Tribute To Shibu Soren: शिव में समाहित तस्वीर बनाकर अंतर्राष्ट्रीय रेत कलाकर मधुरेंद्र ने दी अनोखी श्रद्धांजलि
Tribute To Shibu Soren: झारखंड की राजनीति के पुरोधा, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। वहीं इस ग़म को एक युवा कलाकार ने ऐसी अनोखी श्रद्धांजलि में बदल दिया, जो हमेशा याद रखी जाएगी।
बिहार के चर्चित युवा अंतरराष्ट्रीय सैंड आर्टिस्ट मधुरेंद्र कुमार ने शिबू सोरेन के सम्मान में तीन घंटे की मेहनत के बाद एक ऐसा काम किया, जिसे देख हर कोई भावुक हो गया। सावन के अंतिम सोमवार को उन्होंने दुनिया के सबसे छोटे सिर्फ 3 सेंटीमीटर के पीपल के पत्तों पर दिशोम गुरु की छवि उकेरी और लिखा, "Good Bye"।

महान जननेता के प्रति कलात्मक प्रणाम
यह कोई साधारण श्रद्धांजलि नहीं थी। यह एक युवा कलाकार की ओर से एक महान जननेता के प्रति कलात्मक प्रणाम था। जैसे ही मधुरेंद्र की यह कला सोशल मीडिया पर आई, यह तेज़ी से वायरल हो गई। लोगों ने इसे "श्रद्धांजलि की सबसे अनोखी और दिल छू लेने वाली अभिव्यक्ति" कहा। कई नामचीन हस्तियों ने भी इस कला को साझा करते हुए मधुरेंद्र की भावनात्मक अभिव्यक्ति की सराहना की।
शिबू सोरेन: एक युग का अंत
81 वर्षीय शिबू सोरेन लंबे समय से किडनी और अन्य बीमारियों से जूझ रहे थे। 19 जून 2025 को उन्हें दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां ब्रेन स्ट्रोक के बाद उनकी स्थिति और भी नाजुक हो गई। जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने जुझारू नेता की तरह लड़ाई लड़ी, अब वह हमारी यादों में ज़िंदा हैं।
मधुरेंद्र ने कहा कि शिबू सोरेन झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी, जनजातीय अधिकारों के प्रखर प्रवक्ता और सामाजिक न्याय की आवाज़ थे। उनके निधन से न केवल झारखंड, बल्कि भारत की राजनीति को अपूरणीय क्षति हुई है।
पीपल के पत्तों पर अमर चित्र
मधुरेंद्र कहते हैं, "शिबू सोरेन सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे एक विचार थे। मैंने उन्हें भगवान शिव में विलीन होते हुए देखा और उसी भाव को पीपल के पत्तों पर उतार दिया।" उनकी यह रचना धार्मिकता, प्रकृति और राजनीति, तीनों को एक सूत्र में पिरोती है। सावन के सोमवार, शिव भाव और पीपल जैसे पवित्र वृक्ष के पत्ते इन सबके बीच मधुरेंद्र की कला श्रद्धांजलि से कहीं ज्यादा, एक अध्यात्मिक संदेश बन गई।
समाप्ति नहीं, शुरुआत
मधुरेंद्र की "गुड बाय" कलाकारी केवल शब्द नहीं, यह उस विरासत का प्रतीक है जिसे शिबू सोरेन ने अपने संघर्षों से रचा। और मधुरेंद्र की कला उस विरासत को एक नई पीढ़ी की भाषा में जीवित रखने का प्रयास है। शायद यही कला की ताकत होती है, जहां शब्द थम जाते हैं, वहां एक चित्र बोल उठता है।












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