Bihar News: अस्पताल में हुआ बेटा, घर पहुंची तो निकली बेटी,लगे आरोप, मुजफ्फरपुर SKMCH में नवजतात बदलने का खेल!

Bihar News: बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) एक बार फिर चर्चा में है। यहां एक महिला ने बेटे को जन्म दिया, लेकिन घर पहुंचने पर पता चला कि नवजात बच्ची है। यह घटना न केवल परिजनों को झकझोर गई, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

क्या है पूरा मामला?
अहियापुर के बीजेछपरा गांव निवासी चंचला कुमारी को सोमवार देर रात प्रसव पीड़ा के बाद एसकेएमसीएच के मातृ-शिशु (एमसीएच) विंग में भर्ती कराया गया। मंगलवार सुबह 6:50 बजे उन्होंने बच्चे को जन्म दिया। अस्पताल की नर्स ने परिजनों को जानकारी दी कि चंचला ने बेटे को जन्म दिया है, जिसके बाद घर में खुशियां मनाई जाने लगीं।

Muzaffarpur SKMCH

लेकिन हैरानी तब हुई जब सुबह करीब 10 बजे चंचला और उनकी मां रामकली देवी नवजात को लेकर घर लौटीं तो पाया कि बच्चा लड़की है। परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा और वे सीधे अस्पताल पहुंचे। वहां उन्होंने नर्स पर नवजात बदलने का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया।

अस्पताल रिकॉर्ड में भी बेटे का जिक्र
मामले को और पेचीदा बना दिया है अस्पताल के बेड हेड टिकट (बीएचटी) ने, जिसमें साफ लिखा है कि चंचला ने लड़के को जन्म दिया। यानी रिकॉर्ड और हकीकत में भारी विरोधाभास है। हंगामे की खबर मिलते ही मेडिकल ओपी प्रभारी राजकुमार गौतम मौके पर पहुंचे और लोगों को शांत कराया। साथ ही एसडीपीओ-2 विनीता सिंहा ने जांच शुरू कर दी है। वहीं, अस्पताल प्रशासन ने भी आंतरिक जांच का आदेश दिया है।

पहले भी हो चुका है बच्चा बदलने का खेल
यह कोई पहला मामला नहीं है। 8 फरवरी 2020 को भी इसी अस्पताल से एक नवजात को एनआईसीयू से बदल दिया गया था, जिसका आज तक पता नहीं चला। उस समय सीसीटीवी फुटेज में एक महिला नवजात को ले जाते हुए दिखी थी, लेकिन जांच के बाद भी परिणाम शून्य रहा।

भ्रष्टाचार और लापरवाही की कड़ी
एसकेएमसीएच की यह घटना बिहार के स्वास्थ्य विभाग में फैले भ्रष्टाचार और लापरवाही को उजागर करती है। कभी दवा घोटाला, कभी इलाज में लापरवाही, तो कभी नवजात बदलने जैसी घटनाएं... यह बताती हैं कि आम जनता की जिंदगी से किस तरह खिलवाड़ हो रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग कब तक ऐसे मामलों को "जांच जारी है" कहकर दबाते रहेंगे?, नवजात बदलने जैसी गंभीर घटनाओं में जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या यह सब किसी अंदरूनी मिलीभगत का हिस्सा है? मुजफ्फरपुर की यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर "अजब-गजब खेल" जारी है और इसका सबसे बड़ा शिकार आम लोग ही हो रहे हैं।

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