Ajit Doval: जब पूर्व NSA नारायणन ने कहा था ‘जब मुझे कभी डंडे से काम लेना होता है तो मैं डोभाल को बुलाता हूं'
अजीत डोभाल को कीर्ति चक्र और शांतिकाल में मिलने वाले गैलेंट्री अवार्ड से नवाजा जा चुका है। डोभाल एक तेज तर्रार अफसर के रूप में जाने जाते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, मोदी सरकार में सबसे पावरफुल ब्यूरोक्रेट्स में एक हैं। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के साथ काम कर चुके हैं। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RA&W) के प्रमुख रहे अमरजीत सिंह दुलत ने अपनी आत्मकथा 'A Life in the Shadows: A Memoir में अजीत डोभाल के बारे में काफी कुछ लिखा है। इसके अलावा, द कारवां मैग्जीन के पूर्व डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर प्रवीन दोंथी की किताब 'Undercover -Ajit Doval in Theory and Practice' में भी उन्होंने अजीत डोभाल के बारे में बहुत विस्तार से लिखा है।
कैसे बने डोभाल NSA
अमरजीत सिंह दुलत लिखते है, "जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के लिए पहले हरदीप पुरी का नाम लिया गया था। पर अरुण जेटली के सिवा बीजेपी में उनका कोई समर्थक नहीं था। आखिर में नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल के नाम पर अपनी मोहर लगाई थी। वहीं जब सन 2004 में दुलत प्रधानमंत्री कार्यालय छोड़ रहे थे तो नारायणन ने उनको पूछा था कि अब कश्मीर कौन देखेगा? तब दुलत ने बिना किसी संकोच के जवाब दिया था 'डोभाल'।"
डंडे से काम लेना हो तो डोभाल
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एमके नारायणन खुलेआम कहा करते थे, "जब किसी मामले में मुझे नर्म रुख अपनाना होता है तो मैं अमरजीत सिंह दुलत का इस्तेमाल करता हूं लेकिन जब मुझे कभी डंडे से काम लेना होता है तो मैं डोभाल को बुलवाता हूं।" यह बात दुलत ने अपनी आत्मकथा में लिखी है।
लीक से हटकर काम करते हैं डोभाल
दुलत अपनी किताब में लिखते हैं कि वर्ष 2006 में डोभाल ने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को एक इंटरव्यू दिया था। इसमें अजीत डोभाल ने कहा था कि एक बार मैंने लालडेंगा के मिज़ो नेशनल फ्रंट के विद्रोहियों को अपने घर खाने पर बुलाया। मैंने उन्हें आश्वासन दिया था कि वो सुरक्षित रहेंगे। उस दौरान मेरी पत्नी ने उनके लिए सूअर का मांस बनाया था, हालांकि उससे पहले मेरी पत्नी ने कभी सूअर का मांस नहीं बनाया था।" दुलत लिखते हैं कि ये विवरण बताता है कि जरूरत पड़ने पर डोभाल लीक से हटकर काम कर सकते थे। पत्रकार सैकत दत्ता अपने एक लेख में लिखते हैं कि मिजो नेशनल फ्रंट के नेता लालडेंगा ने एक बारकिसी इंटरव्यू में बताया था कि मेरे पास सात कंमाडर थे, पर अजीत डोभाल ने मोर्चा संभाला और उनके 7 में से 6 कमांडरों को अपने साथ जोड़ लिया। इसके बाद लालडेंगा ने बताया कि उनके पास शांति समझौते पर बातचीत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।"
ऑपरेशन ब्लैक थंडर-टू में बने रिक्शावाले
अजीत डोभाल की ऑपरेशन ब्लैक थंडर-टू में भूमिका के बारे में यतीश यादव 'न्यू इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखते है, "1988 में स्वर्ण मंदिर के आसपास रहने वाले स्थानीय निवासियों और खालिस्तानी लड़ाकों ने एक व्यक्ति को रिक्शा चलाते हुए देखा था। उस रिक्शा वाले ने उन खालिस्तानी लड़ाकों को विश्वास दिला दिया था कि वो ISI का सदस्य है और उसे खासतौर से उनकी मदद करने के लिए भेजा गया है। ब्लैक थंडर ऑपरेशन शुरू होने से दो दिन पहले वो रिक्शा चलाने वाला स्वर्ण मंदिर में घुसा और वहां से महत्वपूर्ण जानकारी लेकर बाहर लौटा। इस दौरान उसने पता लगाया कि मंदिर के अंदर कितने चरमपंथी थे। ये रिक्शेवाला और कोई नहीं अजीत डोभाल थे।"
