न इधर के रहे न उधर के... बिहार में इन तीन दिग्गजों को किसी भी गठबंधन ने नहीं दिया भाव, अब क्या करेंगे नेताजी?
बिहार में महागठबंधन की सीटों का बंटवारा हो गया है। आरजेडी 26 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि कांग्रेस को 9 और वामदलों को 5 सीटें मिली हैं। वामदलों की पांच सीटों में से सीपीआई माले को 3, सीपीआई को 1 और सीपीएम को 1 सीटें मिली है।
जिस पूर्णिया सीट को लेकर काफी समय से चर्चा चल रही थी वो आरजेडी के खाते में चली गई है। इसे पप्पू यादव के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। जदयू से आरजेडी में गईं रुपौली विधायक बीमा भारती इस सीट पर महागठबंधन की उम्मीदवार हैं।

आरजेडी के सीट बंटवारे से पहले मुकेश सहनी को लेकर भी खूब दावे किए जा रहे थे। ऐसा कहा जा रहा था कि महागठबंधन विकासशील इंसान पार्टी को 3 सीटें दे सकती हैं मगर सहनी की डील कामयाब नहीं हो पाई।
'कहीं के नहीं रहे सहनी'
इससे पहले का लोकसभा चुनाव मुकेश सहनी की पार्टी ने महागठबंधन में रहकर लड़ा था। 2019 में हुए उस चुनाव में महागठबंधन ने वीआईपी को 3 सीटें दी थीं। मुकेश सहनी की पार्टी ने मुजफ्फरपुर, खगड़िया और मधुबनी में अपने प्रत्याशी उतारे थे। खगड़िया से मुकेश सहनी खुद चुनाव लड़े थे। हालांकि, उस चुनाव में तीनों सीटों पर बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था।
मुकेश सहनी लगभग एक दशक से बिहार की राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे खुद को सन ऑफ मल्लाह बताते हैं और निषाद जाति के उत्थान की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते हैं।
लेकिन अंतिम समय में सहयोगी उन्हें झटका दे जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। न तो बीजेपी ने उन्हें करीब आने दिया न ही वे आरजेडी से नजदीकी बढ़ा पाए। मुकेश सहनी बिहार में एकमात्र प्रमुख चेहरा नहीं हैं जिन्हें दोनों गठबंधनों से मायूसी हाथ लगी है। सहनी के अलावे पशुपति पारस को भी किसी बड़ी पार्टी ने घास नहीं डाला है।
भतीजे से रेस में हारे पारस
लंबे समय से ऐसा माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी पशुपति पारस पर चिराग पासवान को वरीयता देगी। लेकिन चाचा पारस को जैसे इसका कोई अंदाजा ही नहीं था। पारस इस भ्रम में रहे कि बीजेपी आगे में उन्हें तवज्जो देती रहेगी मगर वो ये नहीं समझ सके कि बीजेपी उन्हें किस मजबूरी में मंत्री पद दिए हुए थी।
एनडीए ने सीटों के बंटवारे में चिराग को 5 सीटें दे दीं, पारस खाली हाथ रह गए। इसके बाद ऐसी उम्मीद जताई जा रही थी कि पारस महागठबंधन का दामन थाम सकते हैं। लेकिन जब आरजेडी नेता सुनील कुमार सिंह ने उन्हें 'फूके हुए कारतूस और फ्यूज बल्ब' करार दिया, तभी से ऐसा लगने लगा था कि पारस को आरजेडी में भी जगह नहीं मिलने वाली है।
पशुपति पारस ने कैबिनट मंत्री पद से इस्तीफा पहले ही दे दिया है। अगर अब भी किसी दल से उनका गठबंधन नहीं होता है तो अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अब उनके पास एक ही विकल्प रह गया है। वे पूरी ताकत से हाजीपुर से चुनावी मैदान में चिराग को चुनौती दे सकते हैं। हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि यह उनकी आखिरी लड़ाई साबित होगी। चिराग हर हाल में उनपर भारी पड़ेंगे।
पप्पू पास कैसे होंगे?
पप्पू यादव ने हाल ही में अपनी जन अधिकार पार्टी का विलय कांग्रेस में करा दिया था। इसमें उनकी बस एक शर्त ये थी कि वे पूर्णिया से चुनाव लड़ेंगे। हालांकि उनके इस प्लान पर लालू यादव ने पानी फेर दिया है। लालू ने पूर्णिया सीट कांग्रेस को न देकर अपने पास रख ली है।
अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कराने से पहले पप्पू राजद अध्यक्ष लालू यादव से मिलने भी गए थे। इसके बाद जाप का कांग्रेस में विलय करते समय पप्पू ने मान लिया था कि उन्हें कांग्रेस पूर्णिया से प्रत्याशी बनाएगी। लेकिन, कांग्रेस को लालू ने कोई मौका नहीं दिया।
पप्पू का प्लान फेल करने के लिए आरजेडी ने रुपौली से विधायक बीमा भारती को पूर्णिया की सीट देने के नाम पर अपनी पार्टी की सदस्यता दिलाई और फिर उन्हें सिंबल भी दे दिया। पप्पू यादव के पास कांग्रेस पार्टी के नाम पर चुनाव लड़ने की उम्मीद समाप्त हो चुकी है।
हालांकि पप्पू ने हार अभी भी नहीं मानी है। पप्पू यादव ने पूर्णिया सीट से ही चुनाव लड़ने का फैसला किया है। अभी तक की जानकारी के मुताबिक पप्पू यादव ने कांग्रेस सीट से ही चुनाव लड़ने की बात कही है। लेकिन ऐसी उम्मीद कम है कि कांग्रेस उन्हें पूर्णिया सीट से सिंबल दे पाएगा। ऐसे में पप्पू यादव निर्दलीय चुनाव लड़ते दिखाई दे सकते हैं।












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