One India Hindi Exclusive: ऑस्कर पहुंची 'Champaran Mutton', कामयाबी की कहानी, डायरेक्टर की ज़ुबानी

Exclusive Talk With 'Champaran Mutton' Director: बिहार के युवाओं ने एक बार फिर प्रदेश का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। इस बार बिहार के लाल रंजन कुमार ने अपनी शॉर्ट फिल्म "चंपारण मटन" के ज़रिए प्रदेश को अलग पहचान दिलाई है। आपको बता दें कि रंजन कुमार की शॉर्ट फिल्म "चंपारण मटन" ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई है। इसके साथ ही रंजन कुमार सुर्खियों में छा गए हैं, इसके साथ फिल्म के किरदार फलक खान और चंदन राय की जमकर सराहना हो रही है।

वन इंडिया हिंदी से "चंपारण मटन" शॉर्ट फिल्म के डायरेक्टर रंजन कुमार ने खास बातचीत में अपनी कामयाबी की कहानी का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि इस मुकाम पर पहुंचने के बाद कैसा लग रहा है, किस तरह से फिल्म बनाने का आइडिया आया और आगे क्या करने का इरादा है। आइए जानते हैं कामयाबी की कहानी रंजन की ज़ुबानी।

One India Hindi Exclusive: Champaran Mutton reached Oscars

"चंपारण मटन" के डायरेक्टर रंजन ने बताया कि उनका पूरा नाम रंजन उमा कृष्ण कुमार है। मां का नाम उमा और पिता का नाम कृष्ण है। इसलिए ही उन्होंने अपने नाम में उमा कृष्ण को भी शामिल किया। हाजीपुर के मीनापुर मधुबन गांव से ताल्लुक रखने वाले रंजन ने MIT मुजफ्फरपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

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    रंजन कुमार ने कहा कि उन्हें शुरु से ही कुछ कुछ क्रिएटिव करना था। इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद उन्हें FTII की जानकारी हुई, तो उसका एंट्रेंस एग्जाम दिया। परिवार के लोग पहले ही सरेंडर कर गए, इसके बाद FTII के सफर पर रंजन अकेले ही निकल पड़े। हालांकि इस दौरान उनके इंजीनियरिंग के बैचमेटस ने साथ दिया और आर्थिक सहयोग भी किया।

    रंजन कुमार (डायरेक्टर, चंपारण मटन) MIT मुज़फ्फरपुर से पास होने के बाद ISM धनबाद गये। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई में कुछ दिनों का गैप देकर FTII (पुणे) में दाखिला लिया। वहां लोगों का बहुत सपोर्ट किया। रंजन कहते हैं कि आज वह जिस मुकाम पर हैं, इसका श्रेय FTII को जाता है।

    रंजन ने कहा ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि अगर FTII का रुख नहीं करते तो एक मामूली से इंजीनियर होते। FTII में आने के बाद सोचनने का नज़रिया बदला। समाज में एक सभ्य इंसान बनने की सीख मिली। कई किताबों और फ़िल्मों को समझ पाया। रंजन FTII को एक कॉपर ट्यूब जैसे मानते हैं, जिसने उनकी तस्वीर ही बदल दी।

    रंजन ने कहा कि उनकी ज़िंदगी में परेशानियों का अंबार लगा रहता था। अपनी शुरुआती ज़िंदगी को याद करते हुए बताया कि बचपन में जब वह अपने घर में पढ़ाई कर रहे होते थे, तो लोग उनसे लालटेन छीन लिया करते थे। इस तरह के माहौल में परवरिश हुई है।

    रंजन ने कहा कि माता-पिता अच्छा काम कर रहे थे, इस वजह से ही वह इंजीनियरिंग कर पाये। इसके बाद जो सफर की शुरुआत हुई उसमे लोगों का बहुत सपोर्ट मिला। उन्होंने कहा कि आप किसी खास मकसद पर काम करते हो तो परेशानियां ज़रूर आती हैं, लेकिन कामयाबी भी क़दम चूमती है।

    अपने इंस्पिरेशन का ज़िक्र करते हुए रंजन ने बताया कि पढ़ाई में उनके सबसे बड़े मोटिवेटर भीम राव अंबेडकर थे। इसके बाद फिल्मी दुनिया में वह प्रकाश झा को आइडियल मानते हैं। प्रकाश झा बेतिया से ताल्लुक रखते हैं। उनके बारे में जानकारी इकट्ठा की और उनकी कई फ़िल्में भी देखी।

