कभी प्लेटफॉर्म पर बिताए दिन, जब मौका मिला तो हर किरदार को बनाया यादगार, कुछ ऐसा चमका बॉलीवुड का ये सितारा
Anupam Kher journey: हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में बसे शिमला से निकला एक सितारा बॉलीवुड में ऐसा चमका जिसके बगैर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बेहद साधारण परिवार से आने वाले एक लड़के ने जिस तरह अभिनय की दुनिया में अपनी जगह बनाई, वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं।
जरा सोचिए एक अल्हड़ जवानी का लड़का अपनी पहली ही फिल्म में बूढ़े बाप की भूमिका में पहली बार सिनेमाई पर्दे पर आता है और सिनेमा घरों में छा जाता है। यह कहानी है अनुपम खेर की-जिसका नाम अब एक्टिंग का पर्याय बन चुका है। 500 से ज्यादा फिल्मों का सफर, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चमकती पहचान... और अब, जब वो "तन्वी द ग्रेट" के साथ परदे पर लौट रहे हैं।

ये सिर्फ एक फिल्म की रिलीज नहीं, एक पुराने सफर का रोमांच है जो शिमला की गलियों से शुरू होकर सिनेमा के आसमान तक पहुँची। तो चलिए अनुपम खेर के सिनेमाई सफर पर.....
फिल्मी शुरुआत: फागली से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक
बचपन में 'बिट्टू' के नाम से पुकारे जाने वाले अनुपम खेर ने शिमला के फागली स्कूल और लक्कड़ बाजार स्कूल से पढ़ाई की। कॉलेज के दिनों में रंगमंच की ओर रुझान और अभिनय के लिए बेताबी ने उन्हें घर से पैसे चुराने तक मजबूर कर दिया। इसी जुनून ने उन्हें दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक पहुंचाया, जहां से उन्होंने अभिनय की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की।
मुंबई आकर उन्हें कई रातें रेलवे प्लेटफॉर्म पर बितानी पड़ीं। किराया देने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन हिम्मत और विश्वास की कमी नहीं थी। अपनी किताब The Best Thing About You Is You में अनुपम ने इस दौर का उल्लेख किया है और बताया कि कैसे उनके पिता की सीख "असफलता से मत डरो, उसे जीत में बदलो" उनके जीवन का मंत्र बनी।
'सारांश' से लगी सितारों की कतार
1984 में महेश भट्ट की फिल्म आई सारांश...इसमें अनुपम खेर ने 28 साल की उम्र में 60 साल के वृद्ध का किरदार निभाया। अपने किरदार के साथ इस कदर ईमानदारी दिखाई की दर्शकों को यकीन ही नहीं हुआ कि ये कोई नया, कोरा कलाकार है। इसके साथ ही उन्होंने खुद को अभिनय की दुनिया का मजबूत स्तंभ साबित किया। यह रोल पहले उनसे छिन गया था, लेकिन अपनी दृढ़ता और अभिनय से उन्होंने निर्देशक को मनाया और पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किया।
इसके बाद कर्मा, तेजाब, चालबाज, DDLJ, कुछ कुछ होता है जैसी फिल्मों में वे हर किरदार में जान डालते रहे। कॉमेडी हो या खलनायकी, ड्रामा हो या पिता का किरदार, अनुपम ने हर रंग में खुद को सिद्ध किया। इसके साथ ही अनुपम खेर ने हॉलिवुड में भी अपने एक्टिंग का डंका बजाया। उन्होंने 'बेंड इट लाइक बेकहम', 'सिल्वर लाइनिंग्स प्लेबुक' और 'लस्ट कॉशन' जैसी फिल्मों में काम कर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नाम कमाया।
'तन्वी द ग्रेट' Tanvi The Great: से हो रही वापसी
2002 की ओम जय जगदीश के बाद अनुपम फिर से निर्देशक की कुर्सी पर लौटे हैं। तन्वी द ग्रेट न केवल एक फिल्म है, बल्कि उनके अपने जीवन दर्शन - "सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती" - की सजीव अभिव्यक्ति है। यह फिल्म न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि एक प्रेरणादायक संदेश भी देती है। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में इस फिल्म को मिला स्टैंडिंग ओवेशन, इसके प्रभाव की पुष्टि करता है।
एक विरासत की निरंतरता
545 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके अनुपम खेर आज भी युवा ऊर्जा और नए विचारों के साथ सिनेमा को समृद्ध कर रहे हैं। उनका सोशल मीडिया पर मां दुलारी और भाई राजू खेर के साथ भावनात्मक जुड़ाव उनकी मानवीयता का प्रमाण है। अनुपम खेर केवल अभिनेता नहीं, एक सागर हैं - संघर्ष की, समर्पण की, और सपने देखने की।
तन्वी द ग्रेट के साथ वे फिर एक बार सिद्ध करने को तैयार हैं कि सिनेमा न केवल अभिनय का माध्यम है, बल्कि आत्मा की आवाज भी है। शिमला से मुंबई और फिर वैश्विक मंच तक उनका सफर यह बताता है कि सपनों को उड़ान देने के लिए उम्र नहीं, बस जुनून चाहिए।












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