकी दो बेटियां और एक बेटा है। उनके बेटे जयंत चौधरी 15वीं लोकसभा में मथुरा से सांसद थे।

पश्चिमी यूपी में अजीत सिंह का दबदबा
राजनीति के मैदान में अजीत सिंह ने 1986 में कदम रखा जब वह राज्यसभा के सांसद बने। राजनीति के मैदान में अजीत सिंह दिग्गज नेता के रूप में जाने जाते हैं। 1989 के बाद वह बागपत से लगातार सांसद रहे। इस दौरान वह सिर्फ 1999 में हारे चुनाव हारे थे। लेकिन बागपत लोकसभा सीट पर अजीत सिंह का एकछत्र राज मोदी लहर में खत्म हुआ जब वह दूसरी बार लोकसभा चुनाव हारे, वह भाजपा के सत्यपाल सिंह जोकि मुंबई के पुलिस कमिश्नर रह चुके से हारे थे।

चौधरी चरण सिंह के बाद जाटों के एकमात्र नेता
अजीत सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी धाक लंबे समय तक जमाई रखी और चौधरी चरण सिंह के बाद वह जाटों के एकमात्र नेता के रूप में जाने जाते हैं। प्रदेश की तकरीबन 150 सीटों पर उनका सीधा हस्तक्षेप रहता था। उनके साथ ना सिर्फ जाटों बल्कि गुर्जर और राजपूतों का समर्थन भी था, जिसे मजगर का चुनावी समीकरण भी कहा जाता है।
अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल तकरीबन हर लोकसभा चुनाव में 4-5 सीट और तकरीबन 24 विधानसभा सीट जीतती थी जिसके चलते देश की राजनीति में उनकी हनक कुछ हद तक चलती रही।

पिता से सीखा राजनीति का ककहरा
अजीत सिंह ने कई दलों के साथ गठबंधन किया और उसे तोड़ा, लेकिन उन्हे इस गठबंधन की सीख उनके पिता से ही मिले। चौधरी चरण सिंह ने 1967 में कांग्रेस की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई और खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, फिर उन्होंने 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिराई और वह देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल हुए।
अपने पिता के ही नक्शेकदम पर चलते हुए अजीत सिंह जोकि मुलायम सिंह के करीबी थे, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर आपसी मतभेद के बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई जिसका नाम जनता दल (अजीत) रखा जिसे उन्होंने बाद में राष्ट्रीय लोक दल बना दिया।

निजी लाभ के चलते गर्त में गई पार्टी
जिस वक्त चौधरी चरण सिंह 1987 में मृत्यु हुई थी उस वक्त लोकदल के कुल 84 विधायक थे। लेकिन जिस तरह से अजीत सिंह ने तोड़ मरोड़ की राजनीति जारी रखी उसने उनकी पार्टी को काफी नीचे पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया और उनकी पार्टी काफी कमजोर हो गई। आज आलम यह है कि उनकी पार्टी के सिर्फ नौ विधायक हैं और लोकसभा में उनका एक भी सांसद नहीं है।

कई अहम मंत्रालय संभाले
1989 में वीपी सिंह की सरकार हो या 1991 में नरसिंह राव की सरकार, 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार या फिर मनमोहन सिंह की सरकार, अजीत सिंह हर सरकार में मंत्री रहे और केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका निभाते रहे।
अजीत सिंह 1986 में पहली बार राज्यसभा के सांसद बने और इसके बाद उन्होंने कई सरकारों में अहम मंत्रालय संभाले। 1989 में वह केंद्रीय उद्योग मंत्री बने, 1995 में वह केंद्रीय खाद्य मंत्री बने, 1989 में वह अटल जी की सरकार में केंद्रीय कृषि मंत्री बने, मनमोहन सिंह की सरकार में 2011 में वह नागरिक उड्डयन मंत्री बने।












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