अपने मृत बेटे के शुक्राणु क्यों मांग रहे हैं माता-पिता
दिल्ली हाईकोर्ट में एक माता-पिता ने एक अनोखी याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि अदालत सर गंगाराम अस्पताल को उनके मृत बेटे के शुक्राणु देने का निर्देश दे.

लेकिन गंगाराम अस्पताल ने हाईकोर्ट में दायर किए गए अपने हलफ़नामे में कहा है कि एक मृत गैर शादीशुदा व्यक्ति के शुक्राणु किसे दिए जाएं, इसे लेकर असिस्टेड रिप्रोडक्टिव एक्ट ( ART ACT), सरोगेसी बिल या आईसीएमआर के दिशानिर्देशों में कुछ नहीं कहा गया है. अस्पताल की तरफ़ से हलफ़नामा तीन फ़रवरी को दायर किया गया और इस पर सुनवाई चार फ़रवरी को हुई थी.
क्या है मामला?
दरअसल जिनका शुक्राणु मांगा जा रहा है, वह 2020 के जून महीने में इसी अस्पताल में भर्ती हुए थे. उन्हें कैंसर था.
वह शादीशुदा नहीं थे. कीमोथेरेपी से पहले मरीज़ के सीमेन को सुरक्षित रखने की सलाह दी गई थी क्योंकि इलाज के दौरान रेडिएशन से शरीर पर नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं. इससे इन्फ़र्टिलिटी हो सकती थी. इसके बाद उनके सीमेन सुरक्षित रख दिए गए. बाद में मरीज़ दूसरे अस्पताल में शिफ़्ट हो गए.
सितंबर 2020 में इस मरीज़ की मौत हो गई.
मरीज़ की मौत के बाद इनके माता-पिता ने सर गंगाराम अस्पताल में सुरक्षित रखे गए सीमेन को वापस देने की अपील की, लेकिन अस्पताल की तरफ़ से मना कर दिया गया.
ये मामला कोर्ट पहुंचा.
इस मामले में वकील कुलदीप सिंह का कहना है, ''याचिकाकर्ता का कहना है कि उनके पास मृतक की यही निशानी है और अस्पताल बेटे के सीमेन वापस ना देकर उनके अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है.''
- ART बिल कैसे करेगा नि:संतान कपल की मदद
- दूधमुंहे बच्चे पर किसका अधिकार, पैदा करने वाली या पालने वाली मां का?
इस याचिका में ये भी कहा गया है याचिकाकर्ता अपने मृत बेटे का सीमेन लेकर उसकी विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं.
इस मामले पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और सर गंगाराम अस्पताल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.
इस बारे में वकील कुलदीप सिंह कहते हैं, ''दिल्ली सरकार ने कहा था कि उन्हें कोर्ट का फ़ैसला मंज़ूर होगा. लेकिन सर गंगा राम अस्पताल ने हलफ़नामा दायर कर सीमेन देने में असमर्थता जताई है.''
सर गंगा राम अस्पताल की तरफ़ से कहा गया है कि एक ग़ैर शादीशुदा मृत आदमी के सीमेन का क़ानूनी अधिकारी कौन हो इस बारे में ART रेगुलेशन एक्ट 2021, आईसीएमआर के दिशानिर्देश और सरोगेसी बिल में कुछ नहीं कहा गया है.
ART तकनीक में आईवीएफ़, इन्ट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन यानी अण्डाणु में शुक्राणु का इंजेक्शन देकर फ़र्टिलाइज़ करना, शुक्राणु और ओवम (अंडाणु) से प्रयोगशाला में भ्रूण तैयार करना और महिला के शरीर में इम्प्लांट करना या डालना जैसी प्रक्रिया शामिल है.
वहीं सरोगेसी में एक दंपति जो नि:संतान हो या बच्चा पैदा करने में अक्षम हों, वे एक दूसरी महिला से मदद लेते हैं जिसे सरोगेट मदर कहा जाता है. ये सरोगेट मदर आईवीएफ़ तकनीक से इस दंपति का बच्चा पैदा करती है.
क्या हैं दिशा-निर्देश?
भारत में ART क्लीनिकों को लेकर दिए गए दिशानिर्देशों के अनुसार सीमेन बैंक एक व्यक्ति या डोनर के सीमेन स्टोर करता है. इस सीमेन का इस्तेमाल उसकी पत्नी या फिर डोनर की ओर से नामांकित महिला कर सकती है.
