मोहम्मद शहाबुद्दीन की खौफ की वो कहानी, जिसने चंदा बाबू का आंगन सूना कर दिया
सीवान, 1 मई: राजद का पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन बिहार में अपराध की दुनिया का वो खौफ था, जिसके नाम पर सीवान जिले से लेकर पूरे प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के हाथ-पैर कांपने लगते थे। जब भी राज्य की सत्ता में लालू-राबड़ी का प्रभाव रहा, इस खौफनाक अपराधी की बिहार में तूती बोलती रही। अगर किसी वजह से वह जेल में भी पहुंच जाता था तो वह वहीं से अपना आपराधिक साम्राज्य बेखौफ होकर चलाता था। क्योंकि, उसके सिर पर बड़ी राजनीतिक शख्सियत का हाथ हमेशा बना रहा। कोरोना की वजह से मौत से पहले तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में हत्या के एक मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे माफिया डॉन से राजनेता बने इस शख्स पर सीवान के एक छोटे से कारोबारी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के तीन-तीन जवान बेटों की हत्या का आरोप था। ये हत्याकांड कोई मामली वारदातें नहीं थीं। इसकी दिल दहला देने वाली कहानी बॉलीवुड की पटकथा लिखने वालों के भी रोंगटे खड़ी कर सकती है।

राजद का पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन कौन था ?
10 मई 1967 को बिहार के सीवान जिले के प्रतापपुर में जन्मे इस राजनेता को लोग पूर्व सांसद के रूप में कम गुंडा और अपराधियों के सरगना के तौर पर ज्यादा जानते थे। कहने को तो इसने एमए और पीएचडी तक की डिग्री हासिल कर रखी थी, लेकिन सिर्फ अपराध का ही क्षेत्र ऐसा रहा, जिसमें इसके जीते जी बिहार में शायद ही कोई इसे कभी टक्कर दे पाया। अपराध की दुनिया और राजनीति में इसने कॉलेज के दिनों से ही दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। बिहार की राजनीति में इसका राजनीतिक रसूख किस कदर हावी था, इसका अंदाजा रिपब्लिक न्यूज चैनल के एक ऑडियो क्लिप के दावे से जाहिर हो गया था। घटना तब की बताई जाती है, जब नीतीश कुमार 2015 के बाद लालू यादव के साथ मिलकर चला रहे थे। उस समय सीवान में तैनात एसपी को लेकर जेल में बंद यह शातिर अपराधी इतना नाराज हुआ था कि अपने राजनीतिक आका लालू यादव से कथित तौर पर फोन पे कह रहा था, 'आपका एसपी खतम है......हटाइए सबको नहीं तो एक दिन दंगा करवा के रहेगा।' शहाबुद्दीन की शिकायत के बाद लालू ऑडियो में परेशान नजर आए थे और कथित तौर पर एसपी को हड़काने के लिए अपने स्टाफ से फोन लगाने के लिए कहते सुने गए थे।
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अपराध की दुनिया में कब आया शहाबुद्दीन ?
1986 की बात है, सीवान में शहाबुद्दीन के खिलाफ पहला आपराधिक केस दर्ज हुआ था। इसके बाद तो सीवान के हुसैनगंज थाने को उसकी हिस्ट्रीशीट ही खोलकर रख देनी पड़ी थी। उसे ए ग्रेड का हिस्ट्रीशीटर घोषित किया गया था। उम्र के साथ-साथ उसके अपराध का ग्राफ भी बढ़ता गया और धीरे-धीरे वह सीवान का अघोषित साहब बन बैठा। वह तो ऐसा दौर था कि किसी पुलिस वाले की उसकी गिरेबान पर हाथ डालने की कभी हिम्मत नहीं हुई। सीवान में अपराध हो या राजनीति वहां सिर्फ शहाबुद्दीन का ही कारोबार और दरबार चलता था। जिसने भी गलती से सिर उठाने की जुर्रत की, उसका अंजाम सबको पता होता था। कैसे-कैसे धाकड़ आईपीएस की उसके सामने एक न चलती थी।

राजनीति में कैसे बढ़ता गया शहाबुद्दीन का रुतबा ?
90 की दशक में बिहार की राजनीति पर लालू छाए हुए थे और शहाबुद्दीन अपराध की दुनिया का उभरता हुआ गुंडा था। वह लालू की पार्टी में शामिल हुआ और अपराध के साथ राजनीति की जुगलबंदी ने उसका सितारा बुलंद करना शुरू कर दिया। 1990 के विधानसभा चुनाव में उसे जनता दल से टिकट मिला और उसकी जीत हुई। 1995 में उसने दोबारा लालू की पार्टी से ही जीत हासिल की और पार्टी में उसका कद बढ़ता चला गया। एक साल बाद 1996 में उसे सीवान से लोकसभा का टिकट मिला और वह शातिर अपराधी संसद में दाखिल हो गया। जबतक बिहार की सत्ता पर लालू-राबड़ी के कुनबे का दखल रहा, शहाबुद्दीन की ताकत बढ़ती रही और राजद सुप्रीमो सार्वजनिक मंच पर उसके अपराधों पर पर्दा डालते नजर आते रहे। जब कभी कानूनी उलझनों के चक्कर में वह चुनाव नहीं लड़ पाया अपनी पत्नी हिना शहाब को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा।