    बिहार से फिल्मी दुनिया में युवाओं के भविष्य पर चर्चा करते हुए रंजन ने कहा कि बिहार में विज्ञान, इंजीनियरिंग, डॉक्टर, लॉ और एमबीए वाले बहुत छात्र मिल जाएंगे, लेकिन फिल्मी दुनिया के लिए गाइड करने वाले ना के बराबर है। खुद से कोशिश करने और आस-पास के घटनाक्रम पर निगाह रखने से ही आप फिल्म निर्देशक बनते हैं।

    रंजन कुमार ने कहा कि आप मुंबई जाते ही अचानक बिहार पर फिल्म नहीं बना सकते हैं, आपने ज़िंदगी का लम्हा अगर बिहार में गुज़ारा है, तो ही आप कहानी लिखा पाएंगे। मुंबई में सिर्फ क्राफ्ट और कहानी को मोल्ड करना ही सीख सकते हैं। इंसानी जज़्बात, पति-पत्नी रिश्ते और आस-पास के लोगों की केमिस्ट्री का अनुभव आपको खुद करना पड़ेगा।

    रंजन कुमार ने अपनी शॉर्ट फिल्म का ज़िक्र करते हुए बताया कि उन्होंने पुणे में फिल्म बनाई है। इस फिल्म में हाजीपुर के रहने वाले चंदन राय मुख्य किरदार निभा रहे हैं। ऑस्कर अवॉर्ड के लिए इस साल दुनियाभर फिल्म प्रशिक्षण संस्थानों से 2400 से ज्यादा फ़िल्मों को नॉमिनेट किया गया है। "चंपारण मटन" उन सबकी सूची में सबसे ऊपर है। ऑस्कर के तीन कैटेगरी में नामांकन हासिल करने वाली यह पहली भारतीय फिल्म है।

    फिल्म ऑस्कर में नॉमिनेट होने पर खुशी का इज़हार करते हुए रंजन ने कहा कि मेरी करीब 6 सालों की मेहनत रंग लाई है। FTII के कामयाब सफर का ही ये नतीजा है। वहां जो मैंने राइटिंग और डायरेक्शन के स्किल को डेवलप किया, वह इस फिल्म की कामयाबी में दिख रहा है।

    फिल्म बनाने के आइडिया पर चर्चा करते हुए रंजन ने कहा कि स्क्रिप्ट राइटिंग कोर्स के हर सेमेस्टर में एक फिल्म बनाना ज़रूरी है। "चंपारण मटन" मेरी फाइनल सेमेस्टर की फिल्म है। मेरे बैच में कुल 10 छात्र है, सभी को कहानी लिखने के लिए लिए वर्कशॉप कराए जाते हैं।

    रंजन ने कहा कि चूंकि मैं बिहार के हाजीपुर से ताल्लुक रखता हूं। चंपारण में मेरा पूरा बचपन बीता है। मेरे अंदर बिहार बसता है। इसलिए मेरी कहानी में कहीं ना कहीं बिहार का ज़िक्र हो ही जाता है। "चंपारण मटन" फिल्म में भी बिहार शामिल है।
    रंजन ने बताया कि जब उन्हें फाइनल फिल्म की स्क्रिप्टिंग दी गई तो उन्होंने "चंपारण मटन" की कहानी लिखी। बिहार के नज़ारे के साथ हास्य, व्यंग्य और लोगों की परेशानी को देखते हुए कहानी तैयार की। खुद के साथ हुए हादसे का भी ज़िक्र किया।

    रंजन ने बताया कि उनके पिता वैशाली और माता मां चंपारण से ताल्लुक रखती हैं। इसलिए उनकी ज़िंदगी के भी लम्हें को भी फिल्म में जगह देने की कोशिश की है। मटन के लिए घर में माता-पिता के बीच जो बातें होती थी, उसे भी कहानी के ज़रिए फिल्म में जगह दी है।

    "चंपारण मटन" के बारे में बात करते हुए रंजन ने बताया कि मूवी एक तीखे व्यंग्य पर आधारित है। जिसमें एक गर्भवती महिला की के पति की नौकरी कोरोनाकाल की वजह से चली गई। गर्भावस्था में उन्हें चंपारण का मशहूर मटन खाने की ख्वाहिश होती है। गरीब परिवार के लिए 800 रुपये किलो वाला मटन कैसे खरीदें या फिर उसे कैसे बनाए। इसी थीम को पर्दे पर उतारने की कोशिश की गई है।

    खूबसूरती और इमोशंस के साथ फिल्म को बनाने वाले रंजन ने भविष्य की प्लानिंग पर बात करते हुए कहा कि कुछ प्रोजेक्ट्स हैं, जिन पर आगे काम करना है। एक अच्छे फिल्म मेकर की फेहरिस्त में शामिल होना है। एक अच्छा लेखक-निदेशक बन कर बिहार को एक अलग पहचान दिलानी है।

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