Arvind Kejriwal: क्यों 'त्याग' नहीं, मजबूरी है अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे का एलान?

Arvind Kejriwal News: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तिहाड़ जेल से रिहाई के दूसरे दिन ही दो दिन बाद अपने पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। केजरीवाल इस साल 21 मार्च से जेल में बंद थे, लेकिन उन्होंने कभी भी नैतिकता के आधार पर कुर्सी नहीं छोड़ी और जेल में रहकर मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बना लिया। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि जब वह जेल से बाहर आ चुके हैं तो उन्हें पद छोड़ने की जरूरत पड़ गई?

इस साल 10 मई को सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा में चुनाव प्रचार के लिए उन्हें 22 दिनों के लिए रिहाई का भी मौका दिया था। लेकिन, उन्होंने फिर भी इस्तीफे की नहीं सोची। बीच में एक-दो बार जेल से सीएम के तौर पर उनकी चिट्ठी लिखे जाने की बातें भी सामने आईं, जिसपर भारी सियासी बवाल भी हुआ। लेकिन, किसी चिट्ठी के रूप में उनका इस्तीफा बाहर नहीं आया। जबकि, समान परिस्थितियों में वे अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया से एक वक्त बाद त्यागपत्र ले चुके थे।

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जेल से रिहाई के बाद 'त्याग'पत्र की क्यों सूझी?
केजरीवाल ने अब जो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की घोषणा की है, उसे दिल्ली के मंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता उनका 'त्याग' बता रहे हैं।

सौरभ भारद्वाज ने उनके इस्तीफे पर कहा, "मकसद सिर्फ ये है कि नवंबर में तुरंत चुनाव कराए जाएं...और अरविंद केजरीवाल ने जो कुर्सी खुद त्याग दिया है, उस कुर्सी पर जनता कहे कि हम मानते हैं अरविंद केजरीवाल ईमामदार हैं, हम भारतीय जनता पार्टी की साजिशों को समझते हैं और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री दोबारा बनें।"

वक्त से पहले चाहते हैं चुनाव तो विधानसभा भंग करने की सिफारिश क्यों नहीं की?
सौरभ भारद्वाज से पहले केजरीवाल ने खुद पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, 'दिल्ली का चुनाव फरवरी में है, लेकिन मैं मांग करता हूं कि राष्ट्रीय राजधानी में नवंबर में महाराष्ट्र के साथ चुनाव करवाया जाए।'

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है। अगर केजरीवाल और उनकी पार्टी समय से पहले विधानसभा चुनाव को लेकर इतने गंभीर हैं तो उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश क्यों नहीं की है? संवैधानिक तौर पर ऐसा करने का सीएम केजरीवाल का पूरा अधिकार है।

राजीनितक है अरविंद केजरीवाल की घोषणा
दरअसल, केजरीवाल की घोषणा पूरी तरह से राजनीतिक है। जब उन्होंने जेल में रहकर भी कुर्सी पर बने रहना पसंद किया तो अब बाहर भी आ चुके हैं। उन्होंने खुद इसे इस तरह से पेश करने की कोशिश की है कि 'आज वे हमारी ईमानदारी से परेशान हैं, क्योंकि वे ईमानदार नहीं हैं। मैं इस 'पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा' के खेल का हिस्सा नहीं बना। मुझे कानून की अदालत से न्याय मिला है, अब जनता की अदालत मुझे न्याय देगी।'

दिल्ली के मुख्यमंत्री के जेल में होने की वजह से दिल्ली सरकार का कामकाज बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है। तब आम आदमी पार्टी के पास बीजेपी पर यह दोषारोपण करने का बहाना था कि उसने सीएम को जेल में डाल रखा है।

लेकिन, अब तो वे सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से आजाद हो चुके हैं। लेकिन, केजरीवाल की रिहाई में सर्वोच्च अदालत की ऐसी शर्तें हैं, जिससे अब वे या आम आदमी पार्टी के लिए जनता की सहानुभूति बटोरना बहुत मुश्किल हो सकता है।

जेल से बाहर रहकर भी नाम के ही मुख्यमंत्री बने रहते केजरीवाल!
क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल की जमानत की जो शर्तें तय की हैं, उसके हिसाब से वे न तो अपने दफ्तर जा सकते हैं और न ही दिल्ली सचिवालय जा सकते हैं। बहुत आवश्यक पड़ने पर ही फाइल साइन कर सकते हैं।

जबकि, केजरीवाल और उनकी पार्टी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि अदालत ने उन्हें पूरी तरह से रिहा कर दिया है। लेकिन, हकीकत ये है कि वह मुखयमंत्री के रूप में अभी भी काम नहीं कर सकते हैं। अदालत ने उन्हें छूट नहीं मिलने तक ट्रायल कोर्ट में सभी सुनवाइयों पर मौजूद रहने की भी हिदायत दी है। वह शराब घोटाले केस से संबंधित बयानबाजी भी नहीं कर सकेंगे।

रिहाई की शर्तें बन गईं केजरीवाल की मजबूरी!
ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना केजरीवाल का त्याग नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी लगती है। नए मुख्यमंत्री के रहते दिल्ली सरकार फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कुछ लोक-लुभावन घोषणाएं भी कर सकती है और चुनावों में उसका लाभ लेने की कोशिश की जा सकती है।

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जो कि मौजूदी परिस्थितियों में केजरीवाल के पद पर रहते संभव नहीं है, क्योंकि उनपर अदालत की शर्तों की तलवार लटकी रहेगी और जेल में होने वाली सहानुभूति की ढाल भी छिन चुकी है। लोकसभा चुनाव में भी वे शर्तों के आधार पर जेल से बाहर भी आए थे और जमकर चुनाव प्रचार भी किया था, लेकिन फिर भी दिल्ली की सातों सीटें बीजेपी जीत ले गई और कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद आम आदमी पार्टी साफ हो गई।

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