OI Ground Report: ‘इलाज में ईमानदारी, सिस्टम में लाचारी’, बरौनी स्वास्थ्य केंद्र की दो तस्वीरें, जानिए मामला
OI Ground Report: बरौनी प्रखंड का स्वास्थ्य केंद्र दो विरोधाभासी तस्वीरों के बीच खड़ा है। एक ओर स्वास्थ्यकर्मियों को समय पर वेतन नहीं मिलना, आशा कार्यकर्ताओं को महज़ ₹1,000 मासिक मेहनताना और स्वास्थ्य केंद्र में शौचालय और रुकने की मूलभूत सुविधा का अभाव जैसी शिकायतें सामने आई हैं, वहीं दूसरी ओर इलाज के मामले में यह स्वास्थ्य केंद्र पूरे जिले के लिए एक मिसाल बना हुआ है।
वन इंडिया हिंदी की टीम ने मौके पर जाकर मरीज़ों और स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य केंद्र के संबंधित ज़िम्मेदार से भी बात की। बात सामने आई कि इलाज की गुणवत्ता अच्छी है और डॉक्टर गंभीरता से अपना काम करते हैं। मरीजों को इलाज में कोई शिकायत नहीं है। डॉक्टर समय पर आते हैं और पूरी संवेदनशीलता से इलाज करते हैं।

मरीजों को समय पर सभी प्रकार की मुफ्त जांच और दवाएं मिल रही हैं। मरीज़ के तीमारदारों ने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र गरीब और ज़रूरतमंद मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है। एक मरीज ने कहा कि बिना पैसे के इलाज मिल रहा है। यही हमारे लिए सबसे बड़ी राहत है। काम की तारीफ होनी चाहिए, और सिस्टम की जवाबदेही भी ज़रूरी है।
बरौनी स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉ. सुनीता कुमारी ने बताया कि अस्पताल में ज़्यादातर गर्भवती महिलाएं आती हैं। कोशिश यही रहती है कि उनका हर मुमकिन इलाज बेहतर तरीक़े से हो। ज़्यादातर मरीज़ों यहां से संतुष्ट होकर की जाते हैं, वहीं रात के समय में एक्सीडेंटल केस भी ज़्यादा आते हैं।
लैब टेक्निशियन मनोज कुमार ने बताया कि ओपीडी में भी मरीज़ों का सही से इलाज होता है। यहां महंगी से महंगी दवाई मुफ़्त में उपलब्ध है। जांच भी मुफ्त में होता है, जिस तरह से निजी लैब के जांच रिपोर्ट को लोग सही मानते हैं, वैसे ही यहां की रिपोर्ट भी सौ फीसदी सही होती है। इस बाबत सर्टिफिकेट भी मिला है। यहां तक के बाहर अस्पताल के लोग भी यहां अपनी जांच करवाने आते हैं।
मरीज़ और उसके तीमारदारों कों कहीं से और किसी प्रकार से भी साइड से पैसे देने की ज़रूरत नहीं है। अगर किसी को ऐसी शिकायत है तो वह मुझसे संपर्क करें, या आला अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। इस बाबत बोर्ड पर नंबर के साथ नोटिस भी चस्पा किया हुआ है, ताकि आसानी से मरीज़ या उसके तीमारदार अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचा सकें।
यह तो हो गई मरीज़ों के इलाज की बात लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याएं जस की तस बनी हुई है। स्वास्थ्य केंद्र में तैनात स्टाफ को 12-12 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है। वहीं छोटी सी गलती पर वेतन कटौती और सैलरी देरी आने की भी बात आम हो चुकी है। आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक हज़ार रुपये महीने में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए मजबूर हैं।
स्वास्थ्य केंद्र पर रात गुज़ारने के लिए लिए उचित व्यवस्था नहीं है। गॉर्ड के गंभीर आरोप हैं कि 13 हज़ार रुपये की सैलरी में 5 हज़ार वापिस ही देने पड़ जाते हैं, ताकि नौकरी बची रहे। सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि इस मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए उचित कार्रवाई करें ताकि ग़रीब कर्मियों का हक़ नहीं मारा जाए।
बरौनी का स्वास्थ्य केंद्र सरकारी व्यवस्था की उन दो तस्वीरों को एक साथ दिखा रहा है। एक जहां एक ओर कर्मियों को अपने अधिकारों के लिए जूझना पड़ रहा है और वहीं दूसरी तरफ़ मरीज़ बिना भेदभाव के इलाज पा रहे हैं। इस स्वास्थ केंद्र में इलाज की व्यवस्था तो दुरुस्त है, बस कर्मियों की समस्याओं को सुनने और उसके समाधान की ज़रूरत है।












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