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'कई बार मैंने आप सब को ये चिट्ठी लिखने का सोचा', 2025 के चुनाव से पहले फिर एक्टिव हुई पुष्पम प्रिया चौधरी

Pushpam Priya News: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक पार्टियों ने विभिन्न रणनीतियों पर काम करना शुरू कर दिया है। वहीं कुछ लोग अपनी नई पार्टी के ज़रिए बिहार की सियासत में हलचल मचान के लिए तैयार बैठे हैं। इसमें एक नाम चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का भी है।

2 अक्टूबर को प्रशांत किशोर अपनी पार्टी की घोषणा करने वाले हैं। इससे पहले वह प्रदेश के सभी ज़िले में अपने संगठन की ज़मीन मज़बूत करने में जुटे हुए हैं। वहीं अब एक बार फिर से प्लुरल्स पार्टी की अध्यक्ष पुष्पम प्रिया भी सियासी मोड में एक्टिव हो चुकी है।

Pushpam Priya Chaudhary letter to people of bihar and party woker active again before 2025 elections

2019 के चुनाव में उन्होंने दांव खेला लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद से ही वह बिहार की सियासत से दूरी बनाए हुई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने काफी एक्टिव होते हुए कई मुद्दे उठाए थे, इसके बावजूद जनता ने नकार दिया था। चुनाव में मिली हार के बाद वह पूरी तरह से गायब हो चुकीं थी। अब एक बार फिर वह एक्टिव हुईं हैं। बिहारवासियों और कार्यकर्ताओं के नाम पत्र सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

पुष्पम प्रिया चौधरी ने जो कुछ लिखा है, आइए पढ़ते हैं। प्रिय बिहारवासियों और हमारे कार्यकर्तागण, पिछले कुछ दिनों से कई बार मैंने आप सब को ये चिट्ठी लिखने का सोचा। 8 मार्च 2020 को जब आपने मेरा नाम पहली बार सुना था तब भी विरोधियों के शब्दों में उस "करोड़ों के विज्ञापन" का ध्येय मात्र एक ही था।

शहरों एवं दूर गाँव में बैठे आप तक, देश-विदेश में काम कर रहे अपने बिहारी भाई-बहनों तक, अपने हाथ से लिखी अपनी बात पहुँचाना। आज उस दिन को चार साल हुए। राजनीति में यह एक छोटा समय है। इन चार सालों में मेरे जीवन में और आपके जीवन में भी कई बदलाव आए होंगे लेकिन दो चीजें जो नहीं बदली वो हैं बिहार की आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था और इस व्यवस्था को बदलने का मेरा संकल्प।

साल 2019 में मैंने एक ऐसा निर्णय लिया था जिसने मेरा जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। बिहार की कभी नहीं बदलने वाली सड़ी व्यवस्था को हमेशा के लिए बदलने के लिए अपना सब कुछ छोड़ना। इस देश की राजनीति के गटर में घुसने के लिए व्यक्तिगत जीवन की तिलांजलि। औरों की तरह बिहार और राजनीति मेरे लिए कोई बैक-अप प्लान बी न था और न है।

बनना कुछ और हो, नहीं बन पाए तो चलो बाप की राजनीति वाला धंधा कर लेते हैं या कहीं से टिकट ख़रीद के फिट हो जाते हैं। या किसी पार्टी में पट नहीं रहा 'गोटी सेट नहीं हो पा रहा' तो चलो बिहार के लोगों को गांधी और अंबेडकर का पोस्टर लगा कर झाँसा देते हैं, बिहार के लोग तो "झाँसे में आते ही हैं"। मेरे लिए राजनीति झाँसा देने वाला जाल नहीं, आदर्शों के लिए है- आइडियोलॉजी।

कभी जिसका बहुत भारी मतलब होता था, अब तो जनता भी भूल चुकी है कि राजनीति में आदर्श भी कुछ होता है! बिहार की जनता मेरे लिए "झाँसे" में आने वाले लोग नहीं हैं। ये वो लोग हैं जिनको मैंने अपनी आँखों से छोटी-छोटी चीजों के लिए जूझते देखा है, बिना किसी वजह के दूसरे राज्य में डंडे से मार खाते देखा है।

