जानकी जयंती आज: श्रीराम-सीता एक ही तिथि को हुए अवतरित, जानिए कितनी आयु में हुआ विवाह?
पूर्वी चंपारण। सनातन-धर्म के ग्रंथों के अनुसार, चतुर्भुजधारी भगवान विष्णु और उनकी अर्धांगिनी लक्ष्मी देवी ने त्रेतायुग में पृथ्वी पर मनुष्यावतार लिया था। लक्ष्मीजी वैशाख महीने के शुक्लपक्ष के नौवें दिन यानी नवमी तिथि को सीता के रूप में अवतरित हुई थीं। वहीं, भगवान विष्णु भी नवमी की तिथि को राम के रूप में जन्मे। दोनों का प्राकट्य एक ही नक्षत्र में हुआ। हालांकि, दोनों की उम्र में कई साल का अंतर था।

आज ही के दिन अवतरित हुई थीं सीता
आज भारत-नेपाल में सीता जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, क्योंकि इसी नवमी की तिथि को सीताजी प्रकट हुई थीं। इस दिन सीता-श्रीराम की पूजा की जाती है। इस दिवस को लोग 'जानकी जयंती' भी कहते हैं। आज इस अवसर पर यहां हम बताने जा रहे हैं उनसे जुड़ी ऐसी बातें जो शायद आपको मालूम न हों। कुछ ऐसे प्रसंग जिनकी जिज्ञासा लोगों में हमेशा रही है।

राजा जनक ने इसलिए रखा- सीता नाम
ग्रंथों के अनुसार, तेत्रायुग में मिथिला (अब नेपाल) नरेश जनक ने संतानोत्पत्ति हेतु यज्ञ किया था। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी को जब वह पुष्य नक्षत्र में भूमि पर हल चला रहे थे, तो एक मिट्टी के बर्तन में कन्या निकली। हल की नोंक को सीत कहे जाने की वजह से उस कन्या का नाम सीता रखा गया। इस प्रकार, सीताजी का जन्म स्त्री के गर्भ से नहीं, बल्कि भूमि से हुआ था।

सीताजी के अन्य नाम और उनकी वजह
सीता राजा जनक के यहां अवतरित हुई थीं, इसलिए उन्हें 'जानकी' भी कहा जाता है। वहीं, चूंकि राजा जनक का एक नाम विदेह था, इस वजह से सीता को वैदेही भी कहते हैं। पुराणों में उल्लेख है कि, एक दिन बचपन में सीता ने खेलते-खेलते भगवान शिव का विशाल धनुष उठा लिया था। राजा जनक को उस समय पहली बार समझ आया कि सीता दैवीय कन्या हैं। वे बहुत कम उम्र में ही युवा हो गई थीं।

विवाह के समय 6 साल की सीता, 15 के राम
मान्यता हैं कि, विवाह के समय सीताजी की आयु 6 वर्ष थी। जब राजा जनक ने यज्ञ किया तो देश-परदेश के राजा-महाराजा और ऋषि-मुनि वहां एकत्रित हुए। राजा जनक के महल में रखे शिव धनुष को रावण-बाणासुर जैसे बलशाली योद्धा उठा भी नहीं पाए थे। मगर, उसी धनुष से सीता खेली थीं। इसलिए तब राजा जनक ने सीता का विवाह ऐसे व्यक्ति से करने का निश्चय किया जो उस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सके।

सीता को पहली बार कहां दिखे थे श्रीराम?
राजा जनक के बुलावे पर उस समय महर्षि विश्वामित्र भी जनकपुर के अनुष्ठान में शामिल होने पहुंचे थे। वे श्रीराम और लक्ष्मण को भी अपने साथ ले गए। वहां बगिया में पहली बार सीता और श्रीराम की दृष्टि एक-दूजे पर पड़ी। उसके बाद धनुष की प्रतियोगिता हुई तो श्रीराम के हाथों वह धनुष भंग हो गया। सीता ने श्रीराम के गले में वरमाला डाल दी। उस समय श्रीराम 15 वर्ष के थे। राजा जनक ने अयोध्या के राजा दशरथ को बरात लाने के लिए आंमत्रित किया।

अयोध्या से बारात पहुंचने में कितने दिन लगे?
पुराणों में उल्लेख है कि, सीता स्वयंवर के बाद अयोध्या सूचना पहुंची तो राम सहित चारों भाइयों की बरात जनकपुर रवाना हुई। बिहार में श्री रामचरितमानस के अध्ययनकर्ता एवं कथावाचक स्वामी राजेश्वरानन्द सरस्वती कहते हैं कि, उस बरात को मिथिला पहुंचने में पाँच दिन लगे। जनकरपुर, राजा जनक के राज्य मिथिला की राजधानी था। वर्तमान में यह भारत के बिहार राज्य के सीतामढ़ी-दरभंगा से 24 मील दूर नेपाल में पड़ता है।

किन स्थानों से होकर गई श्रीराम की बारात?
स्वामी राजेश्वरानन्द कहते हैं कि, अयोध्या से रवाना हुई श्रीराम की बारात बिहार के कई स्थानों से गुजरी थी। पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी ऐसे ही स्थल हैं, जिनका इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। रास्ते में जहाँ श्री राम की बारात रुकी थी, वहाँ अब दुनिया का सबसे बड़ा राम मंदिर बनने जा रहा है। ऐसी मान्यताएं हैं कि, अयोध्या से गई बारात जनकपुर में 6 मास की अवधि तक रुकी। उस दौरान बहुत से युवाओं का विवाह मिथिला की कन्याओं से हुआ। इसलिए बुजुर्गों द्वारा भारत-नेपाल के बीच आज भी रोटी-बेटी का रिश्ता बताया जाता है।

