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बिहार में सिर्फ 0.03 फीसदी वोट से हुआ खेल, NDA ने चूर किया RJD गठबंधन का सपना

पटना- बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार तीन गठबंधनों के बीच टक्कर हुई थी। एनडीए, महागठबंधन और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की अगुवाई वाले ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के बीच। अगर इन गठबंधनों को मिले वोटों का हिसाब-किताब करें तो पहले दोनों बड़े गठबंधनों में वोटों का अंतर महज 0.03 फीसदी का है। लेकिन, वोटों में सिर्फ इतने मामूली अंतर के बावजूद सीटों में इतना अंतर हो गया कि एनडीए ने फिर से सरकार बना ली और राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन पांच साल के लिए हाथ मलने को मजबूर हो गया। बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए हुए चुनाव में राजग को 125, राजद गठबंधन को 110 और ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट को 6 सीटें मिली हैं।

Only 0.03 percent of the vote played role in Bihar,NDA broke the dream of RJD alliance

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    बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बीते चुनाव में 37.26 फीसदी वोट मिले हैं। जबकि, विपक्षी महागठबंधन को भी 37.23 फीसदी वोट हासिल हुए हैं। इस तरह से दोनों बड़े गठबंधनों में वोटो का अंतर सिर्फ 0.03 फीसदी है। वहीं कुशवाहा वाले गठबंधन को 4.5 फीसदी वोट मिले हैं। अगर वोटों की संख्या के हिसाब से देखें तो आंकड़ों के मुताबिक इस बार बिहार में करीब 3 करोड़ 14 हजार वोट पड़े। इनमें एनडीए को कुल 1 करोड़ 57 लाख, 01 हजार और 226 वोट मिले। जबकि, महागठबंधन को 1 करोड़ 56 लाख 88 हजार और 458 वोट मिले। इस तरह से दोनों बड़े गठबंधनों के वोटों की संख्या का अंतर सिर्फ 12,768 वोटों का रहा, लेकिन फिर भी 15 ज्यादा विधायकों के साथ सत्ताधारी गठबंधन ने दोबारा सरकार बना ली।

    अगर राजनीतिक दलों को मिले वोटों की बात करें तो बीजेपी को 19.46 फीसदी (74 सीट), जेडीयू को 15.49 फीसदी (43 सीट), वीआईपी को 1.52 फीसदी (4 सीट) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को 0.89 फीसदी (4 सीट) वोट मिले हैं। वहीं राजद को सबसे ज्यादा 23.11 फीसदी (75 सीट), कांग्रेस को 9.48 फीसदी (19 सीट), भाकपा (माले) को 3.16 फीसदी (12 सीट), भाकपा को 0.83 फीसदी (2 सीट) और माकपा को 0.65 फीसदी (2 सीट) वोट मिले हैं। वहीं, तीसरे मोर्चे में एआईएमआईएम को 1.24 फीसदी (5 सीट), बसपा को 1.49 फीसदी (1 सीट) और रालोसपा को 1.77 फीसदी (शून्य सीट) वोट मिले हैं।

    मतलब, बिहार चुनाव में गठबंधनों को मिले वोटों से साफ जाहिर है कि एनडीए ने कांटे की टक्कर में महागठबंधन को हराया है, अगर कुछ वोटों का भी आंकड़ा इधर-उधर होता तो तस्वीर पूरी तरह से अलग हो सकती थी। वैसे 2015 के चुनाव की बात करें तो उस बार एनडीए को महागठबंधन से 7.8 फीसदी कम वोट मिले थे। यानि इस मामले में एनएडीए ने बड़ी कामयाबी पाई है। लेकिन, यह बताना होगा कि पिछले चुनाव में जदयू महागठबंधन का हिस्सा था और लोजपा भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। इस चुनाव में लोजपा ने 5.66 फीसदी वोट हासिल किए हैं।

    वैसे इस चुनाव में ये आंकड़े भी दिलचस्प हैं कि एक ही गठबंधन में रहकर भी बसपा और एआईएमआईएम से ज्यादा वोट लाकर भी रालोसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी और बीएसपी से कम वोट के बावजूद ओवैसी की पार्टी उससे 4 सीटें ज्यादा जीत गई। एक आंकड़ा तो और भी दिलचस्प है कि इन तीनों दलों में सिर्फ कुशवाहा की पार्टी को ही नोटा (1.68 फीसदी) से ज्यादा वोट मिले हैं। इसी तरह सीपीआई सीपीएम भी बहुत कम वोट पाकर भी दो-दो सीट जीत चुकी है।

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