बिहार मेरे लिए उपहास का विषय नहीं बल्कि वो एंपायर, वो साम्राज्य है जिसका परचम पूरी दुनिया में लहराया करता था। बिहार वो विषय है जिसका यूनान की लेखनी में ज़िक्र पढ़कर मेरा सर गर्व से ऊँचा हो जाता था और आज की डेवलपमेंट सम्बन्धी रिपोर्ट्स में बिहार के आँकड़े देख कर सर शर्म से झुक जाता था। बिहार मेरे लिए एक कॉलिंग है, राजनीति एक कॉलिंग है।

इसका कारण मात्र ये नहीं कि मैंने अपना अधिकांश जीवन बिहार में बिताया है, बिहार को क़रीब से देखा है, बिहार में काम किया है, बाहर रहकर एक बिहारी की पीड़ा का अनुभव किया है, बल्कि आध्यात्मिक कारण कुछ और ही होगा। बिहार मेरे लिए खुद से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण क्यों है वो मेरे भी समझ से परे है। पर सत्य यही है। ईश्वर की अपनी योजना होती है।

बिहार मेरे लिए सर्वोपरि है एक बिहारी से भी ज़्यादा बड़ा, ज़्यादा ऊँचा क्योंकि हर बिहारी बिहार है। यूरिपडीज़ की The Bacchae की एक पंक्ति मेरे दिमाग़ पर छप गयी थी "ten thousand men posses ten thousand hopes". बिहार मेरे लिए तेरह करोड़ आशा है।

किसी समाज के समूह से बड़ा हर व्यक्ति चाहे उसके पास कुर्सी ना हो, मोबाइल में कुर्सी वालों के नम्बर ना हों, बल्कि भले ही मोबाइल रखने की क्षमता ही ना हो या बिहार का फ़ेवरेट शब्द "औक़ात" ना हो। हर व्यक्ति को वो institution देना जो उसे एक सम्मान की ज़िंदगी दे "औक़ात" दे। और वो समग्र इंस्टीट्यूशन बिहार जैसी सड़ी व्यवस्था में अब एक प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री ही ला सकता है, इसलिए बिना किसी ड्रामे-दिखावे के उस अख़बारी विज्ञापन में लिखा था "मुख्यमंत्री उम्मीदवार"।

ये बात कई लोगों को बहुत खटकी "सीधे मुख्यमंत्री बन जाइएगा?"। नक़ली नेताओं, नक़ली नेता-आकांक्षियों, मीडिया के कुछ लोगों, और कुछ आम लोगों को भी। ये सोच कर मुझे आज भी दो वजह से बहुत हँसी आती है। हम ड्रामा, झूठ और पाखंड के कितने आदी हो गए हैं। और इसी झूठ, ड्रामा और फ़्रॉड ने बिहार को बर्बाद किया है।

जो लोग राजनीति में नाच-कूद रहे होते हैं, बड़े-बड़े महापुरुषों का मुँह लगा के वो क्या मसीहा बनने आते हैं? या ऐसा है कि जब तक बोलिए नहीं तब तक ठीक है, घाघ बन के ऊपर पहुँचिए तो ठीक है? या दिक़्क़त ये है कि एक स्त्री जब तक राजनीति में बाप की या पति की, या दोनो की, टोकेन है तब तक ठीक है? ये खुद और खुद-से कैसे बन जाएगी?

मुझे मुख्यमंत्री का पद भगवान का पद नहीं लगता, मात्र एक पद है, हाँ एक शक्तिशाली पद है जिसपर इन्स्टिट्यूशन बनाने के लिए बैठना ज़रूरी है। और उस पद पर उसे ही बैठना चाहिए जिसे इन्स्टिट्यूशन बदलने आता हो, उसकी समझ हो, पढ़ाई हो। जैसे इलाज उसी को करना चाहिए जो डॉक्टर हो।

एक्टर एक्टिंग कर सकता है, क्रिकेटर क्रिकेट खेल सकता है और फ़्रॉड ड्रामा कर सकता है, पर व्यवस्था वही बदल सकता है जिसके पास व्यवस्था बनाने का स्किल-सेट हो, संविधान वही बना सकता है जो संविधान बनाने की समझ रखता हो, सबसे बड़ी बात "नीति और नीयत" हो।