जब कांधार गए थे अजीत डोभाल
दुलत अपनी किताब में एक अन्य किस्से का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि "जब 1999 में भारतीय विमान को अपहरण कर कांधार ले जाया गया तो उस समय NSA ब्रजेश मिश्रा ने मुझसे और श्यामल दत्ता से कहा कि वहां बातचीत करने के लिए अपने लोग भेज दो। मेरी नजर में इस काम के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति सी.डी. सहाय और आनंद आर्नी थे। क्योंकि वो दोनों ऑपरेशनल अफसर थे और अफगानिस्तान को अच्छी तरह से समझते थे। पर श्यामल दत्ता ने कहा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो में इस काम को अजीत डोभाल और नहचल संधू से बेहतर कोई नहीं कर सकता। इन दोनों को ही कांधार भेजा गया।"
पाकिस्तान में डोभाल का जलवा
पत्रकार राजीव शर्मा ने 2014 में एक लेख में लिखा था, जिसका शीर्षक 'Why ex-IB chief Ajit Doval is the best NSA India could ever get' था। इसमें उन्होंने लिखा था कि डोभाल वह शख्स थे, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर पाकिस्तान में घुसने की हिम्मत की और सालों तक उस देश में गुप्त रूप से रहे। पाकिस्तान के रावलपिंडी में कहुटा परमाणु संयंत्र पर वास्तविक समय में खुफिया जानकारी देते रहे। इस परमाणु संयंत्र का सारा काम उस समय पाकिस्तान के वैज्ञानिक ए.क्यू. खान देख रहे थे। पत्रकार Shishir Gupta ने लिखा कि डोभाल उस एक नाई की दुकान के अंदर घुसने में कामयाब रहे, जहां परमाणु वैज्ञानिकों के बाल काटे जाते थे और वहां से उनके बालों के नमूने एकत्र किए। वैज्ञानिकों के चुराए गए बालों के सैंपल में परमाणु विकिरण की पुष्टि होते ही स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान परमाणु हथियार बनाने का काम कर रहा था। डोभाल के कारण ही पाकिस्तान उस समय अपने मिशन को अंजाम नहीं दे पाया था।"
जब पाकिस्तान में पकड़े गए थे डोभाल
विदर्भ मैनेजमेंट एसोसिएशन के एक समारोह में भाषण देते हुए डोभाल ने एक कहानी सुनाई थी। उन्होंने बताया कि "लाहौर में औलिया की एक मजार है, जहां बहुत से लोग आते हैं। मैं वहां से गुजर रहा था तो मैं भी उस मजार में चला गया। वहां कोने में एक शख्स बैठा हुआ था जिसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी। उसने मुझसे सवाल किया कि क्या तुम हिंदू हो? मैंने उन्हें कहा नहीं। उसने कहा मेरे साथ आओ और फिर वो मुझे पीछे की तरफ एक छोटे से कमरे में ले गया। उसने दरवाजा बंद कर कहा, देखो तुम हिंदू हो। मैंने कहा आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? तो उसने कहा आपके कान छिदे हुए हैं। मैंने कहा, हां बचपन में मेरे कान छेदे गए थे लेकिन मैं बाद में कनवर्ट हो गया था। उसने कहा तुम बाद में भी कनवर्ट नहीं हुए थे। खैर तुम इसकी प्लास्टिक सर्जरी करवा लो नहीं तो यहां लोगों को शक हो जाएगा।" डोभाल ने आगे कहा कि उसने मुझसे पूछा कि तुम्हें पता है मैंने तुम्हें कैसे पहचाना। मैंने कहा नहीं तो उसने कहा, क्योंकि मैं भी हिंदू हूं। फिर उसने एक अलमारी खोली जिसमें शिव और दुर्गा की एक प्रतिमा रखी थी। उसने कहा देखो मैं इनकी पूजा करता हूं लेकिन बाहर लोग मुझे एक मुस्लिम धार्मिक शख्स के रूप में जानते हैं।












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