Bihar में अपराधी बेख़ौफ़,'गठबंधन सरकार' बेअसर? NDA में भी दिखने लगी दरार, घटक दल नहीं कर पा रहे डैमेज कंट्रोल!
Bihar News: बिहार की राजधानी पटना सहित कई जिलों में हाल के दिनों में लगातार गोलीबारी और हत्याओं की घटनाओं ने न केवल विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका दिया है, बल्कि खुद एनडीए (NDA) गठबंधन के भीतर भी मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में सहयोगी दलों के नेता ही अब अपराध को लेकर सरकार के रुख से असहमत दिखाई दे रहे हैं। इससे साफ है कि कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर एनडीए के भीतर ही 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिशें विफल साबित हो रही हैं।

मुख्य घटनाएं और विपक्ष के हमले:
पटना में बालू कारोबारी गोपाल खेमका, शॉपिंग मार्ट संचालक विक्रम झा की हत्याएं और कॉलेज में मयंक नामक छात्र को गोली मारे जाने की घटना ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 'कमजोर मुख्यमंत्री' करार देते हुए दावा किया है कि बिहार में अपराधियों का मनोबल बढ़ चुका है और सरकार सिर्फ आंकड़ों की बाज़ीगरी में लगी है।
राजद (RJD) और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल खुलेआम यह कह रहे हैं कि बिहार में अब "सुशासन बाबू" की छवि पूरी तरह खत्म हो चुकी है। तेजस्वी यादव ने कहा कि "जब राजधानी में लोग सुरक्षित नहीं, तो ग्रामीण इलाकों का क्या होगा?"
डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की सफाई:
इस हमले के जवाब में डिप्टी सीएम और वित्त मंत्री सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार का समर्थन करते हुए कहा कि बिहार में संगठित अपराध नहीं हैं और सरकार व्यक्तिगत रंजिश से हुई घटनाओं को रोकने में सीमित है। उन्होंने कहा, "72 घंटे के भीतर खेमका मर्डर केस में पुलिस ने कार्रवाई की, ये दर्शाता है कि पुलिस एक्टिव है।"
लेकिन उनके बयान में यह भी स्वीकार किया गया कि "व्यक्तिगत झगड़ों से होने वाली हत्याएं रोकना कठिन है" - यह बयान खुद सरकार की लाचारी को उजागर करता है और विपक्ष को यह कहने का मौका देता है कि अगर सरकार असहाय है, तो फिर वह शासन कैसे कर रही है?
एनडीए में ही उठने लगीं आवाजें:
सबसे गंभीर पहलू यह है कि एनडीए गठबंधन के अंदर भी कुछ नेता अब नीतीश सरकार की आलोचना कर रहे हैं। जदयू और भाजपा के बीच पहले से मौजूद वैचारिक तनाव के बीच अब कुछ भाजपा विधायकों और नेताओं के बयान भी सामने आए हैं जो इशारों-इशारों में नीतीश कुमार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "अगर राजधानी में इस तरह की वारदात हो रही हैं और जनता भयभीत है, तो जनता को जवाब कौन देगा?" इस तरह के बयान संकेत हैं कि सरकार के भीतर ही अपराध पर नियंत्रण को लेकर भरोसा डगमगा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले कानून-व्यवस्था सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनने जा रहा है। विपक्ष जहां इसका पूरा लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, वहीं एनडीए के पास फिलहाल कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दिख रही जिससे वह जनविश्वास को मजबूत कर सके।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सम्राट चौधरी और अन्य नेताओं के बीच सामंजस्य की कमी से यह संदेश भी जा रहा है कि गठबंधन सरकार में संवाद की कमी है, और यह बात विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे सकती है। बिहार में बढ़ते अपराधों को लेकर जो राजनीतिक उथल-पुथल दिखाई दे रही है।
यह केवल विपक्ष का हमला नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष की अंदरूनी असहमति का भी प्रमाण बनती जा रही है। यदि सरकार समय रहते कोई ठोस और समन्वित कदम नहीं उठाती, तो आने वाले चुनाव में यह मुद्दा NDA के लिए सबसे बड़ा संकट बन सकता है।












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