मैं बिना इरादे और बिना स्किल के नेताओं को नेता नहीं मानती और वो जो आज तक नेता जैसा कोई काम भी नहीं कर सके। बिहार को इसलिए सच बोलने वाला नेता चाहिए। और 2020 में आप लोगों में लाखों ने मेरे आने पर मेरा साथ दिया और ये संकेत दिए कि आप लोग भी यही मानते हैं।

राजनीति का स्तर बहुत गिरा तो था ही पर पिछले चार साल में बिहार की राजनीति का स्तर और गिरता जा रहा। प्लुरल्स पार्टी का नाम प्लुरल्स इसलिए नहीं रखा क्योंकि विरोधियों के शब्दों में "मैं विदेशी हूँ, और मुझे बिहार के बारे में मालूम नहीं"। मुझसे ज़्यादा बिहार को कोई नहीं जानता इसलिए मात्र 24 घंटों में आप मुझे जान गए थे।

इसलिए पहली बार बिहार में नयी तरह की राजनीति की शुरुआत हुई और सब विकास की बातें करने लगे। दूसरी पार्टियों ने हमारा टैग लाइन तक कॉपी कर के अपने पोस्टर पर लिख लिया "ना जाति ना धर्म"। लेकिन ओरिजिनल किसी कारण से ओरिजिनल होता है और शेर का बस खाल ओढ़ लेने से सियार शेर नहीं बन जाता।

पिछले चार वर्षों में लोगों ने बस वही किया, उसी स्टाइल में किया जो प्लुरल्स ने 2020 में किया। वही बातें जो हमने कही थी, लाइन बाई लाइन, "नयी राजनीतिक पीढ़ी बना रहे", "आंदोलन कर रहे", "बिहार का विकास कर रहे", और इतनी बेशर्मी से कि गंभीर मुद्दे भी हल्के बन गये। मुद्दे तो मुद्दे, कुछ लोग तो कपड़ा भी सफ़ेद से काला पहन के घूमने लगे!

प्लुरल्स पार्टी के शायद ही कोई सदस्य होंगे जिनको लोगों ने अपनी-अपनी पार्टी में शामिल करने की कोशिश नहीं की। और कुछ लोग इधर-उधर गए भी, जो बिहार को नहीं बल्कि ख़ुद को बदलने की जल्दी में रहे होंगे। पर प्लुरल्स पार्टी का नाम प्लुरल्स इसलिए था क्योंकि इसमें उस आदर्श के कई लोग हैं जो ख़रीदे नहीं जा सकते, फँसाये नहीं जा सकते, जो बिहार के लोगों को "जिसकी जितनी संख्या..." वोट बैंक से ज़्यादा समझते हैं।

बिहार को बदलाव की ज़रूरत नहीं, सार्थक बदलाव की ज़रूरत है। और बिहार में नया कौन है? राजनीति में हमें छोड़कर नया क्या है? नई बोतल में पुरानी शराब बिहार के लिए डेंजरस है, जिनका कोई आदर्श नहीं होता, बस मौक़ापरस्त होते हैं। ऐसे लोगों ने तो राजनीति को नौटंकी बना दिया है, टिकट को कुत्ते को फेंकने वाली रोटी, राजनीति को इवेंट, और कैम्पेन को एक घटिया पेड-मैनेजमेंट।

बिहार में आज भी कोई नया नहीं है, किसी की सोच नयी नहीं है, वही कभी इस पार्टी में कभी उस पार्टी में जाने वाले लोग जो नए सुनहरे काग़ज़ में बंधा हुआ पुराना माल है। राजनीति जुआ नहीं है, धैर्य की परीक्षा है। स्प्रिंट नहीं, मैराथन है। और हमारी राजनीति संघर्ष की राजनीति रही है। नहीं तो यह पार्टी बनती ही नहीं। नीतीश जी जैसे नेताओं से मेरा संबंध बहुत अच्छा और बहुत पुराना है और उनसे मेरा कोई पर्सनल बैर भी न था और न है।

