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Delhi Chunav 2025: किन परिस्थितियों में AAP हार सकती है दिल्ली? पढ़िए 3 संयोग

Delhi Chunav 2025: दिल्ली में लगातार चौथी बार सरकार बनाने और बिना रुकावट तीसरी बार विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत की उम्मीद कर रही आम आदमी पार्टी के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पार्टी की कल्याणकारी योजनाएं (चुनावी रेवड़ियां) सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन, यह भी सही है कि यह चुनाव पार्टी के लिए अबतक का सबसे मुश्किल चुनाव लग रहा है।

अगर हम 2013 के आप के पहले चुनावों से 2024 के लोकसभा चुनावों तक राजधानी के वोटरों के वोटिंग पैटर्न का विश्लेषण करें तो पार्टी की जीत में तीन कांटे बिछे दिख रहे हैं, जिनसे पार पाना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।

delhi chunav 2025

Delhi Chunav 2025: आम आदमी पार्टी के पक्ष में 2015 वाला नहीं दिख रहा सीन

आप के लिए 2013 का दिल्ली विधानसभा चुनाव पहला चुनाव था। वह दूसरे नंबर पर (29.5% वोट)रही और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी जादुई आंकड़े को छूने से 5 सीटों से पिछड़ गई। आप ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी पहली सरकार बनाई, जो दो महीने भी नहीं चल सकी।

उसके बाद 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और उसके सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ अपने चरम पर पहुंच गया। पार्टी 70 सीटों में से 67 जीती और उसका वोट शेयर 54.34% तक पहुंच गया। लेकिन, उसके बाद जितने भी चुनाव हुए हैं, आप की लोकप्रियता घटती चली गई है और इस बार तो वह बहुत ही ज्यादा परेशानियों से घिरी हुई है। आइए देखते हैं कि इन परिस्थितियों में दिल्ली में इस बार आप किन हालातों में चुनाव हार भी सकती है-

Delhi Chunav 2025: 1) आप और केजरीवाल की लोकप्रियता का लगातार गिरता ग्राफ

पांच साल अकेले सत्ता में रहने के बाद 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में आप की पांच सीटें भी कम हो गईं और वोट शेयर भी गिरकर 53.6% रह गया। दो साल बाद ही 2022 में दिल्ली नगर निगम (MCD) के चुनाव हुए। इसमें आम आदमी पार्टी ने पहली बार एमसीडी पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन उसकी लोकप्रियता में ऐतिहासिक गिरावट नजर आने लगी।

आप का वोट शेयर घटकर मात्र 42% रह गया। यह पूरी तरह से लोकल चुनाव था, इसलिए इसमें कोई राष्ट्रीय भावना वाली बात नहीं थी। बीजेपी ने उससे मात्र 3% कम या 39.1% वोट प्राप्त किए थे। इसी का परिणाम था कि 250 पार्षदों वाले सदन में आप को 134 सीटें मिलीं तो बीजेपी ने भी 104 सीटें जीतने में सफलता हासिल की।

कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं, लेकिन उसका वोट शेयर बढ़कर 11.7% हो गया, जो कि 2020 के विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक निचले स्तर 4.26% से करीब तीन गुनी है।

बीते लोकसभा चुनावों की बात करें तो उसमें भाजपा ने एकतरफा जीत हासिल की थी। वह सभी सातों सीटें ही नहीं जीतीं, बल्कि आप और कांग्रेस गठबंधन के बावजूद मात्र 43% से कुछ ज्यादा वोट जुटा सके और बीजेपी अकेले 54.35% से ज्यादा वोट ले आई। यह 2015 में दिल्ली में आप को मिली सफलता से भी ज्यादा बड़ी जीत रही। इस बार तो दोनों अलग-अलग चुनाव मैदान में हैं और कांग्रेस कहीं ज्यादा जोर लगा रही है।

Delhi Chunav 2025: 2) कितने प्रतिशत वोट स्विंग से दिल्ली में आप से छिन सकता है ताज?

अब अगर हम 2020 के विधानसभा चुनाव को ही आधार मानकर चलें तो बीजेपी को तब की तुलना में आप से मात्र 6% ज्यादा वोट चाहिए तो वह उसे हरा सकती है। यह अनुमान तब के लिए है, जब कांग्रेस अपने 4.26% वोटों पर ही स्थिर रहे। इन परिस्थितियों में अगर आप से 6% वोट भाजपा के पक्ष में स्विंग होता है तो बीजेपी को 70 सीटों में से सरकार बनाने लायक 36 सीटें मिल सकती हैं और आप 34 सीटों पर अटक सकती है।

लेकिन, दिल्ली चुनाव में आप का 6% वोट बीजेपी में जाना जितना ही मुश्किल लग रहा है, उतना ही कांग्रेस का 4.26% वोट शेयर पर ही टिके रहना। ऐसे में एक तीसरा संयोग पैदा हो सकता है और वही आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।

Delhi Chunav 2025: 3) स्पॉइलर का वोट शेयर बढ़ा तो आप की हार निश्चित?

दिल्ली विधानसभा का पिछला दोनों चुनाव सीधे मुकाबले वाला रहा है और आम आदमी पार्टी को उसका बहुत ही जबर्दस्त फायदा मिला है। लेकिन, इस बार कांग्रेस पार्टी उसके लिए स्पॉइलर साबित हो सकती है। 2013 में यही स्थिति बनी थी और बीजेपी सरकार बनाते-बनाते रह गई थी और अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनानी पड़ी था।

2015 और 2020 के चुनावों में कांग्रेस का कोई वजूद नहीं दिख रहा था और फ्री बिजली-पानी और एंटी-बीजेपी वोट बैंक के दम पर आप ने दोनों ही बार बड़ी सफलता हासिल की थी। हम किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को तब स्पॉइलर की श्रेणी में रख सकते हैं, जब उसे मिला वोट जीत की मार्जिन से ज्यादा हो।

2013 में 63 सीटों पर तीसरे स्थान पर रहने वाले को जीतने वाले की जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन, 2015 और 2013 में यह संख्या घटकर क्रमश: 12 और 9 सीटें ही रह गई थी। तीनों ही चुनावों में यह नजर आया कि भाजपा अपने कोर वोट को मोटे तौर पर अपने पास रखने में तो सफल रही है,यानी आप को कांग्रेस के जनाधार पर शक्ति मिलती गई है।

मतलब, कांग्रेस या कोई अन्य गैर-आप और गैर-बीजेपी पार्टी इन चुनावों में अगर अपना वोट शेयर बढ़ाने में सफल रही तो यह निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी के लिए खतरा पैदा कर सकता है। यह पार्टी कांग्रेस, बसपा या असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम में से कोई भी या सभी पार्टियां हो सकती हैं।

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