सीवान का वो खौफनाक हत्याकांड
आज भी सीवान की धरती का जर्रा-जर्रा शहाबुद्दीन के कारनामों को याद करके कांप उठता है। उसके आतंक और अपराध की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसके लिए किताबों की पूरी सीरीज भी कम पड़ जाएगी। लेकिन, यहां हम मूल रूप से उस एक अपराध की बात करने जा रहे हैं, जिसकी सजा उसे भारतीय कानून से मिली थी। यह मामला है चंदा बाबू के तीन-तीन जवान बेटों की निर्मम हत्याओं से जुड़ी हुई। असल में ये पूरा मामला क्या था, इसके लिए हमने सीवान जिले के वरिष्ठ पत्रकार रवि रंजन झा से बात की है। रवि जी ने वन इंडिया से खास बातचीत में कहा है कि, "सीवान का चंदा बाबू कांड मानवीय इतिहास की क्रूरतम घटनाओं में से एक है। 2004 अगस्त में चंदा बाबू किसी काम के सिलसिले में सीवान से पटना गए हुए थे। उसी दौरान शहाबुद्दीन के गुर्गे ढाई लाख रुपये की रंगदारी मांगने चंदा बाबू की दुकान पर पहुंच गए। उनकी सीवान में दो दुकानें थीं। चंदा बाबू के बेटों में से एक सतीश ट्रक से डालडा उतरवा रहा था, गल्ले में ढाई लाख रुपये पड़े थे। शहाबुद्दीन के गुंडे सारे पैसे छीनने की कोशिश कर रहे थे। जबकि वो बीस-तीस हजार देने को तैयार भी हो गए थे। जब सतीश ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो बदमाशों ने उसे पीटना शुरू कर दिया। छोटा भाई राजीव ने अपने भाई को बचाने की कोशिश की। उसी दौरान तीसरा भाई गिरिश भी दूसरी दुकान से वहां आ गया। शहाबुद्दीन के गुंडों ने तीनों भाइयों को पकड़ लिया और ले गए। राजीव को खंभे से बांध दिया और दोनों भाइयों की एसिड से नहलाकर हत्या कर दी। राजीव को और भी क्रूरतम तरीके से मारने की साजशि थी, लेकिन तब वह किसी तरह से वहां से बचके निकल गया...... "

चश्मदीद गवाह की हुई गोली मारकर हत्या
लेकिन, चंदा बाबू के दो-दो जवान बेटों की निर्मम हत्या को अंजाम देने के बावजूद शहाबुद्दीन का कलेजा शांत नहीं हुआ। राजीव अपने दोनों भाइयों की हत्या का एकमात्र चश्मदीद था। शहाबुद्दीन ने उसे मरवाने के लिए 10 साल इंतजार किया और आरोप है कि उसने राजीव को भी मौत की नींद सुलाकर ही चैन की नींद ली। रवि जी के मुताबिक, "बुजुर्ग चंदा बाबू इसी कोशिश में लगे रहे कि किसी तरह से मुकदमा दर्ज हो जाए। एसपी से मिलना चाहा तो उसने इनकार कर दिया, जबकि इतनी बड़ी घटना थी..... थाने में गए तो थाना इंचार्ज ने समझाया कि आप कुछ भी कीजिए, लेकिन सीवान छोड़ दीजिए। चंदा बाबू पटना जाकर तत्कालीन राजद नेताओं से भी मिले, लेकिन सबने मदद से इनकार कर दिया। दिल्ली में केंद्र की सत्ता से भी मदद चाही, लेकिन किसी ने सहायता नहीं की।....लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद शहाबुद्दीन को इस मामले में उम्र कैद की सजा मिली। लेकिन, फैसला आने से पहले ही इस हत्याकांड का अकेला गवाह राजीव जो था उसकी भी सीवान डीएवी कॉलेज मोड़ के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई। और एकमात्र गवाह की हत्या के बाद भी तब शहाबुद्दीन को जमानत मिल गई थी। लेकिन, फाइनली सुप्रीम कोर्ट से उसे सजा हुई। "

शहाबुद्दीन....जिसने चंदा बाबू का आंगन सूना कर दिया
चंदा बाबू के जिस गवाह बेटे राजीव की हत्या बाद में की गई थी, उसकी मौत से 18 दिन पहले ही शादी हुई थी। बुजुर्ग चंदा बाबू ने अपनी बुजुर्ग पत्नी, एक विधवा बहू, एक दिव्यांग बेटा और दो बेटियों के साथ कैसे जिंदगी का लंबा सफर पूरा किया, यह उनकी आत्मा ही जानती होगी। उनकी पत्नी कलावती की आंखें हमेशा गीली रही। जब भी लोगों की उनपर नजर पड़ती वो रोती ही दिखाई पड़ीं। जिसके दो जवान बेटों को तेजाब से जिंदा जला दिया गया हो और शादी के कुछ ही दिन बाद एक जवान बेटे की भी हत्या कर दी गई हो, उस मां पर क्या गुजरी होगी इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। (चंदा बाबू और कलावती की तस्वीर- सौजन्य-सोशल मीडिया)












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