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Delhi Water Crisis: राजधानी में पानी की किल्लत! फाइलों में योजनाओं के बावजूद जल संकट से क्यों जूझ रही दिल्ली?

Delhi Water Crisis: दिल्ली में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है, लेकिन राजधानी की झीलों और जलाशयों के संरक्षण की योजनाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ती नजर आ रही हैं। दिल्ली में जल संकट की जड़ें केवल गिरते भूजल स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजधानी की झीलों और जलाशयों के संरक्षण में बरती जा रही लापरवाही भी इसकी बड़ी वजह बनती जा रही है।

पूर्वी दिल्ली की वेलकम झील (Welcome Jheel) इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है, जहां चार साल पहले पानी निकालकर पुनर्विकास की योजना शुरू की गई थी, लेकिन आज तक झील में दोबारा पानी नहीं भरा जा सका।

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Dry Lakes in Delhi: चार साल से सूखी पड़ी 62 एकड़ की झील

नगर निगम दिल्ली (MCD) ने वेलकम झील के सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास के तहत वर्ष 2022 में इसका पानी निकाल दिया था। योजना के मुताबिक, झील को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से उपचारित पानी से भरा जाना था। हालांकि, अंतिम और सबसे अहम चरण आज तक पूरा नहीं हो सका। आज 62 एकड़ में फैली यह झील एक सूखा गड्ढा बन चुकी है, जहां घास-फूस, जली हुई घास, मलबा और झाड़ियां फैली हैं। स्थानीय बच्चे इस सूखी झील को खेल का मैदान बना चुके हैं।

Delhi में अब तक कितनी झीलें बची हैं?

दिल्ली स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी (DSWA) की 2021 की गणना में राजधानी में 1,045 जल निकाय दर्ज किए गए थे। लेकिन बाद में हुए भौतिक निरीक्षण में सामने आया कि इनमें से कई झीलें या तो अतिक्रमण के कारण गायब हो चुकी हैं या पूरी तरह सूख चुकी हैं। अप्रैल 2024 में सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर 322 नए जल निकाय जोड़े गए, जिससे संख्या बढ़कर 1,367 हो गई, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदले। पांच साल में एक भी झील को नहीं मिला 'वेटलैंड' का दर्जा नहीं मिला।

DSWA ने 2021 में 20 प्रमुख जल निकायों जिसमें वेलकम झील, हौज खास, भलस्वा झील, स्मृति वन (कोंडली और वसंत कुंज), टिकरी खुर्द और नजफगढ़ झील शामिल थे को वेटलैंड घोषित करने की योजना बनाई थी। इससे इन झीलों को कानूनी संरक्षण, सीमांकन और केंद्र से फंड मिलने का रास्ता खुलता। इसके लिए 2022 की समयसीमा तय की गई थी, लेकिन 2026 तक एक भी जल निकाय को अधिसूचित नहीं किया गया।

Delhi Jal Board और तमाम एजेंसियों की लापरवाही बनी बड़ी बाधा

DSWA से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि देरी की सबसे बड़ी वजह भूमि स्वामित्व वाली एजेंसियों - खासकर MCD - द्वारा जरूरी दस्तावेज और विवरण साझा न करना है। अधिकारी के मुताबिक, कैचमेंट एरिया, जल स्रोत, कुल क्षेत्रफल और सीमांकन जैसी जानकारियां जमीन की मालिक एजेंसियों को देनी होती हैं, लेकिन कई बार अधूरी या कोई जानकारी ही नहीं भेजी जाती। वेलकम झील इस प्रक्रिया में सबसे आगे बताई जा रही है, लेकिन अब तक जरूरी सूचनाएं पूरी नहीं दी गई हैं।

चिंता की बात यह भी है कि DSWA की बैठकों में भारी अनियमितता रही है। 2024 के बाद कोई बैठक नहीं हुई और ना ही 2025-2026 में अब तक कोई मीटिंग शेड्यूल नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 2024 तक सभी वेटलैंड्स के मूल्यांकन और संरक्षण के निर्देश दिए थे। पर्यावरण मंत्रालय ने दावा किया था कि 631 जल निकायों का पुनरुद्धार दिसंबर 2024 तक पूरा होगा, लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

सरकार के दावे बनाम हकीकत में कितना फर्क

विश्व आर्द्रभूमि दिवस पर दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजींदर सिंह सिरसा ने दावा किया कि 856 जल निकायों की पहचान और सीमांकन पूरा, 174 झीलों में काम पूरा ,22 पर टेंडर जारी, 20 पर डीपीआर तैयार हो रही है। हालांकि वेलकम, आया नगर और गाजीपुर जैसी कई झीलें आज भी सूखी पड़ी हैं।

विशेषज्ञों की क्या है चेतावनी

INTACH के विशेषज्ञ मनु भटनागर और पर्यावरण कार्यकर्ता पारस त्यागी का कहना है कि वेटलैंड घोषित करने में पांच साल लगना शर्मनाक है। उपचारित पानी से झील भरना कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन नियमों के नाम पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। आम जनता के टेक्स के पैसों का करोड़ों खर्च करने के बाद भी नतीजा शून्य है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वेलकम झील परियोजना 2012 में योजना बनी। ₹22 करोड़ मंजूर करके STP, एम्फीथिएटर, पाथवे बने और फरवरी 2022 में उद्घाटन हुआ इसके बावजूद झील आज भी सूखी है।

दिल्ली की झीलें जल संकट का समाधान हो सकती थीं, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही, एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी और अधूरी योजनाओं ने इन्हें समस्या का हिस्सा बना दिया है। जब तक कागज़ी योजनाएं ज़मीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक दिल्ली की प्यास यूं ही बनी रहेगी।

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