Azad Bharath Review: श्रेयस तलपड़े की फिल्म में जज्बा, बलिदान और नारी शक्ति का है संगम
रूपा अय्यर ने इतिहास के भूले पन्नों को पर्दे पर जीवंत किया है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जयंती माह में रिलीज हो रही फिल्म आज़ाद भारत सिर्फ एक पीरियड ड्रामा नहीं, बल्कि भावनाओं का संगम है। जो ऑडियंस को सीधा 1940 के दशक की क्रांति की आग में ले जाकर खड़ा कर देता है। कहानी आजाद हिंद फौज के मिशन पर आधारित है। लेकिन इसकी असली आत्मा है, रानी झांसी रेजिमेंट की वीरांगनाएं और भारत की पहली महिला क्रांतिकारी नीरा आर्या की अनकही, साहसी और दिल को झकझोर देने वाली गाथा है।

फिल्म में नीरा आर्या के किरदार को रूपा अय्यर ने जिस तरह निभाया है। वह उनके करियर की मोस्ट इंटेंस परफॉर्मेंस कही जा सकती है। चेहरे के एक्सप्रेशंस, आंखों में आक्रोश और आवाज में दृढ़ता हर फ्रेम में वो पूरी तरह नीरा बन चुकी हैं। खास तौर पर वह सीन, जब नीरा अपने पति श्रीकांत (प्रियांशु चटर्जी) को मार देती है, फिल्म का इमोशनल हाई पॉइंट बन जाता है। उनका संवाद, "तुम जैसे अंग्रेजों के कुत्ते के हाथ में नेताजी कभी नहीं आने वाले" थिएटर में एक सन्नाटा छोड़ जाता है। अगले ही पल तालियों का तूफान उठा देता है। इस भूमिका के लिए रूपा अय्यर की मेहनत और तैयारी साफ स्क्रीन पर दिखाई देती है।
नेताजी के रोल में श्रेयस तलपड़े भी पूरे दम के साथ नजर आते हैं। जिस गंभीरता और बॉडी लैंग्वेज की जरूरत इस किरदार में थी, उसे उन्होंने शानदार तरीके से बैलेंस किया है। उनका डायलॉग, "नारी जब ठान ले, उसे कोई नहीं रोक सकता," फिल्म की थीम को एक नई ऊँचाई देता है। सुरेश ओबेरॉय (छज्जूराम) और इंदिरा तिवारी (सरस्वती राजामणि) ने भी अपने किरदारों में मजबूत छाप छोड़ी है, जिससे फिल्म का अभिनय पक्ष और भी इम्पैक्टफुल बन जाता है।
डायरेक्शन की बात करें तो रूपा अय्यर ने इसे सिर्फ शूट नहीं किया, बल्कि फील किया है। एक गुमनाम क्रांतिकारी पर फिल्म बनाना रिस्की भी था और जिम्मेदारी भरा भी। लेकिन उन्होंने रिसर्च और स्टोरी-टेलिंग में जिस तरह डेप्थ रखी है, वह सराहनीय है। फिल्म में ट्विस्ट-टर्न्स कहानी को प्रिडिक्टिबल नहीं होने देते और दर्शक आखिरी तक बांधें रहते हैं। ट्रेनिंग सीक्वेंस में जो एनर्जी और देशभक्ति है। वह न्यूज ऐज सिनेमा में कम ही देखने को मिलता है।
फिल्म की ताकत इसके डायलॉग्स भी हैं। चाहे नीरा का महिलाओं को संदेश देता है। जैसे, "प्रेम करना हो तो अपने देश से करो," या फिर यह दमदार लाइन - "क्रांति की तलवार बंदूक से नहीं, विचारों की धार से तेज़ होती है,"
ये संवाद दिल में देर तक गूँजते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद भी चर्चा का हिस्सा बने रहते हैं। म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की रफ़्तार के साथ परफेक्ट-सिंक में है। "जय हो" गीत में जो जोश है।
कुल मिलाकर, आज़ाद भारत उन वीरांगनाओं को सलाम है, जिनका नाम किताबों में कम और दिलों में ज्यादा होना चाहिए। यह फिल्म सिर्फ देखी नहीं जानी चाहिए और एक्सपीरिएंस की जानी चाहिए। खासकर नई पीढ़ी के लिए, जिन्हें इतिहास के असली हीरो और हेरोइनों की कहानी जानने का मौका कम मिलता है।












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