विवाह के बाद कितने वर्ष अयोध्या में रहीं सीता?
श्रीराम और सीता विवाह के समय नाबालिग ही थे। दोनों की उम्र में लगभग 9 वर्ष का अंतर था। अपने विवाह के बाद उन्होंने 12 वर्ष अयोध्या में बिताए। अयोध्या में जब श्रीराम के राजतिलक की तैयारियां हो रही थीं, तब महाराज दशरथ की रानी कैकेयी के कहेनुसार, उन्हें 14 वर्ष का वनवास दे दिया गया। इस तरह, उस समय तक श्रीराम की आयु 27 वर्ष हो गई थी और सीता 18 साल की थीं।

वनवास के 13वें वर्ष में हुआ था सीता-हरण
श्री राम, लक्ष्मण और सीता ने वनवास के लगभग 10 वर्ष दंडकारण्य वन में व्यतीत किए। उस दरम्यान भी उन्होंने कई जगह बदलीं। वनवास के 13वें वर्ष में वे पंचवटी में रहे। जिस स्थान से सीता-हरण हुआ, वहीं से कुछ दूर गिद्धराज जटायु रहते थे। जब राक्षसराज रावण ने सीता हरण किया, तब जटायु को आकाश में पुष्पक विमान दिखा। जटायु ने रावण को रोकने की कोशिश की। रावण ने चंद्रहास खड्ग से जटायु पर जानलेवा हमला किया। यह स्थान, नासिक नगर के 56 किमी दूर सर्वतीर्थ बताया जाता है।

सबसे पहले जटायु ने किया था सीता का बचाव
जटायु के बताएनुसार ही राम-लक्ष्मण सीता की खोज में आगे बढ़े। रास्ते में उन्होंने कबन्ध का उद्धार किया। कबन्ध ने उन्हें मां शबरी का पता दिया और कहा कि वहां से वानरराज सुग्रीव तक पहुँचने का रास्ता मिलेगा, जो आपकी सहायता करेंगे। शबरी जाति से भीलनी थीं। उन्हें श्रमणा कहा जाता था। वह बरसों से राम की राह देख रही थीं। राम-लक्ष्मण उनकी कुटिया में जाकर उनसे मिले। उन्होंने सुग्रीव के निवासस्थल ऋष्यमूक पर्वत के बारे में बताया।

ऋष्यमूक पर्वत पर सीताजी ने गिराए थे आभूषण
ऋष्यमूक पर्वत वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। यहीं सुग्रीव अपने मंत्रियों और विश्वस्त वानरों के साथ रहते थे। जिनमें हनुमान, जाम्बवन्त भी थे। वन में भटकते राम-लक्ष्मण से हनुमान ही सबसे पहले मिले, जो कि उनका भेद जानने के लिए उनके पास आए थे। लक्ष्मण से श्रीराम की महिमा सुनकर हनुमान ने उन्हें पहचान लिया। उसके बाद हनुमान दोनों भाइयों को लेकर सुग्रीव के पास गए, जहां उनकी मित्रता कराई। उसके बाद बाली वध हुआ। सुग्रीव राजा बने। बाली पुत्र अंगद को युवराज घोषित किया गया। और, सीताजी की खोज शुरू हुई।

फिर करोड़ों वानर सीताजी की खोज में निकले
वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि, वानरराज सुग्रीव ने सीताजी की खोज में करोड़ों वानरों के दल चारों दिशाओं में भेजे। कुछ समय बाद पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा में गए दल वापस लौट आए। जबकि दक्षिण में जहां रावण की लंका थी, वहीं सीताजी के होने की ज्यादा संभावना थी, उनकी खोज में गया दल आगे बढ़ता रहा। उस दल में महावीर हनुमान, अंगद, रीछराज जाम्बवन्त, नल-नील समेत हजारों वानर थे। जब वे समुद्र तट पर पहुंचे, वहीं एक पर्वत पर उन्हें जटायु के बड़े भाई संपाती मिले। संपाती ने उन्हें बताया कि, 'उन्हें लंका प्रत्यक्ष दिख रही है। सीता जी लंका के महलों से दूर वृक्षों से घिरे एक स्थान पर बंधक रखी हुई हैं।'

हनुमानजी ने सीताजी को लंका में खोजा
हनुमानजी 100 योजन से ज्यादा दूरी का समुद्र लांघकर लंका गए। वहां उन्होंने संपूर्ण लंकानगरी देखी। विभीषण से मिले तो सीताजी की मौजूदगी वाली अशोकवाटिका के बारे में पता चला। जहां रावण उन्हें सीताजी को डराते-धमकाते दिखा। रात्रि होने पर हनुमान सीताजी से मिले और श्रीराम का संदेश सुनाया। उन्हें सांत्वना भी दी। उसके बाद अशोक वाटिका उजाड़ी। लंकाधिराज रावण के पुत्र अक्षयकुमार समेत हजारों राक्षस मारे। इंद्रजीत से लड़े। रावण के दरबार में प्रस्तुत हुए। लंका-दहन किया। अस्त्र-भंडार और सुरक्षा-ढांचे को भी बड़ी क्षति पहुंचाई। उसके बाद वापस सुग्रीव के पास लौट आए। जहां सारा प्रसंग श्रीराम को सुनाया।












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