'कल का हर वाकिया तुम्हारा था, आज की दास्तां हमारी है...', ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुने गए गुलजार
कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था, आज की दास्ताँ हमारी है...
इस दौर के मशहूर गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, फिल्म निर्देशक, नाटककार और प्रसिद्ध शायर, गुलजार को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा हो चुकी है।
ये अवार्ड तो एक बहाना है... गुलजार साहब को याद करने के लिए एक फिल्म, एक गाना, एक किस्सा, एक त्रिवेणी, एक कविता, एक शेर या यूं कहें एक पंक्ति ही काफी है। जाने कितने डायलॉग हैं, कितने गाने हैं और कितनी ही पंक्तियां उनकी लिखी हुई हैं जो हमें याद रह गई।

ग़ुलज़ार नाम से प्रसिद्ध सम्पूर्ण सिंह कालरा का जन्म 18 अगस्त 1934 को दीना (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। गुलजार को हिंदी फिल्मों में उनके योगदान के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने फिल्म निर्देशक, गीतकार, संवाद और पटकथा लेखक के रूप में फिल्मों में काम किया है।
1963 में आई विमल राय की फिल्म बंदिनी से गुलजार ने गीतकार के रूप में अपना डेब्यू किया था। लेकिन उन्हें पहचान 1969 में आई फिल्म खामोशी में उनके गीत 'हमने देखी है उन आंखों की महकती खुश्बू से' मिली।
गुलजार साहब को साल 2007 में आई फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर में उनके लिखे गीत 'जय हो' के लिए उन्हें ऑस्कर मिल चुका है। मौसम, आंधी, अंगूर, नमकीन और कोशिश- ये गुलजार साहब द्वारा डायरेक्टेड कुछ मशहूर फिल्मों में से हैं।
'चौरस रात', 'जानम', 'एक बूंद चांद', 'रावी पार', 'यार जुलाहे', 'पुखराज', 'रात पश्मीने की', 'रात, चांद और मैं', 'खराशें' जैसी किताबों में गुलजार को पढ़ा जा सकता है। इस सृजन यात्रा में उन्हें पद्मभूषण,साहित्य अकादमी, दादा साहेब फाल्के अवार्ड, नेशनल फिल्म अवार्ड, ग्रैमी अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई
दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई
आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
पेड़ पर पक गया है फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई
देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई।
जो ख्याल है वह सच में है। यही है और बिना आवाज किए दीवार से पीठ लगाए बैठा है:
मैं दीवार की इस जानिब हूं
इस जानिब तो धूप भी है, हरियाली भी
ओस भी गिरती है पत्तों पर,
आ जाए तो आलसी कोहरा,
शाख पे बैठा घंटों ऊंघता रहता है
बारिश लंबी तारों पर नटनी की तरह थिरकती,
आंख से गुम हो जाती है,
जो मौसम आता है, सारे रस देता है!
लेकिन इस कच्ची दीवार की दूसरी जानिब,
क्यों ऐसा सन्नाटा है
कौन है जो आवाज नहीं करता लेकिन-
दीवार से टेक लगाए बैठा रहता है।












Click it and Unblock the Notifications