जलवायु परिवर्तन: ताजा विज्ञान क्या कहता है

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) करीब हर पांच सालों में एक रिपोर्ट तैयार करता है जिसमें जलवायु परिवर्तन, उसके कारण और उसके असर को लेकर वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक सहमति दिखाई देती है. पिछले साल आई आखिरी रिपोर्ट ने ग्लोबल वॉर्मिंग के मुख्य कारण और जलवायु विज्ञान के केंद्रीय तत्वों की बात की थी.
इसके बाद इस साल दो बड़ी रिपोर्टें जारी की गईं. एक रिपोर्ट फरवरी में आई जिसमें ये बताया गया कि दुनिया को कैसे जलवायु परिवर्तन के असर का सामना करना सीखना पड़ेगा. दूसरी रिपोर्ट अप्रैल में आई जिसमें जलवायु को गर्म करने वाले उत्सर्जन को कम करने के तरीकों पर जोर दिया गया.
स्पष्ट रूप से इंसान जिम्मेदार
जलवायु परिवर्तन के भौतिक आधार पर पिछले साल आई रिपोर्ट में कहा गया था की बढ़ते हुए तापमान के लिए स्पष्ट रूप से इंसान ही जिम्मेदार हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जलवायु परिवर्तन खतरनाक रूप से बेलगाम होने के करीब पहुंच चुका है.
चर्म मौसम की ऐसी घटनाएं जो पहले दुर्लभ हुआ करती थीं वो अब ज्यादा देखने को मिल रही हैं और इनके आगे कुछ इलाके दूसरों के मुकाबले ज्यादा कमजोर हैं. पहली बार, रिपोर्ट के लेखकों ने मीथेन पर काबू पाने के लिए तुरंत कदम उठाने को कहा. इसके पहले तक आईपीसीसी का ध्यान कार्बन डाइऑक्साइड पर केंद्रित था.
जलवायु परिवर्तन को अनियंत्रितहोने से बचाने के लिए समय खत्म होता देख रिपोर्ट के लेखकों ने कहा कि जियोइंजीनियरिंग या बड़े स्तर के हस्तक्षेपों के लाभ और नुकसान का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. इनमें सौर रेडिएशन को रोकने के लिए वातावरण में कणों को डालना शामिल है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सबसे अमीर देश समेत दुनिया के सभी देशों को जलवायु परिवर्तन के असर और एक पहले से गर्म दुनिया के हिसाब से ढलने की तैयारी करनी शुरू कर देनी चाहिए.
बदलाव के लिए हो जाएं तैयारफरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले की खबर ने उस रिपोर्ट के जारी होने की खबर को ढंक लिया जिसमें ये बताया गया कि पहले से ज्यादा गर्म दुनिया के लिए कैसे तैयार हों. रिपोर्ट में कहा गया कि पहले से ज्यादा आने वाली गर्मी की लहरें, और मजबूत तूफान और पहले से ज्यादा ऊंचे समुद्र के स्तर के अनुकूल ढलने के लिए अमीर और गरीब सभी देशों को तैयार हो जाना चाहिए.
जलवायु परिवर्तन का असर फसलों और पानी की आपूर्ति पर भी पड़ेगा जिससे व्यापार और श्रम व्यवस्थाओं पर भी असर पड़ेगा और लाखों लोग गरीबी और खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगे. गरीबों के लिए डरावने पूर्वानुमान को देखते हुए एक "घाटा और नुकसान" कोष की मांग फिर से तेज हुई, जिसके जरिए आपदाओं की जो कीमत गरीब देश चुकाएंगे उसका हर्जाना अमीर देश भुगतेंगे.
व्यक्तिगत कदम भी जरूरी
एक रिपोर्ट को जारी करते समय उसके एक सह-अध्यक्ष ने कहा कि यह "अभी नहीं तो कभी नहीं" का समय है. रिपोर्ट में कहा गया कि आने वाले कुछ दशकों में कठोर रूप से कटौती से ही तापमान के बढ़ने को अनियंत्रित होने से बचाया जा सकता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों और प्रदूषण ना फैलाने वाले स्रोतों की तरफ बदलाव बहुत धीरे हो रहा है. यह भी कहा गया कि खेती के तरीके और जंगलों को बचाने के तरीके को बदल कर उत्सर्जन कम किया जा सकता है. चेतावनी दी गई कि जलवायु परिवर्तन से आर्थिक विकास पर असर पड़ता है.
पहली बार व्यक्तिगत स्तर पर कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित किया गया. सरकारों से भी कहा गया कि वो ऐसी नीतियां लाएं जिनसे उपभोक्ताओं की और यातायात संबंधी आदतें बदलें जिनसे संसाधनों की बर्बादी कम हो.
सीके/एए (रॉयटर्स)
Source: DW
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