नीतीश ने तेजस्वी को पहले तीखा खिलाया, फिर जाते-जाते कुछ मीठा अहसास कराया

नीतीश कुमार भाजपा और आरजेडी के साथ एक जैसा खेल खेल रहे हैं।

पटना, 30 अप्रैल: पतंग उड़ाने में धागे को कभी लपेटना पड़ता है तो कभी ढील भी देनी पड़ती है। राजनीतिक पतंगबाजी में नीतीश कुमार यही कर रहे हैं। वे भाजपा और राजद के साथ एक जैसा खेल खेल रहे हैं। कभी दूर चले जाते हैं तो कभी नजदीक आ जाते हैं। बड़े बड़े महारथी भी उनके मन की थाह नहीं लगा पा रहे। राजद की इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार की शानदार आवभगत हुई थी। लेकिन, जदयू की इफ्तार पार्टी में नजारा बदला हुआ था। नीतीश ने तेजस्वी को पहले तीखा खिलाया। फिर जाते-जाते कुछ मीठा भी खिला दिया ताकि नेता प्रतिपक्षा का मूड बदल जाए। क्या हुआ, कैसे हुआ, यह समझने के लिए दावते इफ्तार के परिदृश्य पर गौर कीजिए।

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    ललन सिंह के बगल में बैठे तेजस्वी

    ललन सिंह के बगल में बैठे तेजस्वी

    पटना के हज भवन में जदयू अल्पसंख्यक सेल की इफ्तार पार्टी। हॉल किसी दरबार की तरह सजा हुआ था। मुख्यमंत्री का सोफा किसी सिंहासन की तरह दरबार के बीच में था। उनके अगल बगल कोई सोफा नहीं था। उनकी पंक्ति में दाएं-बाएं कुछ दूरी दो-दो सोफा रखे हुए थे। इफ्तार पार्टी शुरू हुई। मुख्यमंत्री अपने निर्धारित सोफा पर बैठे। उनके पास कोई नहीं था, मतलब बराबरी में कोई नहीं था। उनसे कुछ दूर बायीं तरफ दो सोफा थे। एक पर उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद बैठे थे। उनकी बगल में पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी बैठे थे। नीतीश कुमार से कुछ दूर दाय़ीं तरफ भी दो सोफा लगे थे। एक पर पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी बैठे थे तो दूसरे पर तेजप्रताप यादव। इससे एक दिन पहले ही तेजप्रताप यादव ने आरोप लगाया था कि जीतन राम मांझी के बंगले से ही उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है। तेजस्वी और तेजप्रताप आये तो थे एक साथ। लेकिन तेजस्वी को कुछ दूर बैठना पड़ा। उन्हें जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह की बगल में बैठना पड़ा। लालू यादव और ललन सिंह में छत्तीस का आंकड़ा रहा है। लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाला मामले को अंजाम तक पहुंचाने में ललन सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तेजस्वी, ललन सिंह के बगल में बैठ तो गये लेकिन असहज रहे।

    थोड़ी ही दूर पर बैठे थे सुशील कुमार मोदी

    थोड़ी ही दूर पर बैठे थे सुशील कुमार मोदी

    उनसे थोड़ी ही दूर भाजपा सांसद सुशील कुमार मोदी बैठे थे। सुशील मोदी जब विपक्ष में थे, तब उन्होंने 2017 में (अप्रैल-मई) लालू परिवार की बेनाम सम्पत्ति को लेकर बीस से अधिक प्रेस कांफ्रेंस की थी। इसकी वजह से जुलाई 2017 में तेजस्वी की डिप्टी सीएम की कुर्सी छिन गई थी। दावत में दोनों ही तरफ तेजस्वी के लिए मुश्किल स्थिति थी। वे किसी से बात भी नहीं कर सके। नीतीश कुमार ने भी तेजस्वी की मनोदशा देखी होगी। इफ्तार पार्टी के समापन पर जब नीतीश कुमार जाने के लिए अपने सोफे से उठे, तब तेजस्वी भी उनके साथ हो लिए। नीतीश कुमार ने मौके की नजाकत को समझा। वे तेजस्वी के साथ आत्मीयता से बात करते हुए आगे बढ़ने लगे। भीड़ बहुत थी। एक शालीन मेजबान की तरह नीतीश कुमार ने तेजस्वी को उनकी कार तक छोड़ा। तब लोग इस बात की तारीफ करने लगे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तेजस्वी को उनकी कार तक छोड़ा। ये बात ओझल हो गयी कि दावत में तेजस्वी कैसे और किस हाल में बैठे थे। यही तो राजनीति की कलाकारी है।

    सबको खुश करने की कोशिश

    सबको खुश करने की कोशिश

    नीतीश कुमार फिलहाल सबको खुश करने में लगे हैं। एक पल तकरार भी होती है तो अगले पल मामला संभाल लेते हैं। वे राजद की इफ्तार पार्टी में गये तो भाजपा की पेशानी पर बल पड़ गये। अगले दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गृहमंत्री अमित शाह की आगवानी के लिए पटना हवाई अड्डा पहुंच गये। इसके लिए उन्होंने प्रोटोकॉल भी तोड़ दिया। पहले यही कहा गया था कि मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बीच मुलाकात नहीं होनी है। लेकिन नीतीश कुमार ने सभी को चौंका दिया। वे अमित शाह से मिले और भाजपा खुश हो गयी। हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी समय-समय पर नीतीश कुमार के खिलाफ बयान देते रहे हैं। पांच महीना पहले तो उन्होंने सरकार गिराने की धमकी भी दी थी। लेकिन जब जीतन राम मांझी ने इफ्तार पार्टी दी तो नीतीश कुमार राजी खुशी शरीक हुए। जीतन राम मांझी भी खुश हो गये। उन्होंने नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति का पहली बार खुल कर समर्थन किया। इसके पहले मांझी ने कहा था, थोड़ी-थोड़ी शराब पीने में कोई हर्ज नहीं है। शराबबंदी पर मांझी का यह समर्थन नीतीश के लिए सुकून वाली बात है। हद तो यह है कि नीतीश कुमार ने कांग्रेस की इफ्तार पार्टी में अपने सबसे करीबी नेता और मंत्री श्रवण कुमार को भेज दिया। हालांकि नीतीश कुमार भी इस दावत में आमंत्रित थे। लेकिन वे नहीं गये थे। लेकिन उन्होंने कांग्रेस को भी खुश करने की कोशिश की। वैसे तो दावते इफ्तार राजनीति से परे है। लेकिन इन दिनों बिहार में इसके नाम पर खूब राजनीति हो रही है।

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