ये आदर्शों की राजनीति है, इसलिए प्लुरल्स पार्टी है। हमारी लड़ाई उन्हीं लोगों से है जिनसे 2020 में थी। आदर्श-विहीन लोग जो राजनीति कपड़े की तरह बदलते हैं, कहीं दाल नहीं गली तो अपनी पार्टी बना लेते हैं, बंदूक़-धारकों के साथ उठते-बैठते हैं, उनके साथ आपका संघर्ष नहीं। हम उन जैसे नहीं जिनके पास बहुत काला धन और बहुत काला मन है।

वो अवसरवादी लोगों को साथ में भले ही इकट्ठा कर लें, पर आप बिहार की वो फ़ौज हैं वो पीढ़ी हैं जिनमें आदर्श अभी भी जीवित हैं। जो इस वजह से अपना आदर्श नहीं बदलते क्योंकि अख़बार में हम अपने लिए कवरेज का स्पेस नहीं खरीदते।

आप उसी सड़े सिस्टम में रमने नहीं आए बल्कि उन लोगों के मन में जगह बनाने आए हैं जो इस सिस्टम से त्रस्त हैं और एक विकसित, अच्छा बिहार देखना चाहते हैं। अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा बनाने के लिए एक पढ़ी-लिखी सरकार देखना चाहते हैं। जो ये जानते हैं कि अंग्रेज़ी बोलना मतलब पढ़ा-लिखा होना नहीं होता, उसका मतलब मात्र ये है कि बोलने वाले ने अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाई की है।

बड़े-बड़े टेंट लगाने और पैसे देकर भीड़ जुटाने का मतलब लोकप्रियता और जनता में पकड़ नहीं होता, उसका मतलब सिर्फ़ काला धन होना होता है। अख़बार में छपने और वीडियोज़ में प्रायोजित इंटरव्यू का मतलब ज़मीन पर होना नहीं होता, बल्कि उसका मात्र मतलब ये है कि मीडिया मैनेजमेंट अच्छा कर लेते हैं। और मात्र कुर्ता पहन कर बड़े-बड़े वादे कर देने का मतलब नेता होना नहीं होता, उसका मतलब मात्र ये होता है कि आप जनता को झाँसा दे रहे हैं। और मैं ये सब देख रही।

प्लुरल्स एक ईमानदार पार्टी है, जो जनता से लूटे हुए या राजनीतिक दलाली करके जुटाए काले धन से नहीं चलती, और आप मेरी तरह उस के सदस्य हैं या समर्थक हैं। अगर किसी के नींव में ही चोरी, दलाली और अवसरवादिता है उससे अच्छे की उम्मीद करना ख़ुद को धोखा देना है या जनता को एक और धोखा देने का स्वाँग रचना है।

आप अपने आदर्शों पर गर्व करिए और तमाशा देखिए। इस तमाशे में शरीक होने की लालसा मत रखिए, आपका रास्ता अलग है। और आप पर ज़िम्मेदारी सिर्फ़ जीत जाने की नहीं हैं। जनता आपसे बेहतर राजनीति की अपेक्षा करती है, ये वो लोग हैं जो चुप हैं पर देख रहे हैं।

ऊँची आवाज़ वाले लोगों के शोर में जो आवाज़ दब जाती है आप उनकी आवाज़ हैं। उनके बीच में रहिए जिनके पास बिहार में क्या हो रहा ये पता लगाने की भी फ़ुरसत नहीं, जो पूरा घर-बार पीछे छोड़ आज भी मज़दूरी करने जा रहे, जिनके पास आज भी एक बित्ता ज़मीन नहीं।

जो अच्छी इलाज के अभाव में वक्त से पहले गुजर जा रहे, जिनके बच्चे शौक़ से नहीं बल्कि अभाव की वजह से नहीं पढ़ पा रहे। उनके लिए, उनके प्रतिनिधित्व के लिए, उनकी सरकार बनाने के लिए, उनका मुख्यमंत्री बनने के लिए - हमेशा याद रखिए- मैं ज़िंदा हूँ। Time brings victory. जीत समय पर होती है। जय हिंद। पुष्पम प्रिया चौधरी

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