इस स्टोरेज या भंडारण के लिए बैंक फ़ीस लेगा. अगर डोनर जिंदा रहते भंडारण के लिए फ़ीस नहीं देता है तो ऐसी स्थिति में बैंक को सीमेन सैंपल को नष्ट करने या शोध कार्यों के लिए प्रामाणिक संस्थाओं को देने का अधिकार होता है.
और अगर डोनर की मौत हो जाती है तो उस सीमेन पर उसके क़ानूनी उत्तराधिकारी या डोनर की ओर से नामांकित व्यक्ति का अधिकार हो जाता है. डोनर ने कागज़ातों में सैंपल देते वक्त जिसका नाम दर्ज कराया हो उसे ही यह मिलता है. लेकिन ये व्यक्ति इस सीमेन का इस्तेमाल अपनी पसंद की महिला को देकर नहीं कर सकता है. अगर मौत के बाद सीमेन का कोई दावेदार नहीं होता है तो बैंक इसे नष्ट कर सकता है या शोध के लिए किसी संस्थान को दे सकता है.
हाईकोर्ट में आया ये मामला एक भावनात्मक मुद्दा है, जहां माता-पिता अपने जवान बेटे को खो चुके हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास से जहां मेडिकल दिक़्क़तों के कारण जो कपल माता-पिता नहीं बन सकते हैं या कोई सिंगल पेरेंट बनना चाहता है तो उनके लिए ART एक्ट या सरोगेसी बिल में इसके लिए प्रावधान हैं.
ART की सेवाएं लेने के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए उम्र की सीमा भी तय की गई है. महिलाओं के लिए विवाह की क़ानूनी आयु 18 वर्ष और पुरुष की 21 वर्ष से अधिक होनी चाहिए और दोनों की ही उम्र 55 साल से कम होना ज़रूरी है .
वहीं शुक्राणु देने वालों के लिए बिल में कहा गया है कि केवल 21-55 वर्ष की आयु के पुरुष का सीमेन लिया जा सकता है और 23-35 वर्ष की महिलाओं से अंडाणु एकत्र किए जा सकते हैं.
हाईकोर्ट में वकील सोनाली करवासरा कहती हैं, ''इस कपल के लिए ये आगे की ज़िंदगी की उम्मीद का मामला है. इनके पोते-पोती होते, लेकिन अब जब बेटा ही नहीं रहा तो वो आस भी जाती रही. ऐसे में अगर इस कपल को मृत बेटे के सीमेन मिल जाते हैं और वो परिवार को सरोगेसी या ART की मदद से बढ़ाने का सोचते भी हैं तो बच्चा पैदा होने के बाद उसके वेलफ़ेयर राइटस कौन देखेगा?''
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट की वकील राधिका थापर कहती हैं कि इस मामले में अगर सीमेन मिल भी जाते हैं तो क्या याचिकाकर्ता फिर माता-पिता बनने की स्थिति में होंगे?
वो कहती हैं, ''अगर कोर्ट सीमेन देने की स्वीकृति भी दे देता है तो ये काफ़ी प्रगतिशील क़दम होगा. अगर किसी ज़रिये से याचिकाकर्ता सीमेन लेने के बाद भ्रूण गोद लेते हैं और दादा-दादी बनने की बजाय ख़ुद ही दोबारा माता-पिता बनते हैं तो ऐसी स्थिति में आगे जाकर बच्चे का पालन-पोषण कौन करेगा क्योंकि यहां याचिकाकर्ता की उम्र एक बहुत बड़ा कारक हो सकती है. भारतीय परिवेश में 20 साल तक के बच्चे की आर्थिक और उसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी माता-पिता की ही मानी जाती है.''
महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में साल 2018 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था जहां डॉक्टरों ने प्रथमेश पाटिल के सीमेन उनकी मां राजश्री पाटिल को सौंपे थे और वो सरोगेसी के ज़रिये जुड़वां बच्चों की दादी बनी थीं.
(ये कहानी यहां पढ़ सकते हैं- 27 साल के अपने बेटे के वीर्य से मां यूं बनी दादी)
बहरहाल दिल्ली हाईकोर्ट में आए इस मामले में अगली सुनवाई 13 मई को होगी.
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